हरियाणा भाजपा के दो वर्ष एवं रोजगार

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हरियाणा सरकार के दो वर्ष पूर्ण होने पर जो सबसे अधिक चर्चा का विषय है वह है रोजगार. यह वह विषय है जिसको लेकर भाजपा की तरफ से बड़े बड़े वायदे किये गये थे लेकिन अभी तक निकला कुछ भी नहीं. हालांकि सरकार की तरफ से बड़े बड़े दावे किये जाते हैं कि वे नौकरियों में कथित इमानदारी ले लाये हैं और रिकोर्ड नौकरियां दी जाएँगी. ये दावे सच्चाई पर कितने खरे उतरते हैं; आइये देखते हैं इस छोटे से लेख में.

पिछली कांग्रेस सरकार के दौरान बहुत सी ऐसी भर्तियाँ रही जिनमें न केवल गैरकानूनी कार्य किये गये अपितु वे सब कार्य जब कोर्ट तक पंहुचे तो उनपर या तो रोक लगाई गयी अथवा उन्हें ख़ारिज किया गया. इनमें से एक गैरकानूनी भर्ती थी गेस्ट टीचर. गेस्ट टीचर्ज का कांसेप्ट 2005 में सरकार के आते ही लेकर आया गया. कर्मचारी चयन आयोग के द्वारा हरियाणा में शिक्षकों की भर्ती निकाली गयी. उस भर्ती में पंजाब विश्वविद्यालय को लिस्ट बनाने का ठेका दिया गया. जब वह लिस्ट बन चुकी; उस समय आखिरी समय पर उस भर्ती को बंद कर दिया गया. इस भर्ती के बंद होने के बाद न तो विश्वविद्यालय की लगभग 30 लाख की पेंडिंग पेमेंट की गयी और न ही उन अभ्यर्थियों की फीस ही वापिस की गयी जिन्होंने भर्ती प्रक्रिया के अन्दर भाग लेने के लिए फीस भरी थी. इस प्रकार सरकार के द्वारा करोड़ों रूपये गैरकानूनी रूप से जब्त कर लिए गये. इसके बाद सितम्बर 2005 में सरकार द्वारा ऐड निकाली गयी कि गेस्ट टीचर्स के लिए एप्लीकेशन आमंत्रित हैं. इनका सेलेक्शन लगभग स्कूल स्तर पर किया जाना था. इस ऐड के अंदर साफ़ तौर पर लिखा गया था कि लगाये गये गेस्ट टीचर्ज की सेवाएं मार्च 2006 में नव सेशन शुरू होने के साथ ही ख़त्म हो जाएँगी. इस प्रकार बीस हजार से ज्यादा युवाओं को नौकरियों पर रख लिया गया. ज्ञातव्य है कि न तो भर्ती प्रक्रिया का ही सही मायने में पालन किया गया और न ही नियमित प्रकार से उनके सर्टिफिकेट आदि की ही जांच हुई. इसके बाद शुरू हुई राजनीति. सरकार ने गैरकानूनी तरीके से लगाये इन गेस्ट टीचर्ज के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया. यदि उन्हें जिम्मेदारी से सही समय पर मुक्त कर दिया जाता तो वे सब शायद इस समय किसी अन्य जॉब पर कार्य कर रहे होते. लेकिन राजनैतिक फायदे के लिए उनके कॉन्ट्रैक्ट को आगे से आगे बढाया जाता रहा. मामला कोर्ट में गया तो तुरंत भर्ती को ख़ारिज कर दिया गया. सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट के अंदर कई पेटीशन इस मामले को लेकर डाली गयीं. ये दुर्भाग्यवश फंसे हुए नौजवान जो न केवल किसी अन्य जॉब को पाने के लिए अपनी उम्र को क्रोस कर चुके थे; अपितु आर्थिक तौर पर एवं राजनैतिक तौर पर उन्हें तोडा जा चुका था. उनके दिल्ली स्थित धरने पर इस समय के शिक्षा मंत्री श्री रामविलास शर्मा जाकर आये और घोषणा कर दी कि भाजपा सरकार आते ही पहली कलम से उन्हें पक्का कर दिया जायेगा. सरकार आने के बाद यही शर्मा जी न केवल अपने वायदे से मुकरे अपितु भाजपा भी घोषणा पत्र की घोषणा पर अमल न कर पाई. नतीजा आज भी ये लोग सडकों पर भटक रहे हैं.

दूसरी भर्ती जो भाजपा और कांग्रेस की नीतियों का शिकार बनी वह थी कम्प्यूटर टीचर्ज. कांग्रेस द्वारा गैरकानूनी रूप से लगाये गये इन युवाओं को भी पक्का करने का वायदा भाजपा के द्वारा किया गया था. इसे भी भाजपा भूल गयी और इनकी सेवाएँ समाप्त की गयी.

तीसरी भर्ती जो भाजपा और कांग्रेस की नीतियों का शिकार बनी वह थी पीजीटी की भर्ती जिसमें कथित अनियमितताओं को लेकर कुछ अभ्यर्थी कोर्ट चले गये. सेलेक्ट हुए उम्मीदवारों की जोइनिंग होने से पहले कांग्रेस सरकार चली गयी. कांग्रेस अपनी राजनीति कर चुकी थी. इसके बाद ये लोग भाजपा की राजनीति का शिकार हुए. तात्कालीन मुख्यमंत्री के OSD श्री जवाहर यादव इनके धरने पर जाकर आश्वासन देकर आये कि इन सबको नियुक्ति पत्र दे दिया जायेगा. लेकिन हाईकोर्ट की एकल बेंच से अपने पक्ष में निर्णय आने के बावजूद इन युवाओं को ज्वाइन नहीं करवाया गया. इतने में इस भर्ती को चैलेन्ज करने वाले अभ्यर्थी LPA में चले गये. वहां स्टे होने के बाद सरकार फिर से हाथ पर हाथ धर कर बैठ गयी. ये लोग आज भी अपने जायज हक़ को मांगने के लिए मजबूर हैं.

अब नौकरियों में इमानदारी की बात करते हैं. कुछ दिन पहले चौधरी बंसी लाल विश्वविद्यालय के द्वारा एसिस्टेंट प्रोफेसर की भर्ती निकाली गयी. जहाँ मुझे पहले से सेलेक्ट होने वाले उम्मीदवार का पता चल गया. मैं मामला कोर्ट तक ले गया लेकिन कोर्ट ने उस समय स्टे नहीं किया पर बाद में उस ही उम्मीदवार को नियुक्ति दे दी गयी जिसका नाम मैंने पब्लिक किया था. ऐसे ही HCS भर्ती में सरकार के द्वारा बड़ी बड़ी बातें की गयी. ज्ञातव्य है कि HPSC के अंदर चेयरमैन समेत 4 मेम्बर कांग्रेस सरकार के लगाये हुए और 4 भाजपा सरकार के लगाये हुए हैं. HCS 2014 की भर्ती की आधी प्रक्रिया कांग्रेस सरकार के दौरान पूरी हो चुकी थी. मामला कोर्ट के विचाराधीन था; मुख्य परीक्षा में पास हुए अभ्यर्थियों को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया. इंटरव्यू के मार्क्स 75 रखे गये थे. बेहद हैरानी की बात है कि जो लोग कहीं न कहीं भाजपा के नेताओं से सीधे जुड़े हुए थे उन सबको 60 से अधिक मार्क्स दिए गये हैं; ज्यादातर सेलेक्ट होने वाले अभ्यर्थियों के मार्क्स 40 की रेंज में हैं तो भाजपा नेताओं के करीबी 60 से 65 लेकर बैठे हैं. इसके बावजूद भी वे लोग कट ऑफ़ नहीं पार कर पाए तो भाजपा इमानदारी का ढोंग क्यों पीट रही है? और बड़ी महत्त्वपूर्ण बात ये है कि मेरे साथ डिबेट में भाजपा प्रवक्ता ने खुद लाइव टीवी पर माना कि मुख्यमंत्री ने स्वयम रिजल्ट तैयार कराया. मामला दोबारा कोर्ट जा रहा है; इसके बाद इसमें और भी आयाम आ सकते हैं.

पुलिस भर्ती के फिजिकल के दौरान तो जैसे बेशर्मी की हदें पार कर दी गयीं. एक एक दिन में 25000 तक अभ्यर्थियों को अमानवीय स्थितियों में बुलाया गया. प्रक्रिया का हाल इतना बुरा था कि चार अभ्यर्थियों की मृत्यू तक हो गयी. दौड़ के विश्व रिकोर्ड बनाये गये. मामला कोर्ट पंहुचा; लेकिन साक्ष्य के अभाव में वहां फैंसला सरकार के पक्ष में आया. लेकिन दौड़ में भाग लेने वाले सभी अभ्यर्थियों को मालूम है कि प्रक्रिया बेहद बुरे हाल से गुजरी. फिलहाल 1000 महिला कांस्टेबल की भर्ती कोर्ट में विचाराधीन है.

इसके अलावा सरकार के द्वारा दो ओफिसर्ज को आईएएस नोमिनेट करने के लिए रिकमेंड किया गया. इनमें से एक मुख्यमंत्री सचिवालय में तैनात मुख्यमंत्री के करीबी ऑफिसर्स में से एक की पत्नी थी तो दूसरी शिक्षा मंत्री की पुत्रवधू. इन दोनों केसिज को UPSC ने ख़ारिज कर दिया और यह कहा कि रिकमेंड करने के समय गैरकानूनी प्रक्रिया का उपयोग किया गया. एक की तो ACR पिछली तारिख में बनायीं गयी. क्या यह इमानदारी का सबूत है? अब HCS नोमिनेशन में भी अपनी पसंद के अभ्यर्थियों को लगाने के लिए भाजपा ने उम्र को 45 से बढ़ा कर 48 किया है और इसके अतिरिक्त भी कुछ ऐसे बदलाव किये हैं जिनसे स्पष्ट भाजपा के करीबी कुछ अधिकारियों को ही फायदा मिलेगा. मामला कोर्ट में जा चुका है और इसके अंदर सरकार को कड़ी झाड भी पड़ चुकी है. क्या यह इमानदारी है?

सरकार ने 25 सुशासन सहयोगियों को भर्ती किया है. इसकी भर्ती एक निजी विश्वविद्यालय के लिए इन्टरव्यू के अनुसार की गयी है. हर सहयोगी को एक एक जिला उपायुक्त के बराबर खड़ा कर दिया गया है. इन्हें सीधे मुख्यमंत्री से बात करने की और उपायुक्तों के काम काज को देखने तक की पॉवर हासिल है. जानकारों के अनुसार सभी कहीं न कहीं संघ पृष्ठभूमि के लोग हैं. इनकी तनख्वाह भी वही निजी विश्वविद्यालय दे रहा है जिसने भर्ती प्रक्रिया को अंजाम दिया. क्या यह संघीय ढाँचे के अनुरूप है? यदि निजी विश्वविद्यालय अब जिले चलाएंगे तो क्या उपायुक्तों को हटा देना चाहिए? ऐसे बहुत से प्रश्न अनुत्तरित हैं. मामला जल्द ही कोर्ट में जाएगा. मेरी पेटिशनर से बात हुई है.

क्या HARTRON में हुई एक गैरकानूनी भर्ती में एक बाहरी व्यक्ति को लाकर आईएएस ऑफिसर के ऊपर नहीं बिठाया गया है? इस मामले में सेलेक्ट होने वाले उम्मीदवार की घोषणा इन्डियन एक्सप्रेस अखबार ने कर दी थी. बावजूद उसके उस ही अभ्यर्थी को सेलेक्ट किया गया. उसके सुपुत्र को भी मुख्यमंत्री सचिवालय में नौकरी दी गयी है. क्या यह ईमानदारी है? यदि नहीं है तो क्यों भाजपा ढोंग पीट रही है कि इमानदार भर्तियाँ की जाएँगी. जिस प्रकार TGT भर्ती में HTET पास किये हुए अभ्यर्थियों के अलावा अन्य अभ्यर्थियों को भी बुलाया गया है; इससे स्पष्ट है कि सरकार कुछ चुने हुए अभ्यर्थियों के लिए कम्पटीशन कम करना चाहती है. इसका कारण यह है कि HTET पास किये बिना कानून के अनुसार कोई भी TGT भर्ती नहीं हो सकता. तो क्यों उन्हें बुलाया भी जा रहा है? आखिर क्यों इंटरव्यू की वीडियोग्राफी नहीं की जा रही? क्यों सरकार पारदर्शिता से बच रही है? एक HCS का तो मुझे लगने से पहले पता लग गया था. एक करोड़ और पांच लाख में डील पक्की हुई थी; लेकिन मेरे खुलासा करने से पहले HPSC ने रिजल्ट घोषित कर दिया.

रोजगार क्षेत्र में कोई निजी रोजगार अभी तक जनरेट नहीं हुआ है. सरकारी भर्तियाँ अभी अधर में लटकी हुई हैं और वहां इमानदारी की गुंजाइश नहीं. कितने नम्बर देंगे रोजगार के क्षेत्र में आप भाजपा को?

 

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