अलाउद्दीन खिलजी एक खोज

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मेरे आदरणीय मित्र अमरेश मिश्र जो पत्रकार हैं और बेहद संजीदा मुद्दों पर पूरा खोज खबर के साथ लिखते हैं; वे आज कल अलऊदीन खिलजी और पद्मावती का इतिहास खोजने में लगे हैं. उनके रिसर्च में बेहद गम्भीर तथ्य सामने आये हैं. उन्हें यों का यों उनकी भाषा में लिख रहा हूँ. वे अपनी रिसर्च जारी रखे हुए हैं और इस आर्टिकल में उनके रिसर्च को आगे डाल दूंगा.

अलौद्दीन खिल्जी और ‘राजपूत सम्मान’ में अन्तरविरोध नही था
ऐतिहासिक तथ्यों एवं मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य ‘पद्मावती’ के अध्यन से ज्ञात होता है कि 14वी सदी के दिल्ली के सुल्तान अलौद्दिन खिल्जी और ‘राजपूत सम्मान’ के प्रश्न पर कोई टकराव की स्तिथि नही रही। 
सूफी संत मलिक मुहम्मद जायसी ने पद्मावत नामक ग्रन्थ 1540 ईस्वी में लिखी था। रानी पद्मिनी से ताल्लुक रखने वाली तथाकथित घटना 1303 ईस्वी के आस पास घटित हुई।
एतिहासिक साक्ष्य कहीं भी ‘चित्तौड़ की रानी पद्मावती’, या उसकी खूबसूरती से अभिभूत हो खिलजी ने चित्तौड़ पर हमला किया, ऐसी बातों का जिक्र नही करते हैं।
महान सूफी कलमकार, इतिहासकार, भारतीय संगीत एवं खड़ी बोली के पितामाह अमीर खुसरो खिल्जी के साथ  चित्तौड़ अभियान में शामिल थे। अपनी फारसी भाषा में लिखी किताब ‘खज़ई-उल-फ़ूतूह’ खुसरो अलौद्दिन खिल्जी के सैनिक अभियानो, प्रशासनिक कार्यों, और   जन-संसाधनो के छेत्र मे किये काम का उल्लेख करते हैं। खुसरो के हिसाब से 1303 ईस्वी में चित्तौड़ के राजा ने खिलजी के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था। और खिल्जी ने उसे माफ भी कर दिया था। खुसरो के करीबन 50 सालों बाद, इतिहासकार ज़ियाद्दुन बरनी भी इन्ही तथ्यों की पुष्टि करते हैं।
बीसवीं सदी के इतिहासकार और उनकी पुस्तकें जैसे श्री किशोरी लाल सरन (‘खिल्जियों का इतिहास’), इरफान हबीब (‘Northern India under the Sultanate’), बनारसी प्रसाद सक्सेना (‘The Delhi Sultanate’), भी खुसरो और बरनी द्वारा लिखे गये तथ्यों की पुष्टि करतें हैं।
‘जौहर’ चित्तौड़ में नही रणथंभोर में हुआ था
आशचर्य की बात यह है की अलौद्दिन खिल्जी से जुड़ी ‘जौहर’ वाला प्रसंग दिल्ली सम्राट के रणथंभोर हमले के समय सामने आता है। रणथंभोर पर खिल्जी ने हमला 1301 में किया था। चित्तौड़ की चढ़ाई 1303 में की गयी।
मंगोल आतताइयों से भारत को बचाने में खिल्जी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। बगदाद से लेकर यूरोप, रूस और चीन तक खून्खार मंगोलों ने लगभग पूरी दुनिया में कोहराम मचा कर कबज़ा कर लिया था। बलबन दिल्ली का पहला बादशाह थे जिसने मंगोलों को शिकस्त दी। उसके बाद खिल्जी ने मंगोलों को परास्त कर उनके अजेय होने का मिथक तोड़ा।

खिल्जी ने एक के बाद एक लड़ाइयों में मंगोलों को हरा कर उनकी कमर तोड़ दी। जरन-मनजूर (1297-1298), सिविस्तान (1298), कीली (1299), दिल्ली (1303), अमरोहा (1305) के युद्धों में मंगोलों को मुंह की खानी पड़ी। 1306 ईस्वी में खिल्जी की फौजों ने रावी नदी के तट पर मंगोलों पर निर्णायक जीत हासिल की। उसके बाद, खिल्जी के सेनपतियों ने मंगोलों को अफगानिस्तान तक खदेड़ा।
रणथंभोर से खिल्जी की लड़ाई का मुख्य मुद्दा था मंगोल सरदार–जैसे मुहम्मद शाह और कभरू–का राजस्थान की तरफ भाग जाना। रणथंभोर के शासक हम्मिरा देव ने दोनो मंगोल भगोड़ों को शरण दी।
रणथंभौर की लड़ाई और घेरेबन्दी लम्बी चली। खून की नदियां बह निकली। राजा हम्मीरा का क़िला अभेद माना जाता था। खिल्जी अपने युध्द कौशल और तकनीक की वजह से जीता। उसके पास बड़ी-बड़ी चट्टान नुमा missiles फेकने वाली मशीने थीं। क़िले के चारों तरफ फैली खाई को खिल्जी बुने हुए बोरों से भरने में कामयाब रहा।
आगे जारी रहेगा………

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