बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य की दृष्टि से हरियाणा सरकार के दो वर्ष

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26 अक्तूबर को भाजपा सरकार के दो वर्ष पूरे हो गये हैं. इस अवसर पर सरकार के द्वारा बहुत बड़ी बड़ी बातें भी की गयीं तो दूसरी ओर ये दावे भी किये गये. आइये परखते हैं दावों को सच्चाई के साथ:

किसी भी राज्य में सही उन्नति एवं तरक्की के कुछ प्रमुख पैमाने होते हैं. इनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, व्यापार आदि मुख्य हैं. आइये टटोलते हैं इन सब सेक्टर्स में से तीन प्रमुख सेक्टर्स को:

स्वास्थ्य:

स्वास्थ्य स्वस्थ लोकतंत्र का प्रथम पैमाना रहेगा. यदि नागरिकों को स्वास्थ्य जैसी मूल भूत सुविधाएँ ही उपलब्ध नहीं होंगी तो तरक्की बेमानी है. भाजपा के द्वारा कुछ बड़े वायदे इस क्षेत्र के लिए किये गये थे. डाक्टरों की कमी पूरी की जाएँगी,  दो लाख से कम इनकम वाले परिवारों को मुफ्त इलाज, स्वास्थ्य सुविधाएँ बढाना आदि कई वायदे किये गये थे. इन्हें हकीकत पर तोलते हैं. हरियाणा में डाक्टरों के स्वीकृत पदों की संख्या 5620 है जिसमें से 3280 पद खाली हैं. हरियाणा की ढाई करोड़ जनसंख्या के पास केवल 2340 डाक्टर हैं. ये आंकड़े यदि उत्साह जनक दिख रहे हों तो जानिये कि पिछले वर्ष डाक्टरों की भर्ती की गयी थी. 700 डाक्टरों में से केवल 300 ने ही ज्वाइन किया. इसके पीछे कई कारण हैं. न हरियाणा में डाक्टरों के लिए बढ़िया सुविधाएँ हैं और न ही बेहतर वेतनमान. OPD का हाल इतना बुरा है कि एक डाक्टर को बमुश्किल आधा मिनट मिलता है एक मरीज को देखने के लिए. ऐसे में उस डाक्टर से आप कैसे बढ़िया इलाज की उम्मीद करेंगे और वह डाक्टर कैसे अपना कार्य सुचारू रूप से कर पायेगा? स्पेशलिस्ट डाक्टरों की बेहद कमी है. इस बारे में मैंने पिछले वर्ष प्रधानमंत्री को पत्र भी लिखा था. यदि पैदा होने वाले 1000 बच्चों में से 42 की मृत्यू हो जाये तो आप समझ सकते हैं कि कहीं मूल भूत कमी है. मेवात में मलेरिया जैसे बिमारी से इस साल ग्यारह मौत बहुत बुरा संदेश दे रही हैं. पिछले वर्ष दस हजार से अधिक डेंगू के मामले हुए; इस वर्ष की गणना बाकि है. चिकनगुनिया के मामले अलग. NHM कर्मचारियों की हडताल पर अलग से चर्चा करेंगे; यह विषय इस विषय से अलग है. सरकार बताये क्या नया किया गया हेल्थ के लिए; सिवाय ट्रांसफर और सस्पेंशन के. मंत्री जी सस्पेंशन और ट्रांसफर में व्यस्त हैं तो दूसरी ओर स्वयम के महकमे के अलावा उन्हें सब कुछ दिखता है.

शिक्षा:

शिक्षा के बिना तरक्की सम्भव नहीं. शिक्षा क्षेत्र का हाल स्वास्थ्य से भी अधिक बुरा है. वर्तमान शिक्षा मंत्री ने गेस्ट टीचरों को धरने पर जाकर कहा था कि सरकार आते ही पहली कलम से गेस्ट टीचर रेगुलर किये जायेंगे. क्या उस समय इन्हें अंदाजा नहीं था कि कोर्ट उनके आड़े आएगी? आज वे कोर्ट का बहाना ले रहे हैं. 36000 पद शिक्षकों के खाली हैं तो लगभग 4000 पद चपड़ासियों के खाली हैं. मेवात में 70 स्कूल केवल इस कारण बंद हो गये कि वहां एक भी टीचर नहीं था. लगभग 80 स्कूल ऐसे हैं जहाँ रिजल्ट जीरो प्रतिशत रहा; अर्थात सभी विद्यार्थी फेल हो गये. सरकार ऑन्लाइन ट्रांसफर को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धी बता रही है तो इसमें हमें विकलांग टीचर और कपल केस का कुछ भी नजर नहीं आता. विकलांग टीचर वाले मामले में कोर्ट के आदेशों की भी अभी तक पालना नहीं हुई है. विकलांग कमिशन के आदेश को भी नहीं देखा जा रहा है. एक्सपीरियंस की जगह उम्र के पॉइंट्स देने जैसे बहुत से ऐसे मामले हैं जो कहीं न कहीं सरकार की मंशा पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं. पंचकुला दफ्तर में कम्प्यूटर ओपरेटर इस मामले में खूब पैसे कूट रहे हैं. यदि हम ऑटोमेटिक ट्रांसफर की बात करते हैं तो हमें लिस्ट देखने पर पता लगता है कि हजारों लोगों को मैन्युअल तरीके से ट्रांसफर किया गया है. तो हम कैसे माने यह भ्रष्टाचार मुक्त मामला है.

बिजली:

बिजली के मामले पर सरकार बड़े बड़े दावे ठोक रही है. इसे हकीकत पर तोलते हैं. हुड्डा सरकार के दौरान बहुत से गैरकानूनी PPA किये गये. इन PPA से सरकार कथित रूप से प्राइवेट कम्पनियों से बिजली खरीदती है. न केवल बहुत से PPA में बहुत महँगी बिजली खरीदी गयी; कुछ PPA तो ऐसे हैं जहाँ पर सरकार पैसा आज भी कम्पनियों को दे रही है पर एक यूनिट भी बिजली नहीं खरीदी गयी है. वह हजारों करोड़ का नुक्सान कौन भुगते और क्यों? उन PPA को भाजपा सरकार ने अभी तक निरस्त क्यों नहीं किया? किस लिए यह बोझ आम आदमी पर डाला जा रहा है? क्या यह भ्रष्टाचार नहीं है? सरकार के द्वारा उज्जवल ग्राम योजना शुरू की गयी. इस योजना के अनुसार लगभग 1000 ऐसे गाँव चिह्नित किये गये जिन गांवों के अंदर सरकार 24 घंटे बिजली देना चाहती है. इसकी शर्त यह है कि वे गाँव अपना पूरा बिजली का बिल भुगतान करें. जब से घोषणा हुई है तब से एक भी गाँव के अंदर ऐसा नहीं हो पाया है. योजना पूर्ण रूप से फ्लॉप साबित हुई. ट्यूबवेलों में दी जाने वाली औसत बिजली घट कर 8 घंटे तक आ गई है. कांग्रेस सरकार के दौरान यह औसत 12 घंटे और इनेलो सरकार के दौरान 16 घंटे थी. यूनिट का रेट इतना महंगा किया जा चुका है कि बिजली का बिल बढ़ कर लगभग तीन गुना हो गया है. सरकार पुराने PPA रद्द करना तो दूर नये PPA महंगे दामों पर करना चाहती थी. इसपर HERC ने रोक लगा दी. बिजली सरप्लस के दावे करने वाली सरकार हरियाणा की 68% जनता को 30% बिजली और बाकि 32% जिसमें व्यापारी वर्ग शामिल है; उसे कुल बिजली का 70% मुहैया करवा रही है. लगता है किसान और कमेरों से सरकार को कुछ लेना देना नहीं है क्योंकि किसानों के खेतों में लगने वाले ट्यूबवेलों के लिए सेक्योरिटी लाखों में है पर व्यापारी वर्ग को बिना सेक्योरिटी कनेक्शन उपलब्ध कराए जा रहे हैं. बिजली को मची त्राहि त्राहि और बिलों की बढती राशि से किस प्रकार सरकार ने इस सेक्टर में विकास पैदा किया यह समझ से बाहर है. सरकार को चाहिए कि अपने मंत्रियों को बिजली के ठेके देने की जगह पहले पूर्व सरकार के घोटालों की जांच कराए.

कृषि, अपराध, रोजगार आदि पर दूसरे लेख में चर्चा होगी. फिलहाल इस लेख पर सुझाव आमंत्रित हैं. अंत में सम्पूर्ण विश्लेष्ण प्रस्तुत करूंगा.

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