Law of Sedition

rsdhull निजी विचार Leave a Comment

कल से रोहतक वासी सुरेन्द्र दुहन पर लगाये गये देश द्रोह के केस का मामला सोशल मीडिया पर उछल रहा है. इसके कानून के बारे में कुछ बात करना चाहता हूँ. देश द्रोह सेक्शन 124A IPC में डिफाइन किया गया है जो निम्न कहता है:

124A. राजद्रोहजो कोई बोले गए या लिखे गए शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा, या दृश्यरूपण द्वारा या अन्यथा भारत में विधि द्वारा स्थापित सरकार के प्रति घॄणा या अवमान पैदा करेगा, या पैदा करने का, प्रयत्न करेगा या अप्रीति प्रदीप्त करेगा, या प्रदीप्त करने का प्रयत्न करेगा, वह आजीवन कारावास से, जिसमें जुर्माना जोड़ा जा सकेगा या तीन वर्ष तक के कारावास से, जिसमें जुर्माना जोड़ा जा सकेगा या जुर्माने से दंडित किया जाएगा ।

स्पष्टीकरण 1–“अप्रीतिपद के अंतर्गत अभक्ति और शत्रुता की समस्त भावनाएं आती हैं ।

स्पष्टीकरण 2घॄणा, अवमान या अप्रीति को प्रदीप्त किए बिना या प्रदीप्त करने का प्रयत्न किए बिना, सरकार के कामों के प्रति विधिपूर्ण साधनों द्वारा उनको परिवर्तित कराने की दृष्टि से अननुमोदन प्रकट करने वाली टीकाटिप्पणियां इस धारा के अधीन अपराध नहीं हैं ।

स्पष्टीकरण 3घॄणा, अवमान या अप्रीति को प्रदीप्त किए बिना या प्रदीप्त करने का प्रयत्न किए बिना, सरकार की प्रशासनिक या अन्य व्रिEया के प्रति अनुमोदन प्रकट करने वाली टीकाटिप्पणियां इस धारा के अधीन अपराध गठित नहीं करती ।

इससे पहले सोशल मीडिया को कंट्रोल करने के लिए आईटी एक्ट में धारा 66-A डाली गयी थी जिसे माननीय सुप्रीम कोर्ट ने श्रेया सिंघल बनाम यूनियन ऑफ़ इण्डिया नामक मामले में असंवैधानिक करार कर दिया था. माननीय कोर्ट का कहना था कि आर्टिकल 19 के अनुसार भारत के संविधान में किसी को भी बोलने का अधिकार है और उसे किसी क़ानून के द्वारा कम नहीं किया जा सकता. कोर्ट का कहना था कि आर्टिकल 19(2) के अन्दर सरकार के पास अधिकार हैं पर वे अधिकार भी नागरिक को बोलने की आजादी का उपयोग करने से नहीं रोक सकते. अतः इसे ख़ारिज कर दिया गया. इसका कारण था कि सोशल मीडिया पर कुछ भी लिखने से फिर पुलिस के पास प्रताड़ित करने के अधिकार आ सकते थे. इसका उदाहरण पुलिस ने कुछ केसों में दिया भी. अतः कोर्ट को इसपर संज्ञान लेना पड़ा.

सुरेन्द्र को मैं पिछले लगभग दस माह से पढ़ता रहा हूँ. मैं उनकी बोलने की शैली अथवा शब्दों का कतई भी समर्थन नहीं करता. भाजपा के साथ मेरा भी अलगाव है; मैं भी उसके विरुद्ध बहुत लिखता हूँ. पर इस प्रकार के शब्दों का उपयोग समाज के लिए सही नहीं. पर क्या यह देश द्रोह की श्रेणी में आता है? उपरोक्त धारा को अंग्रेजों के समय डाला गया था. अंग्रेज अपने विरुद्ध हो रहे प्रचार को रोकने के लिए इसका इस्तेमाल करते थे. माननीय अलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अरुण जेटली को समन करने के एक ऑर्डर को ख़ारिज करते हुए कहा था कि विरोध बेशक कितना तीखा क्यों न हो; पर यदि वह देश के विरुद्ध अथवा सरकार के विरुद्ध हिंसा के लिए प्रेरित नहीं करता तो उसे देशद्रोह नहीं माना जा सकता. (आर्डर पढ़ें). बोम्बे हाई कोर्ट ने संस्कार मराठे नामक केस में कहा था कि किसी राजनेता के विरुद्ध उपयोग किये हुए शब्द भले कितने ही कड़े क्यों न हों उन्हें देश द्रोह की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता. (ऑर्डर पढ़ें) यहाँ ध्यान देने योग्य बात ये है कि सरकार के विरुद्ध बोलना अथवा लिखना जब तक कि किसी व्यक्ति विशेष को राष्ट्र अथवा सरकार के विरुद्ध हिंसा करने के लिए सीधे तौर पर प्रेरित नहीं करता तब तक इसे देशद्रोह नहीं माना जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने केदारनाथ बनाम राज्य नामक फैंसले में स्पष्ट तौर पर कहा कि पब्लिक ऑर्डर को स्पष्ट रूप से खराब करने की कोशिश को ही राजद्रोह/देशद्रोह कहा जा सकता है.(ऑर्डर पढ़ें) इस फैंसले को पढने मात्र से देशद्रोह को हम समझ सकते हैं. माननीय कोर्ट कहती है कि राज्य से ऊबने को देशद्रोह नहीं कहा जा सकता जबतक कि राज्य के विरुद्ध बगावत के लिए प्रेरित न किया जा रहा हो.

अब उपरोक्त को यदि हम वर्तमान केस के साथ रखें तो दिखता है कि सुरेन्द्र दुहन अवश्य सरकार के कुछ मंत्रियों के विरुद्ध और सरकार के विरुद्ध हैं पर क्या वे निश्चित रूप से राज्य के विरुद्ध हैं यह ज्ञात नहीं पड़ता. भिंडरावाला आदि का समर्थन करना भी देशद्रोह के दायरे में शायद ही आ पाए जबतक कि उसके नाम पर हिंसा के लिए प्रेरणा दी जाये. सुरेन्द्र के लिखे शब्द भले कितने ही निंदनीय क्यों न हों पर उन्हें देशद्रोह कहना गलत एवं गैरकानूनी रहेगा. मैं स्वयम अपरिहार्य कारणों से काफी माह पहले सुरेन्द्र को अपनी लिस्ट से हटा भी चुका हूँ जब उसने मेरे खिलाफ भी अनर्गल शब्दों का उपयोग किया था. पर कानून सबके लिए एक ही होना चाहिए. यदि बंदूकें लेकर फोटो खिंचवाने वाली साध्वी देवा ठाकुर, साध्वी प्राची, गिरिराज किशोर आदि लोग एक धर्म विशेष के बारे में कुछ भी बोल सकते हैं और सरकार आँखें मूंद लेती है. जब रोशन लाल आर्य जैसे लोग बेहद असभ्य शब्दों का उपयोग कर सरकार के लाडले बने रह सकते हैं; जब उनके खुद के सांसद जातीय दुर्भावना फ़ैलाने के आरोपों का सामना करते हों; उस जगह देशद्रोह का उपयोग करना न केवल नागरिकों में असंतोष की भावना फैलाएगा अपितु उन्हें राज्य का विरोध करने के लिए प्रेरित भी करेगा.

यहाँ मैं FIR की अन्य धाराओं की तरफ बात नहीं कर रहा हूँ और मेरे लेख को केवल मात्र देशद्रोह तक ही सीमित रखा है. धार्मिक दुर्भावना, जातीय असंतोष जैसे मामलों के बारे में मैं कुछ नहीं लिख रहा हूँ क्योंकि उन मामलों पर मैं उनसे असहमत भी हूँ और मेरा स्पष्ट रूप से मानना है कि जातीय गर्व जातीय दंभ में नहीं बदलना चाहिए. स्वयम को बड़ा मानने का मतलब यह नहीं दूसरे छोटे हो जाएँ. कमरे और लुटेरों की लड़ाई में मैं स्वयम को कमरों के साथ पाता हूँ पर स्वयम की शर्तों के साथ. गर्व करता हूँ स्वयम के जाट होने पर; लेकिन निंदा करता हूँ हर एक मिलती गाली की अथवा गलत शब्दों की. दीनबंधु सर छोटू राम की बोली में मानें तो दुश्मन तो पहचान में आ गया है पर बोलना सीखना अभी दूर की कसौटी है.

भारत अखंड था, है और रहेगा. पर भारत की सरकार को अपने नागरिकों के प्रति अपनी जिम्मेदारी का वहन करना ही होगा. अभी तक वह जिम्मेदारी सरकार नहीं निभा रही है; यही असंतोष का प्रमुख कारण है.

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