धर्म एवं राजनीति

rsdhull निजी विचार Leave a Comment

भारत का संविधान हमें स्वतंत्रता का मूल अधिकार देता है। संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार, “किसी व्यक्ति को उसके प्राण अथवा दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं।“ इस मूल अधिकार को माननीय उच्चतम न्यायालय ने अपने बहुत से निर्णयों में अति महत्त्वपूर्ण माना है एवं समय समय पर सरकार को इसकी हर संभव रक्षा करने के निर्देश दिए हैं। अनुच्छेद 19 हमें स्वतंत्र रूप से बोलने तथा सोचने का अधिकार देता है। इसके अनुसार हर नागरिक को अपनी इच्छा से बोलने का अधिकार है और इस अधिकार को केवल विशेष परिस्थितियों में ही छीना जा सकता है। पर क्या हम स्वतंत्र हैं? यह प्रश्न आज के परिदृश्य में कौंधना स्वाभाविक है। हालांकि भारत गणराज्य को स्वतंत्रता 15 अगस्त 1947 को मिल गयी थी पर व्यक्तिगत स्वतंत्रता से हम अभी कोसों दूर हैं। समाज, धर्म, परिवार एवं अंत में राष्ट्र के बहुत से बंधन हमें इस स्वतंत्रता से दूर रखते हैं। किस प्रकार मानव को स्वतंत्रता मिलनी चाहिए उसके लिए हमें बहुत से भाषणों से नितदिन दो चार होना पड़ता है। धार्मिक पण्डे एवं पुजारी एक अन्य स्वतंत्रता का वायदा हमसे करते हैं एवं उसे मोक्ष का नाम दिया जाता है। मोक्ष के नाम पर भोली भाली जनता की रही सही स्वतंत्रता को भी छीन लिया जाता है। भक्तों को तरह तरह के दिवा स्वप्न दिखाए जाते हैं एवं उन्हें यह महसूस करवाया जाता है कि वे अपने परम लक्ष्य को उनकी भक्ति से तथा उनकी बताई हुई विधि से अवश्य प्राप्त कर लेंगे। कार्ल मार्क्स का एक कथन है; वह कहते हैं कि सभी दार्शनिकों ने विश्व की अनेक प्रकार से व्याख्या की है।  पर मुद्दा उसे बदलने का है उसकी व्याख्या करने का नहीं। यहाँ केवल मात्र कर्म ही आगे आ सकता है कोई व्याख्या नहीं। हर दार्शनिक अपने अपने तरीके से अनर्गल व्याख्या करता है तथा जनता को अधिकाधिक अन्धकार में डुबोता चला जाता है। यह कथन हमें स्पष्ट रूप से बताता है कि मानव जीवन दर्शन प्रधान नहीं अपितु केवल मात्र कर्म प्रधान है। पर कर्म प्रधान विश्व में चूंकि धर्म की आवश्यकता नहीं है अतः भोली भाली जनता को स्वर्ग-नरक के स्वप्न दिखा कर बहलाया जाता है ताकि उनका धंधा सुचारू रूप से चलता रहे। धर्म का यह धंधा कितना सही एवं कितना गलत है इसका अंदाजा हमें एक काल्पनिक कथानक से पता चलता है। ईसप की एक कथा है, “एक कुत्ता पेड़ के नीचे सो रहा है और नींद में मुस्कुरा रहा है। बड़ा खुश हो रहा है और इधर से उधर करवट ले रहा है। पेड़ के ऊपर बिल्ली बैठी है और यह सब देख रही है। वह चिल्लाकर पूछती है कुत्ते से कि भाई क्यों इतना मगन हुए जा रहे हो? कुत्ता जागकर बोला मैंने स्वर्ग का सपना देखा कि परमात्मा कुत्तों से बहुत खुश है और उसके आशीर्वाद से आसमान से हड्डियाँ बरस रही हैं; यह देख कर मुझे बहुत आनंद हुआ। बिल्ली हंसकर बोली, “ तुम्हारा धर्म और तुम्हारे शास्त्र सहित तुम्हारे स्वर्ग भी झूठे हैं, असली धर्म और शास्त्र हमारे पास है, उनमें असली सच लिखा है….जब परमात्मा प्रसन्न होता है तो स्वर्ग से हड्डियाँ नहीं बल्कि चूहे बरसते हैं।”

उपरोक्त कथानक हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि जो हमें पढाया और लिखाया जाता है कुछ सत्य उसमें भी है क्या? धर्म अथवा नैतिकता में जिस प्रकार के तथाकथित लुभावने वायदे जो किये जाते उनमें किसी प्रकार की सत्यता है अथवा नहीं और यदि कोई सत्यता है भी तो इसे हम अब तक नहीं समझ पाए हैं। आर्य समाजी वेदों को तो वैष्णव भागवत को बिलकुल सही मानते हैं। सभी के भगवान सबसे अधिक शक्तिशाली हैं। सभी यह सोच कर ही खुश हैं कि उनके भगवान ने किसी और के धर्म अथवा सम्प्रदाय के भगवान् को कभी किसी समय हराया था। यह अजीब स्थिति है जिसे कोई न तो समझना चाहता है और न ही कोई देखना चाहता है। परम सत्य इस सत्य के पार कहीं छिप गया है कि हमारे धर्म ग्रन्थ केवल मात्र अपने अपने तरीके से हमारी स्वतंत्रता को समाप्त करने में ही संतोष महसूस करते हैं। हमें वैचारिक स्वतंत्रता से अधिक लगाव नहीं। वैचारिक स्वतंत्रता के लिए विचारों को इन बेड़ियों से निकल कर खड़ा होना ही होगा। समाज को धर्म प्रधान नहीं केवल मात्र कर्म प्रधान बनना होगा; वरना इस डूबते हुए राष्ट्र को बचाने का कोई उपाय नहीं। कट्टरपंथी एवं धर्म के स्वयंभू ठेकेदार हमें स्वतंत्र नहीं होने देंगे। राहुल सांकृत्यायन के शब्दों में, “ धर्म अथवा मजहब का असली रूप क्या है? मनुष्य जाति के शैशव की मानसिक दुर्बलताओं और उस से उत्पन्न मिथ्या विश्वासों का समूह ही धर्म है। यदि उसमें और भी कुछ है तो वह है पुरोहितों, सत्ता धारियों और शोषक वर्गों के धोखे फरेब, जिससे वे अपनी भेड़ों को अपने गल्ले से बाहर नहीं जाने देना चाहते।“

इस प्रकार धर्म का पाखण्ड एवं उसके पीछे तरह तरह के प्रलोभनों के कारण पागल गरीब जनता। इससे न केवल कर्मठता का हनन होता है अपितु किसी अलौकिक शक्ति के ऊपर विश्वास कर रहे कमजोर व्यक्ति हाथ पर हाथ रख कर बैठ जाते हैं तथा उन्हें सिखाया जाता है कि उनके भाग्य के अनुसार ही उन्हें मिलेगा। वे कहीं बाहर जाकर कार्य मांगने की जगह पण्डे पुजारियों की शरण में जा पंहुचते हैं जहाँ उन्हें अपना जीवन सफल करने के उपाय बताये जाते हैं। अप्टन सिंक्लेयर के शब्दों में, “मनुष्य को बस आत्मा की अमरता के बारे में विश्वास दिला दो और उसके बाद उसका सब कुछ लूट लो; वह बगैर बड़बडाए इस कार्य में तुम्हारी सहायता करेगा।“ इस प्रकार हम देखते हैं कि हर बड़ा उपदेशक न केवल अपने पीछे लाखों लोगों को मूर्ख बना लेता है अपितु वह अरबपति भी बन जाता है। ऐसे ऐसे उदाहरण देखे गए हैं जहाँ उपदेशों से प्रभावित हुए लोगों ने अपनी समस्त संपत्ति तक बाबाओं को दान कर दी। अभी हाल ही में एक ढोंगी संत रामपाल के ऊपर माननीय उच्च न्यायालय की सख्त कार्यवाही के बाद में जिस प्रकार की बातें सामने आयीं वे किसी भी बुद्धिमान व्यक्ति की आँखें खोलने के लिए पर्याप्त हैं। अपने भक्तों को नपुंसक बनाने के लिए सीबीआई जांच का सामना कर रहे एक अन्य संत राम रहीम की स्वयं की निर्देशित फिल्म MSG जल्द ही रिलीज होगी पर जिस प्रकार से उसके पक्ष एवं विपक्ष में प्रदर्शन किये जा रहे हैं उससे इस समस्या का वीभत्स स्वरुप सामने आता है। जिस प्रकार समस्त सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म को रिलीज करने के लिए केंद्र के किये दखलंदाजी के बाद इस्तीफा दे दिया। इसके बावजूद भी सरकार का कोई प्रतिनिधि सामने नहीं आया। धर्म एवं राजनीति के घालमेल का इस से श्रेष्ठ उदहारण नहीं मिलेगा। मताधिकार को भारत में किसी भी नागरिक के मौलिक अधिकारों में शामिल किया जाता है एवं हर नागरिक के पास गुप्त मतदान का अधिकार है। इसके अतिरिक्त यह देखने योग्य है कि हर नागरिक अपना स्वयं का मत देने के लिए स्वतंत्र है। पर जिस प्रकार से संत राम रहीम ने मीडिया के सामने आकर जिस प्रकार अपने भक्तों को हरियाणा विधान सभा चुनावों में भाजपा के लिए मत डालने के लिए कहा एवं जिस प्रकार से बूथों पर भाजपा के लिए मत डालने वालों की पंक्तियाँ लगीं उस से धर्म एवं राजनेताओं का एक खतरनाक गठबंधन सामने आ जाता है। इस गठबंधन से चलता है वह खेल जो आम जनता को इस प्रकार मूर्ख बनाता है कि फिर हम सोचते ही रह जाते हैं। पुराने समय के राजा आज के समय के राजनेता हैं; वे ठीक उस ही प्रकार राज के लिए धर्म का प्रयोग कर रहे हैं जिस प्रकार कभी राजाओं ने किया था। यही एक कारण है कि धर्म के नाम पर स्वतंत्रता को बाँधने का अनैतिक सिलसिला अब भी जारी है। पर मुश्किल की बात यह है कि हम अपने भूतकाल से शिक्षा लेने के लिए तैयार नहीं हैं। संविधान की दी हुई स्वतंत्रता को पाने में भारत के नागरिक को अभी कितने वर्ष और लगेंगे यह कहना बड़ा मुश्किल है। कम से कम अगले सौ वर्ष तक तो यह संभव नहीं लगता।

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