SYL पर 2005 से 2014 के बीच पूर्व कांग्रेस सरकार का स्टैंड

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SYL मुद्दा फिर हवा में है. इस बार उसे हवा दी है माननीय उच्चतम न्यायालय के रेफेरेन्से के ऊपर आये निर्णय ने. SYL के इतिहास के बारे में मैं लिख चुका हूँ. उस लेख को आप यहाँ पढ़ सकते हैं; अतः दोबारा लिखने की आवश्यकता नहीं. जनवरी 2002 में इनेलो राज के दौरान मामले का फैंसला हरियाणा के हक में हुआ (फैंसला पढ़ें). उसके बाद पंजाब सरकार की रिवियू (पुनर्विचार याचिका) भी खारिज हो गयी. पंजाब के SYL के निर्माण के शुरू न करने के कारण हरियाणा सरकार दोबारा अदालत पंहुच गयी. दो वर्ष के भीतर ही जून 2004 में हरियाणा के पक्ष में फिर से कोर्ट ने फैंसला दे दिया. इस फैंसले में अदालत ने केंद्र सरकार को कहा कि वह अर्धसैनिक बल का उपयोग करे और नहर का निर्माण कार्य पूर्ण कराये (फैंसला पढ़ें). जून 2004 के हरियाणा के पक्ष में फैंसले के बाद जुलाई 2004 में पंजाब की कांग्रेस सरकार ने Punjab Termination of Agreement Act, 2004 नामक एक बिल गैरकानूनी तरीके से विधानसभा में पेश किया. इस बिल को जल्दबाजी में पास भी करा लिया गया और एक घंटे के अंदर ही राज्यपाल से उस पर दस्तखत करा लिए गये. यहाँ तक सब कुछ हमें ऐसा लगता है कि जैसे हरियाणा कांग्रेस तो सब कुछ बढ़िया कर रही थी और जो गलत कर रही थी वह तो पंजाब की कांग्रेस सरकार थी. क्योंकि उस समय विपक्ष के नेता चौधरी भूपिंदर सिंह हुड्डा ने इस मामले में विधायकों समेत इस्तीफे की पेशकश की थी. जुलाई 2004 में संविधानिक संकट को भांपते हुए राष्ट्रपति ने मामला सुप्रीम कोर्ट को रेफरेंस में भेज दिया. इस रेफरेंस में 10 नवम्बर 2016 को निर्णय आया है. (निर्णय को पढ़ें).

2005 से 2014 के बीच का स्टैंड:

फरवरी 2005 में हरियाणा से इनेलो की सरकार चली गयी. इस सरकार के जाने के बाद बहुमत से हरियाणा में कांग्रेस की सरकार बनी और चौधरी भूपिंदर सिंह हुड्डा को मुख्यमंत्री बनाया गया. इससे पहले केंद्र में चुनाव हुए और केंद्र में कांग्रेस ने सरकार बनाई और डाक्टर मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने. पंजाब में केप्टन अमरेन्द्र सिंह कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री थे. वह सरकार 2007 तक रही.

2004 में असंवैधानिक एक्ट का बनना:

इस एक्ट को जून 2004 के फैंसले के बाद कथित तौर पर गुप्त तौर पर बनाया गया और यह बात केंद्र सरकार से भी छिपाई गयी. पर क्या यह सही बात है? इस एक्ट की ड्राफ्टिंग श्री हरभगवान सिंह वरिष्ठ अधिवक्ता से कराई गयी थी. श्री हरभगवान सिंह जींद जिले के सफीदों हल्के से सम्बन्ध रखते हैं. इनकी चौधरी भूपिंदर सिंह हुड्डा से कितनी निकटता है इस बात का पता केवल इस बात से लग जाता है कि सरकार बनाते ही उनके सुपुत्र अरुण वालिया एडवोकेट को हरियाणा सरकार ने वरिष्ठ अतिरिक्त महाधिवक्ता (Sr.Additional Advocate General) नियुक्त कर दिया और वे अंत तक हरियाणा महाधिवक्ता दफ्तर में नम्बर तीन पर रहे. इस दौरान उनको करोड़ों की पेमेंट की गयी. श्री हरभगवान सिंह ने एक्ट को बनाया यह बात उन्होंने अपनी खुद की आत्मकथा में मानी जिसका पृष्ठ नीचे दिया गया है. हरभगवान सिंह की आत्मकथा का विमोचन चौधरी भूपिंदर सिंह हुड्डा ने फरवरी 2015 में एक फंक्शन के दौरान किया. फंक्शन की फोटो नीचे है.

Harbhagwan Singh Sr. Advocate

वे अपनी पुस्तक में मानते हैं कि उन्हें एक्ट बनाने के लिए कहा गया और उन्होंने बहुत तेजी से इसे बनाया; पुस्तक के पृष्ठ पढ़ें:

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उपरोक्त को पढ़ कर पता लगता है कि एक्ट बनाने की सलाह भी उन्होंने ही दी थी. हरियाणा के इतना विरुद्ध कदम लेने वाले वकीलों को हरियाणा की कांग्रेस सरकार के द्वारा इनाम दिया जाना और बाद में उनकी जीवनी का विमोचन भी श्री हुड्डा द्वारा करना; क्या यह जायज कहा जा सकता है? चलिए एक बारगी मान लेते हैं कि यह किसी तरह जायज है तो 2004 से 2014 के बीच कांग्रेस सरकार अपने चहेते वकीलों के ऊपर लाखों लुटाने के अलावा क्या कर रही थी? यदि हम थोड़ी डिटेल में जाते हैं तो हमें पता लगता है कि इस मामले में हरियाणा कांग्रेस सरकार के द्वारा श्री के.टी.एस. तुलसी और श्री अभिषेक मनु सिंघवी को वकील किया गया था. श्री सिंघवी को इस मामले में 50 लाख से अधिक दे दिए गये; श्री तुलसी के बिल फिलहाल मेरे पास मौजूद नहीं है पर वे भी उस ही कद के वकील हैं. नीचे श्री सिंघवी को दिए गए पैसे की डिटेल देखें:

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प्रदेश का खजाना लुटाना और फिर भी मामले का गति न पकड़ना यह द्योतक है कि कांग्रेस सरकार कभी भी मामले को आगे ले जाने के लिए गंभीर नहीं थी. अब हुड्डा साहब का कहना है कि वे केप्टन अमरेन्द्र सिंह के लिए चुनाव प्रचार करने जायेंगे लेकिन SYL पर लोगों को समझायेंगे. समझ नहीं आता वे जायेंगे ही क्यों? लगता है निजी हित हरियाणा के हित से ऊपर है. और मजेदार बात ये है कि चूंकि किसी भी समय पर एक्ट पर राष्ट्रपति ने साइन किये ही नहीं थे तो वह कानून बना ही नहीं. जब एक्ट कानून बना ही नहीं था तो क्या SYL पर सरकार कार्य नहीं कर सकती थी? कानून बनने के बाद मान सकते हैं कांग्रेस सरकार मजबूर हो जाती; पर उसके बिना क्या? 2005 से 2007 के बीच तो हुड्डा साहब के मित्र अमरेन्द्र सिंह ही पंजाब के मुख्यमंत्री भी थे.

अगले लेख में हम भाजपा के दोगलेपन का विवेचन करेंगे फिर संवैधानिक हल ढूंढेंगे. आप सब के सुझाव आमंत्रित हैं.

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