सर्व धर्म समभाव और किसान एकता

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आज एक महत्त्वपूर्ण मुद्दे पर लिखने बैठा हूँ. एक नास्तिक होते हुए भी धर्म के मुद्दे पर लिखना विचित्र है. लेकिन लिखना अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि वर्तमान में मजहबी एकता सबसे बड़ी आवश्यकता बन पड़ी है. पिछले कुछ वर्षों में फैले आतंकवाद व अपने धर्म के प्रति कट्टरता दिखाते लोगों के लिए सर्वधर्म समभाव का मेसेज बहुत आवश्यक है. आज चूंकि श्रीमती इंदिरा गांन्धी का शहीदी दिवस है तो यह और भी अधिक महत्त्वपूर्ण मुद्दा है. हालांकि इस मुद्दे को अभी कई अलग अलग लेखों में बांटना पड़ेगा लेकिन इसका प्रारंभ अभी कर रहा हूँ. आज कल किसान एकता में दीनबंधु सर छोटू राम जी की बात को बड़ी प्रमुखता से अलग अलग मंचों पर रखा जा रहा है अतः मुझे अपने पहले लेख में सर छोटू राम के विचार आप सब तक पंहुचाने की अधिक आवश्यकता महसूस होती है.

चौधरी साब आर्यसमाजी थे. हालांकि मैं आर्यसमाज के अन्दर भी कमी पाता हूँ लेकिन इस से असहमति जताते हुए भी आपतक उनकी वाणी पंहुचा रहा हूँ. उनकी धार्मिक आस्था के बारे में अधिक पता नहीं लगाया जा सकता है. उनके धार्मिक विचारों के बारे में जानने के लिए मैं “भारत में मजहब” नामक उनके एक लेख तक जा पंहुचा जो उनकी पत्रिका बेचारा किसान में छपा था. उसके एक पैरा में वे अपने को धार्मिक बताते हुए कहते हैं:

 “आपने मुझसे हिन्दू धर्म की व्याख्या चाही. मैं खुद वैदिक धर्म का अनुयायी हूँ. हिन्दू हूँ, इसलिए आपने सोचा कि मैं हिन्दू धर्म का निचोड़ बता सकता हूँ. मुझे डर है कि मैं आपकी आशा पूरी करने में असमर्थ हूँ. मैं हिन्दू धर्म को गंगा के पानी की तरह कूजे में बंद नहीं कर सकता हूँ. हिन्दू धर्म न ही एक मत है न ही इसाई, यहूदी और इस्लाम की भांति खालिस मजहब है. यह अनेकों मतों का भंडार है. वेदों, उपनिषदों, शास्त्रों, गीतों, पुराणों, अनेक मत-मतान्तरों, रामायण, महाभारत की कथाओं, संतों की वाणियों का समुद्र है. अनेक युग आये, अनेक युग गये. हमलावर आये और गये. अनेकों झकोले लगे, अनेक आँदोलन हुए. परन्तु हिन्दू धर्म सबको हजम करता रहा. इसलिए हिन्दू धर्म उदार है, विशाल है, व्यापक है, सहिष्णु है, सहनशील है, अहिंसक है. अस्पृश्यता का कलंक व जहर न हो तो शुद्ध गंगा जल है. सुधारक आये. आते रहेंगे/ समय और स्थान के अनुसार, जमाने की चाल व् मांग के अनुसार हिन्दू धर्म अपने को ढालता रहेगा. 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेज सावधान हैं. किसी के मजहब में कोई दखल नहीं देते, हाँ, मजहबी भेदों को मजहबी दंगों तक पंहुचाने में माहिर हैं. भारत के उत्थान, कल्याण के लिए हिन्दू-मुस्लिम-सिख एकता जरूरी है. मैं इसी काम में जुटा हुआ हूँ. मजहब को अपनी यूनियनिस्ट राजनीति से अलग रखता हूँ. पंजाब के किसानों को सूदखोरों से मुक्ति दिलाने के लिए उनको एकजुट करता हूँ. चूंकि किसान सब मजहबों में हैं और कृषि धंधे के कारण एक प्लेटफोर्म पर जमा हो रहे हैं. यह किसान एकता फिरकापस्ती को भी लगाम देगी. ……………कोई भी मजहब आपस में बैर करना नहीं सिखाता है. सब एक दूसरे के मजहब का समान आदर करेंगे. सब ऋषियों, पैगम्बरों, गुरुओं, संतों और पीरों का आदर करेंगे.”

चौधरी साहब आगे कहते हैं, “भारत में अनेक देवी-देवता पूजे जाते हैं. ईश्वरवादी हैं, नास्तिक भी हैं. परन्तु सब अपने आपको हिन्दू कहते हैं. मैं खुद तो आर्यसमाजी हूँ, एक परमात्मा को मानता हूँ, फिर भी अपने आपको गर्व से हिन्दू कहता हूँ” इस महत्त्वपूर्ण बात के आगे लेख में एक जगह और उद्धरण आता है जो पठनीय है, ” यद्यपि मैं कट्टर हिन्दू नहीं हूँ और अन्धविश्वास, फिजूल के ऊटपटांग रीति रिवाजों को नहीं मानता हूँ जो अब भी हिन्दू धर्म में मजूद है, फिर भी इस ऊपर से वाहियात लगने वाले अन्धविश्वास और पूजा में कुछ उपयोगिता देखे बिना नहीं रह सकता. जब तक मानव जाति जीवित है तब तक इसकी अलग-अलग उपजातियों में, विचार और विश्वासों में भिन्नता तो रहेगी ही और उपजाति के अलग-अलग उपभागों में, विचारों के विकास में भी भिन्नता रहेगी. सब एक ही बौद्धिक स्तर पर नहीं पाए जाते. यहाँ तक कि एक छोटे से समूह में भी बुद्धि भेद पाया जाता है, कोई ज्यादा बुद्धिमान है और कोई तो पूरा बुद्धू भी हो सकता है. यह अच्छा ही है कि मंदबुद्धि वाले मूढ, गंवार भी अज्ञात शक्ति तक ज्ञान द्वारा पंहुच जाते हैं और अदृश्य शक्ति का दृश्य चीजों, देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के माध्यम से उस ईश्वरीय शक्ति का आभास कर सकते हैं. परमात्मा के विचार को मजाक में उडाना ठीक नहीं समझते. शर्त ये है कि पूजा की विधि में सच्चा विश्वास हो, पूरी आस्था हो, गहरी निष्ठा हो, दृढ धुन हो, अन्तः करन में वही भगवान् बैठा महसूस हो, ध्यान में एकाग्रता हो.यही हिन्दू धर्म की आध्यात्मिकता की पुट है, पैठ है. कहते हैं इस विश्वास की नाव में बैठ कर पापी भी तर जाते हैं. गंगा में गोते लगाने से सब पाप धुल जाते हैं. आत्मसमर्पण में ही जीवन सिद्धांत है…असीम से मेल करने के लिए सीमित शरीर और चंचल मन का नियन्त्रण करना होता है. मैं आर्यसमाजी होने के नाते मूर्तिपूजा नहीं करता, परन्तु संध्या-हवन आदि के माध्यम से उस परम शक्ति को याद करता हूँ.

किसान एकता के ऊपर बल देते हुए चौधरी साब आगे कहते हैं:

“इस सिलसिले में एक और बात लिख दूं. हिन्दू धर्म के लचीलेपन और समय एवं स्थान के अनुसार अपने आपको ढालने के गुण जो इसे भूतकाल से बचाते रहे, अब फिर आगे आने लगे हैं. वर्तमान स्थिति को सावधानी से समझा जा रहा है. खतरा महसूस किया है. “शुद्धि” को अपनाया है. अस्पृश्यता हटाने लगे हैं. जो इसाई, मुसलमान फिर हिन्दू बनना चाहें, उनका स्वागत होने लगा है. जैसे शंकराचार्य ने बौद्धों को फिर से हिन्दू बनाया था, वैसे ही हिन्दू अब अपने मुसलमान व इसाई बंधुओं को गले मिलाने में लगे हैं. यदि हिन्दू न भी बनें तो कम से कम हिन्दुओं से घृणा तो न करें. मजहब बदला है, देश तो वही है, खून तो वही है. जाटों को ही ले लीजिये. कोई जाट मुसलमान हो गया, कोई सिख बन गया, कोई नास्तिक हो गया, कोई गरीबदासी हो गया, मगर रहा तो जाट ही, खून तो वही रहा. वैसे जाट सब मजहबों, मत-मतान्तरों, राष्ट्रों और वर्गों में पाए जाते हैं. जाट एकता में हिन्दू-मुस्लिम-इसाई सर्वधर्म एकता देखता हूँ. फिरकापस्ती का इलाज जाट एकता से शुरू किया और अब किसान एकता से दे रहा हूँ…”

वे आगे कहते हैं, “महात्मा गांधी ने गौरे साहब का रौब ख़त्म कर दिया है. यूनियनिस्ट पार्टी ने धंधे के आधार पर राजनीति खड़ी कर दी जिसमें किसान सर्वोपरी है और मजदूर किसान का कुदरती साथी है. मजहब अपनी आध्यात्मिक जगह पर रहे, राजनीति अपने जन कल्याण पर टिके…सभी मजहब, सभी बिरादरियां फूलेंगी

चौधरी साहब के विचारों से स्पष्ट है कि धर्म से परे किसान एकता आजकी ज़रूरत है; पर धर्म समाप्त कर किसान एकता के लिए लड़ने का मतलब नहीं. राजनीति में धर्म न घुसे. राजनीति की बात करते हुए, समाज में परिवर्तन की बात करते हुए धर्म को बार बार घुसाना कतई श्रेयस्कर नहीं. पाखंड को मत मानिए पर किसी का बेजा विरोध न करें; यह चौधरी साहब ने सिखाया.

अगले लेख में मेरा निजी मत दूंगा.

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