हिन्दू विवाह अधिनियम की त्रुटियाँ

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समान नागरिक संहिता पर आजकल बहुत बहस चल रही है. हरियाणा के विशेष परिपेक्ष में आपसे अपने कुछ विचार सांझा करना चाहता हूँ.

हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 में बनाया गया वह कानून है जिसके बाद हिन्दू, सिख, बौद्ध एवं जैन धर्मों के विवाह, तलाक आदि को कोडीफाई कर दिया गया था. इससे पहले यह कानून कस्टम से चलता था और कस्टम के अनुसार बहुतेरी कमियां हमेशा से रही हैं. यदि हम हरियाणवी संस्कृति के अनुसार देखें तो हमें वहां बहुत सी कमियां मिलेंगी. हरियाणा में सगोत्र शादी (विशेषकर जाट कौम में) मना है, आमतौर पर देखा जाए तो एक गाँव में शादी भी साफ़ तौर पर मना है. कुछ बड़े गाँव जो राजस्थान के आस पास के इलाके में हैं केवल वहां पर एक गाँव में शादी की जाती है; इसका विशेष कारण यह है कि वहां पर अलग अलग गोत्र के लोग बाहर से आकर भी बसे हैं. इसका एक उदाहरण  चौटाला गाँव है. पिछले कुछ वर्षों में घर से भागकर शादी करने वालों में बहुत जबरदस्त इजाफा हुआ है. ये सब लोग न्यायालय की शरण लेते हैं. कुछ मामले जैसे मनोज-बबली आदि में मामला यहाँ तक बढ़ जाता है कि उनकी हत्याएं तक भी हो जाती हैं. इनका दोष खाप पंचायतों पर मढ दिया जाता है जबकि खापों का पुराना सिस्टम बहुत बढ़िया नींव पर बना हुआ है. अक्सर हरियाणा की खापें बढ़िया सामाजिक निर्णय लेती रहती हैं. मनोज बबली हत्याकांड के बाद जबरदस्ती खापों को बदनाम करने की कोशिश की गयी तब से ही खापों की मांग रही है कि सगोत्र शादी एवं एक गाँव में शादी को गैरकानूनी करार दे दिया जाये क्योंकि यह कस्टम के बिलकुल खिलाफ है. पर आज तक इस आवश्यक सुधार पर सरकारों की कोई बढिया प्रतिक्रिया तक नहीं आई. इसके अलावा एक और बड़ा मुद्दा है बाल विवाह! कानूनन बालविवाह करने को गैरकानूनी अवश्य बना दिया गया है पर विवाह होने के बाद उस विवाह को कानूनी मान्यता दे दी गयी है. इसमें केवल एक कंडीशन रख दी गयी है कि यदि 18 वर्ष उम्र पूरी होने के बाद लड़का अथवा लड़की चाहे तो विवाह को रद्द करा सकते हैं. इसे कोरी कानूनी मूर्खता ही कहा जायेगा. इसके बाद छिप कर शादियाँ होती रहती हैं और माँ बाप के दबाव में आकर पति पत्नी विवाह को जारी रखते हैं. इस कुप्रथा को क्यों नहीं जड़ से समाप्त किया जाता? अगली समस्या है तलाक लेने की बेहद जटिल एवं लम्बी प्रक्रिया. तलाक के मामलों में गवाही को इतना महत्त्व दिया गया है कि अक्सर दोष होते हुए भी पति पत्नी का तलाक नहीं हो पाता. आपसी सहमती के बावजूद भी तलाक कमसे कम 6 माह लेता है. यदि शादी की शुरुआत से ही अनबन हो तो भी कम से कम एक वर्ष का समय अलग से दिया गया है. यानि पुरुष अथवा महिला में से एक को अत्याचार, तंग करने का कानूनी अधिकार कम से कम डेढ़ साल तो है ही.

मैं समझ नहीं पाता हूँ कि इन मूर्खताओं को अभी तक किसके दबाव में जारी रखा जा रहा है. उत्तरप्रदेश चुनाव में सियासी फायदा उठाने के लिए दिन रात एक कर रही सरकार को उपरोक्त कमियां क्यों नहीं नजर आ रही? क्या हरियाणा की खाप पंचायतों की आवाज उनके लिए कोई महत्त्व नहीं रखती? यदि रखती है तो क्यों अभी तक उपरोक्त सुधर नहीं किये गये. यदि नहीं रखती तो खाप पंचायतों के प्रतिनिधियों को अब सरकार को लड्डू खिलाने बंद कर देने चाहियें.

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