Indus Water Treaty and India Now

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1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच सिन्धु जल समझौता हुआ था. इस समझौते को समझने से पहले इस सिस्टम को समझना आवश्य है. सिन्धु जल सिस्टम दो भागों में बंटा हुआ है; पूर्वी एवं पश्चिमी. पश्चिमी सिस्टम में सिन्धु, झेलम और चेनाब आती हैं तो पूर्वी सिस्टम में सतलुज, ब्यास और रावी आती हैं. समझौते के आर्टिकल 3 व 4 के अनुसार पूर्वी सिस्टम के पानी का इस्तेमाल करने का भारत को पूर्ण हक़ है जबकि पश्चिमी सिस्टम को पाकिस्तान उपयोग करेगा. पश्चिमी सिस्टम में भी कुछ अधिकार भारत के पास हैं. फिलहाल इस संधि पर वृहद चर्चा की आवश्यकता नहीं क्योंकि मुद्दा संधि का नही अपितु इस बात का है कि उरी अटैक के बाद उमड़े दबाव के बाद भारत सरकार ने यह अंदेशा व्यक्त किया है कि भारत अब इस संधि को रद्द कर सकता है क्योंकि पाकिस्तान और भारत के आपसी रिश्ते विश्वास पर चलेंगे. यदि पाकिस्तान उग्रवाद को ऐसे ही बढाता रहा तो भारत भी अब ऐसी संधियों को रद्द करने के लिए तैयार है. हमें केवल इस पहलू पर चर्चा करनी है.

सबसे पहले हम अपने संविधान के आर्टिकल 51 को समझते हैं. मूल संविधान में शामिल इस अनुच्छेद को इसलिए लागू किया गया था कि सार्वभौमिक राष्ट्र के रूप में भारत अंतर्राष्ट्रीय कानून, अन्तर्राष्ट्रीय संधि आदि को माने. सबसे पहले इसे पढ़ें:

51. Promotion of international peace and security The State shall endeavour to

(a) promote international peace and security;
(b) maintain just and honourable relations between nations;
(c) foster respect for international law and treaty obligations in the dealings of organised peoples with one another; and encourage settlement of international disputes by arbitration

क्लॉज़ (c) स्पष्ट है कि भारत अंतर्राष्ट्रीय संधियों की इज्जत करेगा. अब इससे आगे बढ़ते हैं और अधिक बड़े प्रश्न पर आते हैं. क्या संधि रद्द होने से कोई फर्क पड़ेगा? इसका उत्तर तात्कालिक रूप से नकारात्मक होगा क्योंकि यदि भारत पश्चिम सिस्टम को स्वयम उपयोग करने की सोचता है तो भारत को समझना होगा कि पूर्वी सिस्टम की नदी जैसे सतलुज भारत के अंदर नहीं जन्म लेती. सतलुज चीन से आती है जो हमेशा से पाकिस्तान को शय देता रहा है. इसके अलावा ब्रह्मपुत्र, यमुना आदि नदियाँ भी चीन से ही आती हैं. नदियों के जल का बंटवारा अंतर्राष्ट्रीय कानून के राइपेरियन सिस्टम के अनुसार होता है. सबसे पहले हमें यह समझना होगा.

राइपेरियन सिस्टम क्या है?

चूंकि पृथ्वी एक है और राष्ट्रों की रचना बाद में हुई तो इसके साथ ही एक कानून ने जन्म लिया कि हवा, पानी आदि वस्तुएं राष्ट्र की सम्पत्ति न होकर मानवता के उपयोग के लिए हैं. इसपर कोई राष्ट्र अपना हक़ नहीं जता सकता. राष्ट्र को अपने हिस्से का पानी लेकर आगे बढ़ने के लिए छोड़ना ही होगा. इस ही कानून के कारण पंजाब ने अभी तक SYL का मुद्दा और कर्णाटक ने कावेरी का मुद्दा जीवित रखा हुआ है क्योंकि इस कानून के अनुसार पानी के मुद्दे पर लड़ने का अधिकार केवल उस राज्य को है जहाँ पर उस नदी की धरा प्राकृतिक रूप से बहती है. पंजाब मानता है कि क्योंकि सतलुज प्राकृतिक रूप से हरियाणा में नहीं आती अतः हरियाणा के पास इस मामले के अंदर किसी कोर्ट में जाने का अधिकार नहीं. ऐसे ही कर्णाटक और तमिलनाडू में मामला अटका हुआ है. इस कानून का जन्म प्राकृतिक कानून के तहत ही होता है क्योंकि जल प्राकृतिक रूप से एक जगह से दूसरी जगह पर बहता है और उस जल पर हर एक उस राज्य का अधिकार है जहाँ पर वह जल जाता है.

भारत क्या कर सकता है?

चूंकि सिन्धु के पूर्वी और पश्चिमी दोनों सिस्टम की नदियाँ प्राकृतिक रूप से पाकिस्तान की और बहती हैं तो उसे रोका नहीं जा सकता. हाँ किसी संधि के द्वारा कंट्रोल किया जा सकता है जैसे कि सिन्धु जल संधि में किया गया है. जहाँ पूर्वी सिस्टम में बाँध आदि बना कर रोकने का अधिकार भारत के पास है वहीँ पश्चिम सिस्टम में यह अधिकार पाकिस्तान को दिया गया. चूंकि पूर्वी सिस्टम में सतलुज आदि चीन (तिब्बत) से आती है तो वहाँ पर भारत बाँध आदि बनने का विरोध राइपेरियन सिस्टम के अनुसार ही करता रहा है. इस सिस्टम को तोड़कर क्या भारत सुनिश्चित कर पायेगा कि ब्रह्मपुत्र, सतलुज, यमुना आदि को चीन भारत में आने से बाधित न करे; क्योंकि चीन पाकिस्तान का पार्टनर है. हालांकि द्विपक्षीय समझौते को रद्द करने का अधिकार भारत के पास है पर इस बेहद उलझे हुए मुद्दे पर लम्बे समय तक राजनीति करना भारत के वश में इसलिए नहीं है क्योंकि भारत को भी नदियाँ इस सिस्टम से ही मिलती हैं. आगे भारत का पानी रोक दिया जाएगा और उसके नतीजे अधिक गंभीर होंगे.

हम क्या करें?

जैसे भी हो पर पकिस्तान को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कमजोर करने के लिए हर एक सरकारी कदम की हमें अनुशंसा करनी चाहिए बशर्ते कि वह भारत का लम्बे समय में नुक्सान न करे. अतः यदि भारत यह सुनिश्चित कर सकता है कि चीन विरोध नहीं करेगा तो भारत को अवश्य इस और एक बार कदम बढाने चाहियें; हालांकि पाकिस्तान के अंतर्राष्ट्रीय कोर्ट में जाने के बाद इसे बचाना लगभग असंभव हो जायेगा. यदि पाकिस्तान शिमला समझौते का सम्मान नहीं करता तो भारत सिन्धु जल समझौते का सम्मान क्यों करे? बेशक से दोनों समझौते अलग अलग मुद्दे को लेकर हों. भारत को चाहिए कि पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिए अफगानिस्तान और रूस का इस्तेमाल करे. वहीँ दूसरी ओर बलूचिस्तान के मुद्दे को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बार बार उछाले. इस कदम पर हम सरकार का साथ देंगे बशर्ते सरकार भारत में आने वाले पानी की सुरक्षा सुनिश्चित करे.

सिन्धु जल समझौते को पढ़ें: डाउनलोड

 

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