समान नागरिक संहिता

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Uniform Civil Code अर्थात समान नागरिक संहिता एक ऐसा स्वप्न था जिसके अनुसार भारत के सभी नागरिकों को एक ही कानून से देखा जाये. जहाँ फौजदारी, संवैधानिक आदि कानून सभी नागरिकों पर एक समान लागू होते हैं तो वहीँ पर्सनल ला अर्थात निजी कानून जिनमें शादी, ब्याह, संपत्ति आदि शामिल हैं उन सब में व्यक्ति के ऊपर लागू कानून उनके धर्म के अनुसार तय किये जाते हैं. जब अंग्रेज भारत में आये तो उन्होंने भारत में फैले जबरदस्त असमान कानूनों को देखा. जहाँ हिन्दू मिताक्षरा, दयाभागा आदि विधाओं से चलते थे तो वहीँ मुस्लिमों को उनके निजी धर्म के अनुसार कार्य करने की इजाजत थी. रोमन कानून एवं ब्रिटिश कानून को निजी कानून में घुसाने की कोशिश का न केवल विरोध हुआ अपितु यह करना अंग्रेजों के लिए भी दूभर था. 1937 में भारत में शरियत एक्ट लागू हुआ जिसके अनुसार मुस्लिम अपने स्वयम के धर्म के अनुसार शासित होंगे. तलाक, शादी, सम्पत्ति आदि विवादों में मुस्लिमों के स्वयम के कानून को देखा जाता था. भारत के आजाद होने के तुरंत बाद सरकार ने हिन्दुओं के कानून को बदल कुछ महत्त्वपूर्ण कुरीतियाँ समाप्त कर दीं. बहु विवाह आदि कुरीतियाँ समाप्त कर दी गयी. हिन्दू विवाह अधिनियम के अनुसार दूसरी शादी गैरकानूनी करार दे दी गयी. तलाक को शामिल कर दिया गया. हिन्दू विधि के अनुसार शादी एक पवित्र बंधन है और इसे तोड़ने की इजाजत किसी को नहीं थी. पर इसे शामिल किया गया. यह एक आवश्यक सुधार था. इसके बाद आये कानूनों में सम्पत्ति का बंटवारा, बच्चों की कस्टडी आदि को भी शामिल कर दिया गया. आज के दिन हिन्दू, मुस्लिम, सिख, बुद्ध, जैन एवं ईसाईयों के लिए एक समान कानून है जिसमें थोड़ी विविधताएँ उनके धर्म के अनुसार डाली गयी हैं पर तलाक का अधिकार कोर्ट को दे दिया गया है एवं बहु विवाह को गैरकानूनी बना दिया गया है. पर मुस्लिम धर्म को किसी भी सरकार ने नहीं छेड़ा. संविधान के अनुच्छेद 44 के अनुसार राज्य के लिए समान नागरिक संहिता लागू करना संवैधानिक प्रतिबद्धता है. जहाँ कांग्रेस इस प्रतिबद्धता को लागू न कर वोट तुष्टिकरण करती रही वहीँ भाजपा ने इसे लागू करने के नाम पर तुष्टिकरण प्रारंभ किया है. संविधान निर्माताओं ने स्पष्ट रूप से यह माना था कि आने वाले समय में समान नागिरक संहिता की आवश्यकता पड़ेगी. अतः अनुच्छेद 44 को शामिल कर दिया गया और राज्य पर छोड़ दिया गया कि इसे कब तक लागू करे. जहाँ संविधान सभा के हिन्दू मेम्बर्स ने कहा कि इसे लागू किया जाये वहीं मुस्लिम मेम्बर इसके सख्त खिलाफ थे. संविधान सभा में भी इस बारे में बहुत जबरदस्त बहस हुई और अंततः इसे संविधान का हिस्सा मान लिया गया (पढ़े संविधान सभा की डिबेट)

भारतीय कानून के अनुसार पुरुष को अपनी पत्नी की देखभाल के लिए मुआवजा देना जरूरी है. इस प्रावधान को कानून में शामिल कर सेक्शन 125 Cr.P.C. में डाल दिया गया है. वहीँ मुस्लिम कस्टम के अनुसार पुरुष की जिम्मेदारी केवल इद्दा पीरियड तक होती है. यह पीरियड आम तौर पर तीन माह का होता है. सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को बेगम शाह बानो मामले में मुस्लिमों पर लागू कर दिया. इसके बाद हुए प्रदर्शनों के बाद राजनैतिक फायदा उठाने के लिए शाह बानो मामले को पीछे धकेलने के लिए कांग्रेस सरकार ने नया कानून बना दिया. यह न्यायपालिका की स्वायत्तता पर तो हमला था ही; साथ ही समानता के अधिकार पर भी था. कैसे मुस्लिम महिला के पास वे अधिकार नहीं थे जो हिन्दू महिला के पास थे.

संविधान के Article 14,15, 21 के अनुसार समानता, जीवन का अधिकार सभी नागरिकों को है और महिला के साथ भेदभाव गैर कानूनी बताया गया है.  Universal Declaration of Human Rights के Article 22 के अनुसार, International Covenant on Economic and Social Rights 1966 के Article 3 और 25 के अनुसार, International Covenant on Civil and Political Rights 1966 के Article 23 के अनुसार और The Declaration on Elimination of all Discriminations against Women 1979 के Article 2(f) के अनुसार महिला के साथ भेदभाव गैरकानूनी है. यह बताने की जरूरत नहीं की संविधान के अनुच्छेद 50 के अनुसार भारत के लिए अंतर्राष्ट्रीय कानूनों को मानने की बाध्यता है.

सुप्रीम कोर्ट के सरला मुदगिल फैंसले में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को समान नागरिक संहिता पर कार्य करने के लिए कहा, हालाँकि लिली थोमस केस में थोडा सा कंफ्यूजन बढ़ गया पर बाद में आये निर्णयों में कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया कि सही समय आ गया है जब समान नागरिक संहिता की ओर सरकार कदम बढाये. मुस्लिमों के ऊपर भी समान संहिता लागू करने के पीछे उनके धर्म की दो बुराइयां मुख्यतय कही जा सकती हैं. पहली है ट्रिपल तलाक जिसके अनुसार पुरुष काजी के सामने तीन बार तलाक बोलने मात्र से ही महिला से तलाक हासिल कर सकता है वहीँ महिला के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं. दूसरी और अधिक महत्त्वपूर्ण बुराई है बहुविवाह जिसके अनुसार मुस्लिम पुरुष के पास चार शादियों का अधिकार है वहीँ मुस्लिम महिला अथवा भारत के किसी अन्य नागरिक के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं है. जहाँ एक साथ एक से अधिक विवाह कानूनी अपराध है वहीँ इसे निश्चित सामाजिक बुराई कहा जा सकता है. कोई कारण नहीं है कि जहाँ तुर्की, मोरक्को और यहाँ तक की पाकिस्तान में भी इन बुराइयों को खत्म कर दिया गया है तो उन्हें भारत में जारी रखा जाए. आज तक भारत में जो किया गया वह वोट बैंक के लिए किया गया. आज इसे हटाने के लिए भी जिस प्रकार सरकार पोपुलर वोट बैंक अपने पक्ष में करने का प्रयास कर रही है वह हैरानी वाला है. संवैधानिक बाध्यता होने के बावजूद भी सरकार हिन्दू धर्म के अपने वोट बैंक को इस प्रकार के सन्देश दे रही है कि उसने मुस्लिमों से उनका यह हक़ छीन लिया और अब हिन्दुओं को खुश हो जाना चाहिए. ऐसा नहीं है कि हिन्दू धर्म से बुराइयाँ समाप्त हो गयी हैं. दहेज़ प्रथा, पर्दा प्रथा अभी भी हिन्दुओं में चल रही है. महिलाओं को सम्पत्ति से वंचित करने के लिये क्या क्या नहीं किया जाता है यह बताने की आवश्यकता नहीं है.

सरकार को चाहिए कि अपनी संवैधानिक बाध्यता को पूर्ण करे. उसे यह भी नहीं भूलना चाहिए कि लिली थोमस का फैंसला उनकी पिछली सरकार के दौरान आया था जहाँ पर सरकार ने समान नागरिक संहिता का विरोध किया था और कहा था कि यह कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से बाहर की बात है. सरकार को यह भी चाहिए कि अपने हिन्दू कार्यकर्ताओं को यह संदेश देने का कार्य करे कि मुस्लिम धर्म के अंदर आवश्यकता से अधिक दखल दे अपने वोट बैंक को साधने का प्रयास न करे. यह मुद्दा वोट बैंक का नहीं है. यह एक आवश्यक सुधार है और आज नहीं तो कल सरकार को लाना ही होगा. इस प्रकार की कुरीतियों का देश में कोई स्थान नहीं. पर इसे सरकार और मुस्लिम समुदाय के बीच का मामला समझ हिन्दू समुदाय को इससे बिलकुल अलग रहना चाहिए और सरकार को अपनी तरफ से सलाह आदि निजी तौर पर दे न कि धार्मिक तौर पर क्योंकि बुराइयाँ हिन्दू धर्म में कम नहीं हैं जिन्हें खत्म करने के लिए उनकी आवश्यकता पड़ेगी. हिन्दू धर्म को मानने वाले और खासकर भाजपा के कार्यकर्ताओं को चाहिए वे पर्दा प्रथा, लडकियों को कोख में मारना, दहेज हत्या और घरेलू हिंसा के विरुद्ध लडे और सरकार व कोर्ट को अपना कार्य करने दे.

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