किसान एवं कमेरों की एकता समय की जरूरत

rsdhull निजी विचार Leave a Comment

भारत कृषि प्रधान देश है. इस देश की लगभग 70% आबादी ग्रामीण क्षेत्र में ही बसती है. आजादी की लड़ाई से आज तक हर बड़े सामाजिक नेता ने किसान और ग्रामीण क्षेत्र की बात की है. रहबरे आजम सर छोटू राम से लेकर चौधरी देवी लाल जी, महात्मा गांधी से लेकर चौधरी चरण सिंह तक हर एक बड़े नेता का मानना था कि भारत गाँवों में बसता है. ग्रामीण और किसान कमेरा वर्ग वह है जहाँ अधिक शिक्षा का प्रसार भी न हो पाया. अपने रीतिरिवाजों को ढोते हुए ये लोग अधिसंख्यक है लेकिन अपनी भाषा, बोली, वेशभूषा की वजह से अक्सर इन्हें गंवार कहा जाता है. गंवार शब्द को एक गाली के रूप में परिवर्तित करना ही हमारी सबसे घटिया उपलब्धी है. जिस देश की 70% जनसँख्या ग्रामीण क्षेत्र में बसती हो वहां ग्रामीण परिपेक्ष्य का होना कैसे हीनता माना जा सकता है यह मेरी समझ से बाहर की बात है. आज भी अपने भुजबल से जमीन जोत कर देश का पेट भरने वाला, छोटे छोटे कार्य और मजदूरी कर अपना पेट भरने वाला गरीब किसान कमेरा वर्ग भारत में हीनता का सबब बन गया है. यही कारण है कि आज यह वर्ग राजनैतिक हाशिये पर जा पंहुचा है. इस वर्ग से जमीन से जुड़े बहुत से नेता भी उभरे. दीनबन्धू सर छोटू राम ने इस वर्ग को शिक्षा दी कि किसान को बोलना सीखना होगा और दुश्मन को पहचानना होगा. चौधरीचरण सिंह, जननायक चौधरी देवी लाल, बाबा महेंद्र टिकैत इस ही वर्ग के लिए लड़े. चौधरी देवी लाल जी को सुनने लोग हरयाणा से मुंबई तक पंहुच जाते तो चौधरी चरण सिंह के प्रधानमंत्री बनने पर बागपत क्षेत्र के लोगों ने दिल्ली में गुड़ बांटते हुए लोगों को कहा कि आज हमारा चौधरी इंदिरा गांधी बन गया है. वे गरीब भोले लोग ये तक नहीं जानते थे कि चौधरी चरण सिंह प्रधानमन्त्री बने हैं न कि इंदिरा गांधी. कहा जाता है आज भी उत्तरप्रदेश में ऐसी बहुत सी आबादी है जो आज तक मानती है कि इंदिरा गांधी भारत की प्रधानमन्त्री है. इन ग्रामीणों के लिए ग्रामीण जीवन एक अभिशाप के अलावा कुछ नहीं. लेकिन शहर का पढ़ा लिखा तबका इस नाम को ही अभिशाप बनाने में तुला है. यही कारण है कोई सहज सी मूर्खता करने पर आपको गंवार शब्द से सुशोभित कर दिया जाता है. इस वर्ग में सभी धर्म और सभी जातियां शामिल हैं. इस अधिसंख्यक वर्ग की एकता से शहरी और व्यापारी तबके को बहुत नुक्सान होता है को राजनीति को धंधा बना पैसा कमाने में लगे हैं. यही कारण है कि चुनाव के समय इस एकता को तोड़कर इन्हें आपस में जातिवादी बना अथवा धर्म के नाम पर लड़वा दिया जाता है. इससे विभिन्न राजनैतिक दलों को अपने मन मुताबिक फायदा मिलता है. यह फायदा राष्ट्रीय पार्टियों को अधिक मिलता है.
भारत में अधिकांश हिस्से में बड़ी बड़ी कृषक जातियां अलग अलग प्रान्त में कहीं बहुसंख्य में है तो कहीं अल्पसंख्या में है. उत्तरी हरयाणा में जाट, दक्षिण हरयाणा में अहीर, उत्तर प्रदेश में अहीर, जाट, मुस्लिम, मध्यप्रदेश में राजपूत, राजस्थान में जाट, मीणा, गुर्जर, बिहार में अहीर, गुजरात में पटेल, महाराष्ट्र में मराठे बहुलता में हैं. यह अक्सर खेतीबाड़ी कर अपना कार्य करता है. वहीँ बड़ी संख्या में अन्य पिछड़ी जातियां और दलित, महादलित भी देश में हैं जो कुल आबादी का 80% से अधिक है. इस बहुसंख्यक आबादी में गरीबी, अशिक्षा व्याप्त है. यही कारण है इन्हें बहलाना बहुत आसान है. राष्ट्रीय पार्टियाँ अपने अनुसार इन सबको एकदूसरे से लडवाती रहती हैं. इससे इन्हें अन्य वर्गों का सुचारू रूप से अपने अनुसार उपयोग करने का मौका मिलता है. हरयाणा में जाट बनाम अन्य किया जाता है, राजस्थान में भी ऐसे ही किया जाता है, गुजरात में पटेलों को गुंडा बता अलग करते हैं, पूर्वी, उत्तरी, केन्द्रीय उत्तरप्रदेश में यादव भाइयों को गुंडा बताया जाता है, बिहार में भी यादव भाइयों को गुंडा बताया जाता है; हरयाणा में यादव भाइयों को कहा जाता है जाट दबंग हैं. उत्तरप्रदेश में यादवों को ही दबंग बता दिया जाता है. पश्चिम उत्तर प्रदेश में इस वर्ग की एकता से भाजपा को खतरा होता है तो अपने विधायकों को लगा करहिन्दू मुस्लिम दंगे कराये जाते हैं, हरयाणा में जाट बनाम अन्य दंगे कराये जाते हैं, वोट मांगने के समय उन दंगों को जाति से जोड़ जाट बनाम मुस्लिम बना दिया जाता है. ऐसे जहरीले कार्य भाजपा जैसी कथित राष्ट्रीय पार्टी अपने कैडर से कराती है. कांग्रेस कहाँ कम है; वह राजस्थान में बहुसंख्यक जाट समुदाय को अन्य से अलग करती है तो मुस्लिम वोट के ध्रुवीकरण की चाहत में उसे लगभग समस्त भारत में मुख्यधारा से काट देती है. ऐसे में कुछ लोकल नेता अपना सर उठाते हैं तो उन्हें गुंडा तत्व, जातिवादी बता घेरा जाता है. उत्तरप्रदेश में चौधरी चरण सिंह को जाट हितैषी बता हाशिये पर किया जाता है. मुलायम परिवार को गुंडा बता किनारे किया जाता है, बिहार में लालू परिवार को गुंडा बता लग किया जाता है तो हरयाणा में चौटाला परिवार के साथ ऐसा किया जाता है. इन सबको एक जाति विशेष के साथ जोड़ उन्हें बाँधने की कोशिश होती है; जिसमें भोले भाले वोटर काबू में आ जाते हैं और समाज में ध्रुवीकरण हो जाता है. यही कारण है इस वर्ग से कोई भी बड़ा नेता केंद्र में नहीं उभरता. उभरता है तो अन्य नेता उसे जातिवादी बता घेर कर गिरा देते हैं. दीनबन्धु सर छोटू राम ने इस बात को समझा जब उन्होंने किसान को दुश्मन को पहचानने की कही. कोई भी ऐसा व्यक्ति जो इन कृषक और कमेरे समाज को एक दूसरे से अलग करने की कोशिश करता है वह इस समाज का दुश्मन है. इस दुश्मन को चौधरी देवी लाल ने समझा. उन्होंने अपनी राजनीति में सभी कमेरों को आगे बढाया; चौधरी चरण सिंह ने समझा जो हमेशा किसान हित की बात करते थे.
किसान एकता केवल इसलिए जरूरी नहीं क्योंकि उनकी समस्याएं एक जैसी हैं; अपितु इसलिए भी है कि उन समस्याओं के हल भी एक जैसे हैं और वे सब हल राजनैतिक ताकत के बिना हासिल नहीं हो सकते. यही कारण था चौधरी देवी लाल ने अजगर का नारा दिया. अजगर यानी अहीर, जाट गुर्जर और राजपूत; ये प्रमुख कृषक जातियां एवं समुदाय हैं जो भारत में बहुलता में हैं. इसके साथ छोटा कमेरा वर्ग और दलित वर्ग महत्त्व रखता है. इनकी सामाजिक एकता को तोड़ अपना राजनैतिक हित साध रहे सभी राजनैतिक दल और उसके बड़े नेता इस वर्ग के सबसे बड़े दुश्मन हैं. फिर वे नेता बेशक किसी भी राजनैतिक दल में क्यों न हों, किसी भी जाति के क्यों न हों इससे फर्क नहीं पड़ता. यदि किसान को ताकत चाहिए तो एकता बनानी होगी; किसान कमेरों की एकता में इस देश का भविष्य है; वरना यही बहुसंख्यक आबादी आगे जाकर इस इस समय को याद कर स्वयम के आंसू पोंछेगी क्योंकि न तब उनके पास जमीन ही होगी और न ही ऐसे धंधे जिनसे वे अपने पेट को पाल सकें. भूमि अधिग्रहण से इनकी भूमि को छीनना, कॉर्पोरेट सब्सिडी के जरिया कम्पनियों को इनके धंधे देना; इन्हें इनके खुद के घरों में मजदूर बनाने की साजिश मात्र है; इससे किसान कमेरे को अपने जातिय, धर्म के हितो को छोड़ एक होना होगा क्योंकि न धर्म उन्हें रोटी, कपड़ा और मकान देगा और न ही जाति दे पाएगी. स्वयम के समुदाय पर गर्व करना जायज है, पर उसका दम्भ भर दूसरों को छोटा दिखाना नाजायज और छोटा कार्य है. इससे बच एकता के लिए काम करो; भविष्य उस राजनैतिक ताकत से आएगा जिसे हम खो चुके हैं क्योंकि हम एक नहीं हो पा रहे.

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