Reservation on Economic Basis; its validity and future

rsdhull मुद्दे, राजनैतिक विश्लेष्ण Leave a Comment

कल माननीय पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के कालिंदी वशिष्ठ बनाम हरियाणा सरकार नामक मामले में यकायक लगी आर्थिक आरक्षण पर रोक से समस्त सरकार सकते में है. इसने एक बड़ी डिबेट को हरियाणा में जन्म दे दिया है कि क्या आर्थिक आरक्षण होना चाहिए या नहीं? अगर यह होना चाहिए तो इसकी कानूनी वैद्यता क्या है? इसे स्टेप के अनुसार समझते हैं:

इतिहास:

भारत के संविधान के अधिनियम 16 में आरक्षण का प्रावधान है. इसका क्लोज 4 कहता है:

“(4) Nothing in this article shall prevent the State from making any provision for the reservation of appointments or posts in favor of any backward class of citizens which, in the opinion of the State, is not adequately represented in the services under the State.”

यानि संविधान के अनुसार यदि किसी बैकवर्ड क्लास को राज्य की नौकरियों में पर्याप्त हिस्सा नहीं मिल रहा है तो उस परिस्थिति में सरकार आरक्षण का प्रावधान कर सकती है.  इसके अलावा अधिनियम 15 का क्लोज 4 कहता है:

“(4) Nothing in this article or in clause ( 2 ) of Article 29 shall prevent the State from making any special provision for the advancement of any socially and educationally backward classes of citizens or for the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes”

यानी सामाजिक अथवा शैक्षणिक रूप से पिछड़े हुए लोगों के लिए सरकार विशेष प्रावधान किया जा सकता है.

उपरोक्त दोनों अधिनियमों को आधार बना कर ही भारत में पिछड़े वर्ग को आरक्षण दिया जाता है. मंडल कमीशन आने के बाद मामला सुप्रेम कोर्ट गया था. इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार नामक फैंसले में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आरक्षण का प्रावधान सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए किया जा सकता है. फैंसले के पैरा 867 में केवल आर्थिक आधार पर दी गयी रिजर्वेशन को ख़ारिज किया गया है.

वर्तमान स्वरूप:

2013 में तात्कालीन कांग्रेस सरकार ने हरियाणा में एक एग्जीक्यूटिव इंस्ट्रक्शन से हरियाणा में आर्थिक रूप से पिछड़ों को दस प्रतिशत आरक्षण दिया था. उस नोटिफिकेशन को यहाँ पढ़ें (Download). इससे पहले जाट एवं चार अन्य जातियों को भी आरक्षण ठीक इस ही प्रकार दिया गया था.चुनावों से पहले दिए गये इस आरक्षण को सीधे सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया गया जिसमें केंद्र सरकार द्वारा दिए गये आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट ने यह कह कर ख़ारिज कर दिया कि केवल आर्थिक रूप से पिछड़ा होना आरक्षण का आधार नहीं. इसके लिए सामाजिक रूप से पिछड़ा होना भी जरूरी है. चूंकि जिस कथित कमिशन के आधार पर आरक्षण दिया गया था वह रिपोर्ट NCBC ने ख़ारिज कर दी थी; सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण को ख़ारिज कर दिया. सुप्रीम कोर्ट का फैंसला यहाँ पढ़ें (फैंसले की प्रति)

इंदिरा साहनी को यदि सरकार ने पढ़ा होता तो उसे समझ आ जाना चाहिए था कि आर्थिक आधार पर आरक्षण को अधिनियम 15 व 16 में संशोधन के बिना नहीं दिया जा सकता. या तो सरकार को पता था अतः वह जान बूझ कर ऐसा कर रही थी अथवा सरकार के कानूनी सलाहकार ऐसे थे कि वे सरकार के अंदर इतनी मौलिक कानूनी बुद्धि नहीं ला पाए. पहले की सम्भावना अधिक है क्योंकि सरकार के पास बहुत बड़ी टीम थी जो इस मामले में सलाह देने में सक्षम थी. मुख्यमंत्री स्वयम वकील ही तो थे. मामले को विधानसभा में ले जाना भी उचित नहीं समझा गया.क्या इंस्ट्रक्शन भारत के संविधान के बाहर जारी की जा सकती है? कोई भी आम वकील इसका उत्तर नकारात्मक देगा. भारत में संविधान सर्वोपरी है. अधिनियम 340 के प्रावधान के तहत संशोधन किये बिना आर्थिक आरक्षण दिया ही नहीं जा सकता था. अतः इस गैर कानूनी आरक्षण पर हाई कोर्ट ने 22 सितम्बर को रोक लगा दी. हाई कोर्ट का ऑर्डर पढ़ें(डाउनलोड). इस मामले में गुजरात उच्च न्यायालय के उस निर्णय का उद्धरण भी किया गया है जिसमें अगस्त 2016 में गुजरात में आर्थिक आरक्षण को ख़ारिज कर दिया गया है. फैंसला यहाँ पढ़ें ( Download).

भाजपा की कारस्तानी:

कांग्रेस की कारस्तानी का जिक्र हो और भाजपा बच जाए ज़रा मुश्किल है. भाजपा सरकार आने के बाद हरियाणा में आरक्षण को लेकर एक व्यापक आन्दोलन हुआ; उस आन्दोलन के समय 17 फरवरी को हरियाणा सरकार के द्वारा कहा गया कि आर्थिक आधार की सीमा 10 से बढ़ा कर 20 कर दी जाएगी और इनकम सीलिंग को बढ़ा कर 6 लाख कर दिया जायेगा. इसके बाद हरियाणा विधानसभा में मार्च के अंत में आरक्षण का बिल पेश हुआ. इस बिल को जब केबिनेट ने पास किया तो उसमें आर्थिक आधार के आरक्षण को भी बिल में शामिल किया गया था. पर जब बिल विधानसभा में पेश हुआ तो आर्थिक आरक्षण को चुपके से काट दिया गया और जो बिल पास हुआ उसमें केवल BC-C का जिक्र था जिसमें जाट व पांच अन्य जातियों को आरक्षण की अनुशंसा उस ही रिपोर्ट के आधार पर की गयी जिसे पहले ही ख़ारिज किया जा चुका है. मतलब साफ़ है; सरकार यह जानती थी कि गुप्ता आयोग के आधार पर यदि आरक्षण दिया गया तो वह टिकेगा नहीं अतः उसके आधार पर दिया जाए. इस आशय को लेकर राम सिंह फैंसला स्पष्ट है. दूसरा सरकार जानती थी  कि आर्थिक आधार पर आरक्षण को वैधानिक आधार न दिया जाए क्योंकि यह कोर्ट में टिकेगा नहीं. जब यह ख़ारिज होगा तो बुराई कांग्रेस की होगी न कि भाजपा की. अगली बात चूंकि इनकम को बढ़ा कर 6 लाख सालाना कर दिया गया है तो कोई भी कोर्ट इसे आसानी से देख लेगी कि 50000 मासिक कमाने वाले को सरकार पिछड़ा मान रही है; जो कि गैर कानूनी है.

 

कांग्रेस और भाजपा ने मिल कर आम जन को मूर्ख बनाया; जिसका नतीजा आज सामने है. आर्थिक आधार पर आरक्षण तब तक नहीं दिया जा सकता जब तक संविधान में संशोधन न हो; इसके अलावा देखना होगा कि कहीं फिर इसे संविधान की मूल भावना के विरुद्ध मान कर न ख़ारिज कर दिया जाये.

हालांकि मैं आर्थिक आरक्षण के विरोध में नहीं पर इसे लेकर जो राजनीति की जा रही है उसका विरोधी अवश्य हूँ. जाट व अन्य जातियों को आरक्षण देने के बाद आर्थिक आधार पर आरक्षण पर किसी को भी दिक्कत नहीं होनी चाहिए क्योंकि आखिर आरक्षण का असली उद्देश्य गरीबों को ऊपर उठाना ही तो है.

 

 

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