खुदी को कर बुलंद

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खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तदबीर से पहले 

खुदा बन्दे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है?

24 नवम्बर 1881 को वर्तमान रोहतक के सांपला गाँव में चौधरी सुखीराम एवं श्रीमती सीरियां देवी के घर जन्मे चौधरी छोटू राम की आज 135वीं जयंती है. इस अवसर पर उनके बारे में लिख कर स्वयम को गौरवान्वित कर रहा हूँ. अपने जीवन में उन्होंने कर्जा बिल, मंडी बिल, बेनामी एक्ट जैसे कानून बनवाये तो वहीँ जाट शिक्षण संस्थानों की स्थापना की. उनका सबसे महत्वपूर्ण एक्ट किसान कर्जा मंसुखी (राहत) कानून, 1937 साहूकारों के चंगुल में जकड़े किसानों के लिए जीवन लेकर आया था. पलवल से पेशावर तक दीनबंधू ने 8 लाख 35000 एकड़ जमीन साहूकारों से मुक्त कराई जिसका सीधा फायदा 3 लाख 65000 किसानों को हुआ. अपनी राजनीति की शुरुआत लगभग सभी नेताओं की तरह उन्होंने भी कांग्रेस से ही की. 1916 में वे रोहतक जिला कांग्रेस कमेटी के प्रथम अध्यक्ष बने. यह प्रथम विश्व युद्ध का समय था. उनकी दूरदर्शी सोच ने उन्हें युवाओं को प्रेरित करने के लिए मजबूर किया कि किसान युवाओं को किसानी से हटकर रोजगार ढूंढना होगा. उन्होंने युवाओं को सेना में भर्ती होने के लिए प्रेरित किया. उनकी प्रेरणा से पंजाब सूबे के बड़ी संख्या में युवा सेना में शामिल हुए. कांग्रेस के किसान विरोधी रुख ने उन्हें कांग्रेस छोड़ने की प्रेरणा दी. 1923 में सर फजले हुसैन के साथ मिल उन्होंने नेशनल यूनियनिस्ट पार्टी (जमींदार लीग) गठित की. इस पार्टी से सर सिकंदर हयात खान 1937 से 1942 तक पंजाब सूबे के प्रीमियर (मुख्य मंत्री) रहे. दीनबंधू सर छोटू राम को किसान इतना पसंद करते थे कि हिन्दू किसान उन्हें छोटू राम कहते तो मुस्लिम किसान छोटू खान कहते. उनका राजनीति का मूलमंत्र दो पंक्तियों में उन्होंने खुद समेटा है, “मैं मजहब को राजनीति से दूर करके शोषित किसान वर्ग और उपेक्षित ग्रामीण समाज की सेवा में अपना जीवन खपा रहा हूँ.” मजहब को राजनीति से और किसानों से किस प्रकार वे अलग करते थे इस बारे में मैंने इस लेख में काफी सन्दर्भ डाले हैं. आप उसे पढ़ सकते हैं. वे किसानों से कहते ऐ भोले किसान, बाद मेरी मान ले, एक बोलना ले सीख दूसरा दुश्मन को पहचान ले. वे कहते किसान की बोली कड़ी होती है; इसलिए लोग उससे दूर रहते हैं. फिर कहते दुश्मन को पहचानना बहुत जरूरी है क्योंकि अक्सर किसान के हितैषी बनने वाले उसके दुश्मन होते हैं. वे किसान को पाखंड और साहूकारों के चंगुल से दूर रहने की शिक्षा देते. वे कहते कि सारे देश की मंडिया किसान के पैदा किये अनाज से भरी पड़ी हैं और आबाद भी हैं; लेकिन किसान बर्बाद है. उनके किसानों के संघर्ष के कारण किसानों ने उन्हें रहबरे आज़म की उपाधि प्रदान की. उनके एक लेख में उन्होंने किसानों को उसकी शक्ति एक छोटे से शेर में समझाई:

क्यों गिरफ्तारे-तिलिस्मे-हेच मिकदारी है तूं,

देश तो पोशीदा तुझमें शौकते-तूफां भी है.

(तू हीन भावना के जादू की पकड़ में क्यों जकड़ा पड़ा है? ज़रा अपने अंदर झाँक, तेरे अन्दर तूफ़ान की शक्ति भरी पड़ी है)

मैं उनके बारे में जितना लिखूंगा उतना ही कम है; आप पुरुषों को लेखों में समाहित कर सकते हैं; महापुरुषों को भी कर सकते हैं; लेकिन किसानों के लिए काम कर रहे युगपुरुषों को नहीं कर पाएंगे. किसान आर्थिक स्थिति में आज भी लगभग वहीँ है जहाँ उस समय था. हाँ साहूकार बदल चुके हैं; पहले छोटे साहूकार लूटते थे; आज बड़े साहूकार(बैंक) लूटते हैं; बैंक से छुटकारा भी नहीं मिल सकता. तब दीनबन्धू सोच न पाए कि ये बड़े साहूकार छोटे साहूकारों से कहीं अधिक खतरनाक साबित होंगे. अर्थशास्त्र की सबसे बड़ी समस्या यही है कि यह दो अलग अलग समय पर एक सा नहीं रह सकता; समय की जरूरत के अनुसार कार्य करना आवश्यक होता है. किसान एकता का मन्त्र उनके बाद भी महानायकों जैसे चौधरी चरण सिंह और चौधरी देवी लाल जी ने अपनाया. बड़े साहूकारों के ऋण से 1987 में जननायक चौधरी देवी लाल जी ने दी थी; आज किसानों को और ताकत के साथ अपने अधिकार मांगने की जरूरत है. समझने की जरूरत है कि उसके दुश्मन बदल चुके हैं; उसके नये दोस्त भी पैदा हो चुके हैं तो नये दुश्मन भी. जातिवाद किसान एकता को तोड़ने का प्रयास कर रहा है; किसान जबतक एक रहेगा उसका भला होगा वरना उसका मरना निश्चित है. किसान को जागृति की जरूरत है; किसान को अब किसानों के चौथे महानायक की जरूरत है. हर महानायक ने अलग भाग अदा किया; चौधरी छोटू राम ने मृत्यू शय्या पर कहा था, ”है कोई जो मेरा काम पूरा कर सके?” आज उनकी जयंती पर वह आवाज गूंझ रही है कि कौन अब किसानों के हित का परचम उठाकर उसका बेडा पार लगाएगा.

उनकी जयंती पर मेरा नमन!

फारिग अज अंदेशा अगयार शो.

क्व्व्ते खाबीदा बेदार शो. 

(तू एक सोई हुई शक्ति है, जाग उठ; फिर देख तुझे किसी पराये से कोई खतरा भी रहता है) अन्य के भी से मुक्त हो जा; ऐ सोई हुई शक्ति सचेत हो जा.

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