SYL मुद्दा और इसका इतिहास

rsdhull मुद्दे, राजनैतिक विश्लेष्ण Leave a Comment

SYL पर अपेक्षित फैंसला आ गया है; माननीय सुप्रीम कोर्ट ने आज पंजाब सरकार के बनाये 2004 के उस एक्ट को ख़ारिज कर दिया है जिसके तहत हरियाणा के साथ पंजाब के सभी एग्रीमेंट रद्द किये गये थे. कोर्ट ने इसे गैर कानूनी माना है और इसके साथ ही 2002 का वह फैंसला दोबारा लागू हो गया है जिसके तहत हरियाणा को पानी देने के लिए कहा गया था. आइये SYL के इतिहास के बारे में जानते हैं:

SYL का इतिहास 

हालाँकि पानी का मुद्दा 1954 से जीवित है लेकिन इसमें असली बदलाव आया 1966 में जब Punjab Reorganization Act 1966 के Sec 78 के अनुसार नए राज्य बनने के बाद पानी को लेकर पंजाब की लाईबिल्टी तय हुई। इसके बाद हरियाणा व पंजाब में पानी के बंटवारे को लेकर  असली बहस प्रारंभ हो गई। इसे देखते हुए हरियाणा व पंजाब की एक मीटिंग बुलाई गई। इस मीटिंग में फैसला लिया गया कि कुल पानी का 65% हिस्सा पंजाब के पास रहेगा एवं बाकि का 35% हिस्सा हरियाणा को जाएगा। 1969 में हरियाणा सरकार ने सेक्शन 78 के अनुसार अपने अधिकारों के तहत केंद्र सरकार को दखल की मांग की। इसके बाद केंद्र सरकार ने एक कमेटी बनाई। उस कमेटी के तहत हरियाणा को 3.78MAF पानी दिया गया। इस आस को लेकर 24-3-1976 को एक नोटिफिकेशन जारी की गई। अब दिक्कत था कि हरियाणा Riparian State नहीं है। रिपेरियन( नदी तट) कानून के बारे में चर्चा बाद में करेंगे। फिलहाल इतिहास को समझ लें। चूंकि हरियाणा रिपेरियन राज्य नहीं था। अतः नहर खोदकर हरियाणा में पानी लाने के अलावा कोई भी रास्ता नहीं था। इसे देखते हुए हरियाणा ने कहा कि SYL  यानि सतलुज-यमुना लिंक नहरबनाई जाये। इसकी तयकुल 214 किलोमीटर की लंबाई में से 122किलोमीटर पंजाब में तथा 92 किलोमीटर हरियाणा में थी। इसके बाद चौधरी देवीलाल जी ने केंद्र से गुहार लगाई कि इसे पूरा कर दिया जाए। इसके बाद लंबी वार्ता के बाद पंजाब के अंदर सीमा पर तीस किलोमीटर निर्माण की बात तय हो गई। इसके तुरंत बाद हरियाणा सरकार ने पंजाब को इस आशय को लेकर Payment कर दी। जहां एक ओर SYL का हरियाणा का हिस्सा जून 1980 में पूरा बना दिया गया था। वहीँ दूसरी ओर पंजाब ने यह कार्य नहीं किया। इसके बाद चौधरी देवीलाल सरकार पहली बार सुप्रीम कोर्ट में गई और 1979 में केस डाला गया।

साथ ही साथ पंजाब के द्वारा भी केस डाल दिया गया। दोनों मामले कोर्ट में जाने के बाद प्रधानमंत्री की मध्यस्था में 31-12-1981 को हरियाणा-पंजाब में समझौता हो गया; इस समझौते के दौरान हरियाणा एवं केंद्र में कांग्रेस सरकार थी; विपक्ष के रूप में चौधरी देवी लाल जी ने इस मुद्दे को बार बार हर मंच पर उठाया । दोनों केस 1982 में वापिस ले लिए गए। इस समझौते में हरियाणा ने अपने हिस्से का 1.32MAF पानी पंजाब के लिए छोड़ने की बात कही; जहाँ हरियाणा के लिए यह निर्णय अच्छा नहीं था क्योंकि उसके हिस्से का पानी कम हो गया था; वहीँ पंजाब के लिए यह हारे हुए मामले को दोबारा जिन्दा करने का तरीका बन गया; इसकी आधिकारिक तौर पर पंजाब सरकार ने प्रशंसा भी की। इसके सब के बाद भी 5-11-1985 को पंजाब विधान सभा में 31-12-1981 के समझौते को रद्द करने का resolution पास कर दिया गया। यहाँ तक यह मुद्दा पूर्ण राजनीति का हो चुका था। जहाँ समझौता चौधरी भजन लाल जी के समय हुआ तो हरियाणा में SYL का भाग चौधरी बंसी लाल जी के समय बना। लेकिन पंजाब में सब ठीक नहीं था; लगातार SYL नहर बना रहे मजदूरों को मारा जा रहा था। कपूरी गाँव जहाँ SYL का पत्थर रखा गया वहां पर कपूरी मोर्चा शुरू होकर धार्मिक मोर्चा और अंत में खालिस्तान तक जा पंहुचा था।

लोंगोवाल समझौता

24-7-1985 को प्रधानमंत्री तत्कालीन और अकाली दल अध्यक्ष एवं संत हरचरण सिंह लॉगोवाल के बीच समझौता हो गया। इस समझौते के अनुसार 15-8-1986 तक  SYL को पूरा करने की बात की गई। पानी की डिस्पियूट को ट्रिब्यूनल को भेज दिया गया। ट्रिब्यूनल ने भी 30-1-1987 को अपनी रिपोर्ट सौंपी जिसके अनुसार पंजाब को अपने हिस्से का कार्यपूर्ण करने को कहा गया। जून 1990 में 50 से अधिक मजदूरों की झगड़े में मृत्यु हो गई। तब से कनंस्ट्रक्शन बंद है। इसके बाद हरियाणा सरकार फिर से सुप्रीम कोर्ट गई; यह याचिका चौधरी बंसी लाल के समय डाली गयी।अंत में इनेलो सरकार के दौरान 15-1-2002 को हरियाणा के हक में फैसला आया। जब पंजाब ने SYL पर कार्य नही प्रारंभ किया तो हरियाणा ने सुप्रीम कोर्ट में एक और याचिका डाली; इस याचिका का फैंसला 2004 में आया; इस याचिका के अनुसार फिर पंजाब को SYL बनाने के लिए कहा गया और कोर्ट की तरफ से सरकार को झाड पड़ी;; कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिए कि पैरा मिलिट्री लगाकर भी केंद्र इस नहर को बनवाये। ध्यान देने लायक बात ये है कि हरियाणा सरकार की याचिका के जवाब में केंद्र का आधिकारिक स्टैंड ये था कि SYL का मुद्दा द्विपक्षीय मुद्दा है और इसे बनवाना केंद्र की जिम्मेदारी नहीं। यह फ़ेडरल सिस्टम के अनुसार बेहद दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति थी। बात स्पष्ट थी; यह मुद्दा पानी का न होकर राजनीति का हो गया था।

2004 से आगे

पंजाब अभी भी अपनी हेकड़ी पर अड़ा रहा। सुप्रीम कोर्ट के दूसरे फैंसले के तुरंत बाद 2004 में पंजाब की कांग्रेस सरकार ने विधान सभा में एक्ट पास कर सभी समझौतों को रद्द कर दिया। ज्ञातव्य है कि इस पहले मार्च 2002 में पंजाब सरकार की पहली रिव्यू भी खारिज हो चुकी ती। हरियाणा ने मामले की शिकायत केंद्र सरकार को की। राष्ट्रपति ने एक्ट पर हस्ताक्षर करने से पहले इस मामले के कानूनी पहलू को जानने के लिए सुप्रीम कोर्ट में Reference भेजी। इस ऱेफरेंस का फैसला 10-11-2016 को आया है।

रेफरेंस में है क्या?

रेफरेंस में कोर्ट को यह निर्णय करना था कि क्या सुप्रीम कोर्ट के सभी फैसले सभी एग्रीमेंट को रद्द करने का पंजाब विधानसभा का कानून सही है अथवा नहीं। कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि पंजाब विधानसभा का एक्ट गैरकानूनी है एवं संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है।

कानूनी पहलू

हरियाणा यह मामला पहले ही जीत चुका है। एससी(सुप्रीम कोर्ट) ने केवल यह फैसला थाकि उसके फैसले को पंजाब सरकार रद्द कर सकती थी अथवा नहीं। पंजाब सरकार का मामले में कहना था कि रिपेरियन लॉ के अनुसार हरियाणा के पास सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार ही नहीं है। हरियाणा के अनुसार कहा गया कि यह चूंकि द्विपक्षीय एग्रीमेंट और एक्ट है तो हरियाणा के पास अधिकार है।

क्या है रिपेरियन लॉ

रिपेरियन लॉ अनुसार केवल वह राज्य पानी की मांग कर सकता है जिसके राज्य में पानी की प्राकृतिक धारा जाती हो | चूँकि हरियाणा में  सतुलज , रावी आदि का कोई भी भाग प्राकृतिक धारा से नहीं आता | अतः हरियाणा के पास कोर्ट में जाने का कोई अधिकार नहीं है जहाँ तक समझौतों की बात है तो पंजाब पहले ही इसे ख़ारिज कर चुका है।

हरियाणा का पहलू
संविधान के Article 262 के अनुसार संसद के पास नदी और पानी के विवाद को लेकर कानून बनाने का अधिकार है चूँकि Punjab Settlement Act के अनुसार हरियाणा को संसद ने अधिकार दे दिया है तो हरियाणा के पास उस अधिकार के लिए कोर्ट जाने का पूर्ण अधिकार है एवं द्विपक्षीय समझोते के अनुसार भी हरियाणा के हिस्से में यह पानी आया है अंतः हरियाणा के पास पूर्ण अधिकार है।

पंजाब का पहलू

पानी की कमी , Riparian Law और राजनीति चमकाने के लिए इस मामले को जिन्दा रखा गया है। आज भी कांग्रेस के विधायक वहां पर इस्तीफा देंगे और अकाली दल भी कथित तौर पर जान की बाजी लगाने के लिए तैयार है।

2016 में ऐसा क्या हुआ?

2016 में चुनाव की आहट पाते ही पंजाब की अकाली-भाजपा सरकार ने acquire की गई जमीन को किसानों को वापिस करने का कानून बना दिया | जबर-दस्त हंगामे के बीच कांग्रेस नेता कैप्टेन अमरेंद्र सिंह ने तो बनी हुई SYL में तो मिट्टी डलवाने का काम किया | पंजाब सरकार ने Land Acquisition के सारे पैसे को हरियाणा को सौपने का कार्य किया | जिसे हरियाणा की भाजपा सरकार ने ख़ारिज कर दिया; ये वही भाजपा थी जिसकी पंजाब यूनिट ने SYL का पानी हरियाणा को देने का विरोध किया | आम आदमी पार्टी भी हरियाणा को पानी के विरोध में है। एक बड़ा कदम उठाते हुए चौधरी अभय सिंह चौटाला ने इस मुद्दे पर अकाली और इनेलो के राजनैतिक गठबंधन को तोड़ दिया। इसके बाद हुए राज्यसभा चुनाव में अकाली दल के हरियाणा में इकलौते विधायक ने सुभाष चंद्रा के पक्ष में मतदान किया। इनेलो पंजाब में चुनाव नहीं लडती है। अकाली दल की और से इनेलो की करनाल रैली में कोई भी प्रतिनिधि नहीं आया।

आज फैंसला हरियाणा के हक़ में आया है। आशा है हरियाणा की भाजपा सरकार राजनैतिक फायदे को पीछे रखते हुए हरियाणा के हक़ का पानी हरियाणा को दिलवाएगी। सरकार जहाँ चाहे इनेलो वहां इस मामले में साथ खड़ी मिलेगी।

1st Published on 10.11.2016

2nd Edit on 11.11.2016

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