वित्त प्रबन्धन में पिछड़ा हरियाणा; दो साल विनाश के

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हरियाणा सरकार के दो वर्ष पूरे होने पर यह मेरा दूसरा लेख है जिसमें मैं राज्य के वित्तीय प्रबंध के बारे में बात करूंगा. जैसा कि मैंने कहा था कि किसी भी राज्य के तरक्की के कुछ ही पैमाने होते हैं; उन पैमानों में वित्त भी प्रमुख है.

वित्तीय प्रबंध:

हरियाणा को बने 50 वर्ष पूरा होने में कुछ ही दिन बाकि हैं. इन पचास वर्षों में हरियाणा एक फेल स्टेट से भारत के सर्वाधिक तरक्की शील राज्यों में शामिल हो गया है. यह विभिन्न सरकारों की सजगता एवं हरियाणा वासियों की उद्यम शीलता का प्रमाण है. सभी सरकारों ने अलग अलग घोषणाएं की, कुछ बहुत बड़े कदम भी उठाये गये जिनका आम जनमानस पर बड़ा असर हुआ जैसे बुढ़ापा पेंशन. जननायक चौधरी देवी लाल जी के इस फैंसले को सम्पूर्ण भारत में विभिन्न राज्यों ने लागू किया; हालांकि शुरुआत में इस योजना को असंभव बताया गया था पर यह फैंसला मील का पत्थर बना. ऐसे ही एक योजना थी किसानों के कर्जे माफ़ी की योजना जो जननायक चौधरी देवी लाल जी ने ही लागू की. इसे भी असंभव बताया गया था; पर इसे बाद में समस्त भारत में कई राज्यों में लागू किया गया. ऐसे ही चौधरी बंसी लाल जी के समय पर समस्त हरियाणा के लगभग पांच हजार गाँवों में दो वर्ष के अंदर अंदर बिजली लाई गयी थी. 2005 में जब इनेलो की सरकार गयी उस समय पर हरियाणा पर कुल कर्जा लगभग 23000 करोड़ था. यह कर्ज हरियाणा बनने के 38 वर्ष का कुल कर्ज था जो कि लिमिट में था और इसे बहुत बढ़िया वित्तीय प्रबंध का मानक माना जा सकता है. लेकिन 2005 से 2014 के बीच यह कर्ज 23000 करोड़ से बढ़ कर लगभग 84000 करोड़ पर पंहुच गया. स्पष्ट था हरियाणा की स्थिति खराब होनी शुरू हो गयी थी. इसे हम बेजा जमीन अधिग्रहण आदि बहुत से कार्यों का परिणाम बता सकते हैं. हालाँकि इसके अन्य कारण भी रहे होंगे जिनकी चर्चा यहाँ छोटे आर्टिकल में नहीं की जा सकती. चूंकि हम भाजपा के वित्तीय प्रबन्धन की चर्चा कर रहे हैं अतः 2014 से आज तक के डेटा को हम देखते हैं. मार्च 16 के बजट सेशन के दौरान पेश हुए आंकड़ों के अनुसार आज वह कर्ज बढ़ कर 141000 करोड़ पंहुच गया है. यानि दो वर्ष में हरियाणा सरकार ने प्रतिवर्ष के हिसाब से 30000 करोड़ के आस पास कर्ज लिया. 38 वर्ष के कुल कर्ज से अधिक प्रतिवर्ष हरियाणा सरकार ले रही है.

आखिर यह लग कहाँ रहा है? 600 करोड़ तो सरकार ने केवल मात्र स्वर्ण जयंती के आयोजन पर खर्च का अनुमान बनाया है. इसके अतिरिक्त 1700 करोड़ का अलग खर्च इस समारोह पर किया जायेगा. याद नही पड़ता पिछले दो वर्षों में कोई बड़ा प्रोजेक्ट ही हरियाणा में आया हो. प्रमुख सडकें PPP मोड में बन रही हैं; अतः उसका खर्च सरकार के सर पर नहीं. पंचायतों को कोई ग्रांट नहीं दी जा रही; जिनके विरोध में सरपंच और जिला परिषद के मेम्बर तक भी लामबंद हो चुके हैं. हरियाणा की वित्तीय राजधानी गुरुग्राम में कोई पैसा नहीं लगाया गया है. हालांकि गुडगाँव का नाम बदलकर गुरुग्राम करने पर अनुमानतः खर्चा 2000 करोड़ के आसपास आने का अंदेशा जताया जा रहा है. यह खर्चा नए नाम की ब्रांडिंग से लेकर सोफ्टवेयर में बदलाव से लेकर विभिन्न कार्यों में किया जायेगा. क्या इसे अच्छा वित्तीय प्रबंध कहा जा सकता है? आखिर जरूरत क्या आन पड़ी थी कर्ज में डूबे हरियाणा के अंदर और कर्ज लाद कर. क्या गुडगाँव खुद एक ब्रांड नहीं था? या ये बोम्बे आदि की तरह कोई विदेशी नाम था? इसका जवाब सरकार को देना ही होगा कि वह इतना कर्ज आखिर ले क्यों रही है? एक ही विशेष बात देखने में आती है वह है बिजली कम्पनियों का घाटा जिसे सरकार ने अपने ऊपर लिया है. बेहद महंगे रेट्स पर बिजली खरीद कर सस्ते में हरियाणा के ग्राहकों को देना एक बहुत बड़ा कारक रहा है; जिसकी वृहद जांच की आवश्यकता है पर उसकी जांच करने की जगह यह सरकार नई कम्पनियों से अग्रीमेंट की ताक में घूम रही है. 2000 करोड़ से ऊपर ऐसी कम्पनियों को दिए जा चुके हैं जिनसे एक यूनिट भी बिजली नहीं खरीदी गयी है और सरकार उन अग्रीमेंटस को अभी भी ख़ारिज नहीं कर रही है. क्या यह वित्तीय कुप्रबन्धन नहीं है? कांग्रेस सरकार के दौरान जो गैरकानूनी कार्य हुए उनका हिसाब आने वाली सरकार को लेना चाहिए था. पर नहीं लिया गया. अब आप बिजली के अंदर यमुनानगर प्लांट के अंदर लगे संयंत्रों को ही देख लें. ये सीधे चीन से खरीदे गये और मिडल कम्पनी रिलायंस को रखा गया. जब से संयंत्र लगे हैं वे चालू नहीं हो पाए हैं और तकनीक ऐसी है कि पूरे संयंत्र को उतार कर चीन भेजना होता  है और उनका एक इंजिनीयर तक यहाँ मौजूद नहीं. इस सब पर 600 करोड़ से अधिक खर्चा किया जा चुका है. क्या खराब मशीनरी खरीदना घोटाला नहीं है? जब यह सरकार के संज्ञान में है तो सरकार क्यों कांग्रेस और रिलायंस के विरुद्ध कार्यवाही से बच रही है? ऐसे कुछ मिला कर लगभग 34000 करोड़ का कुल नुक्सान सरकार ने अपने सर पर लिया है पर पुरानी बेईमानियों के लिए जांच नहीं करवा रही है. इसे प्राइवेट कम्पनियों को फायदा पंहुचाने की भाजपा और कांग्रेस की संयुक्त नीति ही कहा जा सकता है. चंडीगढ़ के अंदर किसी अफसर अथवा मंत्री की ऐसी कोठी नहीं जिस पर पिछले दो वर्षों में बार बार रेनोवेशन का खर्च नहीं हुआ. औसतन आम से आम कोठी पर भी बीस लाख से अधिक खर्च हो चुका है. विधायकों के लिए बने होस्टल पर प्रति कमरा 21 लाख का औसतन खर्च किया गया है जबकि मैटेरियल वगैरा मिला कर वह खर्च 5 लाख से भी कम बनता है. मुख्यमंत्री ने अपने लिए दो लैंड क्रूजर खरीदी तो एक हवाई जहाज और हेलिकोप्टर भी खरीदा गया. सभी मंत्रियों के लिए नई गाडिया ली जा चुकी हैं. मुख्यमंत्री के निजी स्टाफ में लगभग 25 लोग शामिल हैं जिनमें 19 तो केवल OSD ही हैं. Minimum Government, Maximum Governance के कथित नारे के साथ आई सरकार ने फिजूल खर्ची में रिकोर्ड तोड़ दिए हैं और हरियाणा में कर्जा बढ़ कर डेढ़ लाख करोड़ के आस पास जा पंहुचा है.

आप सबके सुझाव आमंत्रित हैं; कृपया बताएं क्या मैं कुछ छोड़ रहा हूँ?

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