धर्म

मैं और मेरा धर्म!

rsdhull निजी विचार Leave a Comment

पत्थर पूजे हरी मिले ,तो मैं पुजू पहार….

ताते यह चक्की भली ,पीस खाए संसार …. !!


कंकर-पत्थर जोरी कर लई मस्जिद बनाये.

ता पर चढ़ी मुल्ला बांग दे,क्या बहरा हुआ खुदाय…!!-संत कबीर

स्वतंत्रता को ध्येय मानकर चलने में एक समस्या यह है कि समाज के जकड़े हुए लोग बार बार आकर आपका प्रतिरोध करना चाहते हैं। उन्हें उस जकड़न से अधिक सुरक्षा मिलती है बजाय एक स्वतंत्र जीवन के क्योंकि स्वतंत्रता में एक खतरा है। यह खतरा उन्हें उस जकड़न से प्रेम करने पर विवश करता है जो उसे कम से कम सामाजिक सुरक्षा प्रदान करती है। इस सामाजिक सुरक्षा में मानव जीवन के सर्वोपरि एवं सबसे बड़े बंधन छिपे हैं जो किसी भी हाल में हमारे स्वतंत्रता के परम ध्येय को समाप्त करने में उतारू हैं। हमें इनसे बचना होगा और यदि यह स्वतंत्रता प्राप्त करनी है तो यह जकड़न तोडनी ही होगी।

ईसप की एक कथा है….एक कुत्ता पेड़ के नीचे सो रहा है और नींद में मुस्कुरा रहा है। बड़ा खुश हो रहा है और इधर से उधर करवट ले रहा है। पेड़ के ऊपर बिल्ली बैठी है और यह सब देख रही है। वह चिल्लाकर पूछती है कुत्ते से कि भाई क्यों इतना मगन हुए जा रहे हो? कुत्ता जागकर बोला मैंने स्वर्ग का सपना देखा कि परमात्मा कुत्तों से बहुत खुश है और उसके आशीर्वाद से आसमान से हड्डियाँ बरस रही हैं; यह देख कर मुझे बहुत आनंद हुआ। बिल्ली हंसकर बोली, “ तुम्हारा धर्म और तुम्हारे शास्त्र सहित तुम्हारे स्वर्ग भी झूठे हैं, असली धर्म और शास्त्र हमारे पास है, उनमें असली सच लिखा है….जब परमात्मा प्रसन्न होता है तो स्वर्ग से हड्डियाँ नहीं बल्कि चूहे बरसते हैं।

उपरोक्त कथानक हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि जो हमें पढाया और लिखाया जाता है कुछ सत्य उसमें भी है क्या? धर्म अथवा नैतिकता में जिस प्रकार के तथाकथित लुभावने वायदे जो किये जाते उनमें किसी प्रकार की सत्यता है अथवा नहीं और यदि कोई सत्यता है भी तो इसे हम अब तक नहीं समझ पाए हैं। आर्य समाजी वेदों को तो वैष्णव भागवत को बिलकुल सही मानते हैं। सभी के भगवान सबसे अधिक शक्तिशाली हैं। सभी यह सोच कर ही खुश हैं कि उनके भगवान ने किसी और के धर्म अथवा सम्प्रदाय के भगवान् को कभी किसी समय हराया था। यह अजीब स्थिति है जिसे कोई न तो समझना चाहता है और न ही कोई देखना चाहता है। परम सत्य इस सत्य के पार कहीं छिप गया है कि हमारे धर्म ग्रन्थ केवल मात्र अपने अपने तरीके से हमारी स्वतंत्रता को समाप्त करने में ही संतोष महसूस करते हैं। हमें वैचारिक स्वतंत्रता से अधिक लगाव नहीं। वैचारिक स्वतंत्रता के लिए विचारों को इन बेड़ियों से निकल कर खड़ा होना ही होगा। पर स्वतंत्रता से अधिक हमें अपने विचारों की जकड़न अधिक प्रिय है। जकड़न से मेरा तात्पर्य है सोचने का एक विशेष तरीका। जो है वह दिखता नहीं क्योंकि हम उसे देखना नहीं चाहते और जो नहीं है उसे हम अपनी कल्पनाशीलता में जगह दे हम अति प्रसन्न हैं क्योंकि वह हमें बन्धनों में बांधता है।

कार्ल मार्क्स का एक कथन है; वह कहते हैं कि सभी दार्शनिकों ने विश्व की अनेक प्रकार से व्याख्या की है।  पर मुद्दा उसे बदलने का है उसकी व्याख्या करने का नहीं। यहाँ केवल मात्र कर्म ही आगे आ सकता है कोई व्याख्या नहीं। हर दार्शनिक अपने अपने तरीके से अनर्गल व्याख्या करता है तथा जनता को अधिकाधिक अन्धकार में डुबोता चला जाता है। जो व्यक्ति विशेष स्वतंत्रता से भयभीत है तथा जकड़न की तलाश में है उनके लिए यह व्याख्यान गुरु मन्त्र है। मैं स्वच्छंद विचरण करता हूँ तो मेरी सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल मात्र मेरी है; समाज मेरी सुरक्षा नहीं करेगा। वहीँ दूसरी ओर यदि मैं स्वयं को समाज की कही बेड़ियों में बाँध लेता हूँ तो मेरी सुरक्षा करने की जिम्मेदारी मेरी नहीं समाज की है। यह एक कारावास की तरह है जिसमें सुरक्षा की जिम्मेदारी कारावास चलाने वाले की होती है कैदी की नहीं। जहाँ आप कारावास से भागने का प्रयास करेंगे आपको पीछे से गोली मार दी जायेगी। पहले सामने से आपको जकड़ने का प्रयास करेंगे और बाद में पीछे से गोली मार देंगे। कितना दोहरा चरित्र है आपके समाज का। पहले तो आपकी सुरक्षा की जिम्मेदारी लेता है वहीँ जैसे ही आप इस से बाहर निकलते हैं आपको गोली मारने में समाज उतना ही आगे होगा जितना कि कारावास की सुरक्षा करने वाले वहां से भागने का प्रयास करने वाले कैदी के साथ करते हैं। हमें इस दोहरे चरित्र से बचना होगा; यही हमारी मुक्ति का एक मात्र उपाय है। यहाँ निर्भय एवं भयाकुल व्यक्ति का चरित्र सामने आता है। भयाकुल व्यक्ति को सामाजिक सुरक्षा चाहिए वहीँ निर्भय को कुछ नहीं चाहिए। पर निर्भय बनना कहाँ इतना आसान है इसके लिए पहले हमें इस समाज के चक्र से बाहर भागने का प्रयास करना होगा। जितनी तेजी से आप भागेंगे उतनी ही तेजी से आपकी स्वतंत्रता आपके सामने दिखेगी और पीछे से समाज की गोलियां चलेंगी। गोलियों से बच समाज के चक्र से बाहर जहाँ आप निकले वहां आपको समाज के अन्दर बंधे हुए पागल दिखेंगे। भयाकुल व्यक्ति दूसरी ओर समाज की बेड़ियों में सुरक्षित है। उसे व्याख्या अथवा तर्क से कोई लेना देना नहीं है; उसे केवल समाज की व्याख्या को ग्रहण करना आता है; उसका विरोध करना नहीं। उसकी सुरक्षा इसमें ही है कि वह व्याख्या को ज्यों का त्यों ग्रहण कर ले वरना गोली लगनी निश्चित है। इस गोली से वह हर हाल में बचना चाहेगा अतः ग्रहण कर लेता है जो भी उसे ग्रहण करने को कहा जाए। बेड़ियाँ भी तरह तरह की गारंटी के साथ आती हैं। कहीं मोक्ष की गारंटी तो कहीं जन्नत की गारंटी! अजीब स्थिति है? उदार से उदार धर्म के बारे में यह बात कटु सत्य है। राहुल सांकृत्यायन के शब्दों में, “ धर्म अथवा मजहब का असली रूप क्या है? मनुष्य जाति के शैशव की मानसिक दुर्बलताओं और उस से उत्पन्न मिथ्या विश्वासों का समूह ही धर्म है। यदि उसमें और भी कुछ है तो वह है पुरोहितों, सत्ता धारियों और शोषक वर्गों के धोखे फरेब, जिससे वे अपनी भेड़ों को अपने गल्ले से बाहर नहीं जाने देना चाहते।“

इस प्रकार हम एक समूह में रहते हैं एवं कुछ वर्ग विशेष की तुष्टिकरण की नीतियों के कारण इन झूठी बातों पर विश्वास करते हैं। अमीर का दंश इस प्रकार समाप्त होता है कि वह अपने धन को पिछले जन्म के कर्मों का फल मानता है तो दूसरी और गरीब का दंश इस प्रकार पूर्ण होता है कि वह अपनी गरीबी को पिछले जन्मों का फल मानता है। सत्य कोई नहीं जानना चाहता है: सभी आत्म संतुष्टि चाहते हैं। ब्रह्मचारी हनुमान को भगवान् मान खुश हैं तो विलासी को श्री कृष्ण की रास लीला से संतुष्टि मिलती है। सेक्स से प्रेम करने वाला ओशो धाम जाता है तो सबसे भागा हुआ नाथ सम्प्रदाय में। किसी को अघोरी बन तंत्र साधना करनी है तो दूसरे को पंडित बन मन्त्र साधना! किसी को स्वतंत्रता से सरोकार नहीं क्योंकि वह खतरनाक है। वह अकेला छोड़ देती है और इसे बचाने के लिए समाज आगे नहीं आएगा; कभी नहीं आएगा। समूह का स्वतंत्रता से मेल हो ही नहीं सकता और एसी आशा करना भी मिथ्या है। तभी तो ओशो को इंजेक्शन देकर ऐसे राष्ट्र(फ़्रांस) में मार दिया जाता है जो अपने नागरिकों को स्वतंत्रता एवं अच्छे जीवन देने की गारंटी देता है। ओशो क्यों मरे? क्योंकि वे स्वतंत्र थे और समाज के लिए स्वतंत्र व्यक्ति खतरा है। वह उस समाज के चक्र से बाहर खड़ा है जहाँ से उसे समाज का ढोंग दिख रहा है। स्वतंत्र व्यक्ति अपने विचारों से सब कुछ उथल पुथल कर देगा; अतः उसे मरना ही होगा। इसीलिए ओशो को भी मरना पड़ा। स्वतंत्र को सुरक्षा की आवश्यकता नहीं क्योंकि वह उन बेड़ियों को तोड़कर चक्र से बाहर निकला है। रंग मंच पर यह नाटक सदियों से चलता रहा है एवं चलता रहेगा।

भगत सिंह की मानें तो वे कहते हैं, “इश्वर में कमजोर व्यक्ति को जबरदस्त आश्वासन एवं सहारा मिलता है और विश्वास उसकी कठिनाइयों को आसान ही नहीं बल्कि सुखकर भी बना देता है।“ वह आगे कहते हैं, “मनुष्य ने जब अपनी कमियों और कमजोरियों पर विचार करते हुए अपनी सीमाओं का एहसास किया तो मनुष्य को तमाम कठिनाइयों का साहस पूर्ण  सामना करने और तमाम खतरों के साथ वीरता पूर्वक जूझने की प्रेरणा देने वाली और सुख समृधि के दिनों में काबू से बाहर होने से रोकने के लिए और नियंत्रित करने वाली सत्ता के रूप में इश्वर की कल्पना की।“

एक और दार्शनिक जेनोफिनिज मजाकिया लहजे में कहते हैं, “ यदि बैलों, घोड़ों और शेरों के हाथ मनुष्य के सामान होते और उन हाथों से वे चित्र बना सकते तो इश्वर को क्रमशः बैल, घोड़ों और शेरों के रूप में चित्रित करते।“

अर्थ स्पष्ट है, वास्तविक रूप से मानवीय चेतना से परे इश्वर का कोई अस्तित्व नहीं है एवं इश्वर का होना एक कपोल कल्पना से अधिक कुछ नहीं।

अप्टन सिंक्लेयर के शब्दों में, “ मनुष्य को बस आत्मा की अमरता के बारे में विश्वास दिला दो और उसके बाद उसका सब कुछ लूट लो; वह बगैर बड़बडाए इस कार्य में तुम्हारी सहायता करेगा।“

ऋग्वेद में एक ऋचा है “ब्राह्मण: अस्य मुखं आसदि बाहू राजन्म कृतः….” अर्थात ब्राह्मण का जन्म इश्वर के मुख से और क्षत्रिय का जन्म इश्वर के बाहू से और और अंत में शूद्र का जन्म इश्वर के पैरों से हुआ। इस प्रकार की अवैज्ञानिक एवं कपोल कल्पनात्मक बातें कम से कम इश्वर के मुख से नहीं मानी जा सकती। न ही यह माना जा सकता है कि इश्वर ने पृथ्वी पर आकर किसी विशेष भाषा का ही प्रयोग किया हो। ध्यान देने वाली बात है कि वेद काल के अधिकतर भगवान् एवं देव लुप्त हो गए हैं। नव ग्रंथों तथा प्रार्थनाओं में उन्हें जगह नहीं मिलती। इश्वर जिसे हम निराकार, अविनाशी, अविकारी एवं अजन्मा मानते हैं उसके रूप कुछ हजार वर्षों में ही बदल जाएँ यह संभव नहीं लगता। ध्यान दें कि वेदों का उत्पत्ति काल लगभग चार हजार वर्ष पूर्व माना जाता है तथा पृथ्वी कम से कम एक करोड़ वर्ष पुरानी है और यह साबित किया जा चुका है। भगत सिंह अपने एक लेख में कहते हैं कि हमारे पुरखे बड़े ही चतुर थे। उन्होंने ऐसे ऐसे सिद्धांतों की रचना की कि तर्क और अविश्वास सर ही न उठा सकें।

“कृण्वन्तु विश्वम् आर्यम्” अर्थात समस्त भूमि को आर्य भूमि बना दो। आर्य समाज इस उद्देश्य के साथ चलता है। अर्थात आपको उसके बाद ईश्वर की परिकल्पना आर्यसमाजियों की तरह करनी होगी और उन्ही की तरह सोचना भी होगा और करना भी होगा। यह इस्लाम के जेहाद से किस प्रकार अलग है मैं इस बारे में विचार नहीं कर पा रहा हूँ। इस्लाम समस्त भूमि को मुस्लिम बनाने की शिक्षा देता है तथा आर्य समाज समस्त भूमि को आर्य बनाने की शिक्षा। अब वेदों के देवों का भी विवेचन कर लें। वेदों की रचना उस समय हुई थी जब समाज में बुद्धि का एवं परिकल्पना का विस्तार इस प्रकार नहीं हुआ था जिस प्रकार आज के समय में आपको दिखता है। यहाँ देव भी तैंतीस करोड़ नहीं हैं और जनता को मूर्ख बना कर रखने की अधिक आवश्यकता नहीं क्योंकि शिक्षा केवल मात्र ब्राह्मणों तक ही सीमित थी अथवा थोड़ी बहुत क्षत्रियों तक जो ईश्वर की बाजू से उत्पन्न हुए थे। क्षत्रियों को भाव देना कमजोर ब्राह्मणों के लिए आवश्यक था क्योंकि वे ही रक्षा करते थे एवं राज भी करते थे। निठल्ले ब्राह्मण केवल मात्र उपदेश देने में एवं ऋचाओं की रचना में व्यस्त रहते थे। अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, इंद्र आदि को ईश्वर का दर्जा था एवं उनकी पूजा मौके के अनुसार होती थी। वर्षा नहीं हो रही है तो इंद्र देव की पूजा करना आवश्यक था और इस प्रकार ब्राह्मणों के सम्मान में वृद्धि होती थी क्योंकि किसी भी पूजा को बिन ब्राह्मण के पूर्ण नहीं माना जाता था। दान दक्षिणा को केवल मात्र तभी पूर्ण माना जाता था जब वह ब्राह्मण को दी जाए। इंद्र देव का कार्य वर्षा करवाना था तो दूसरी और यदि आप देखेंगे कि वैदिक काल के बाद इंद्र देव को विलासता के देव के रूप में अधिक जाना गया है। ढेर सारी अप्सराएं उनकी सेवा में मौजूद रहती थीं एवं अप्सराओं के लिए इंद्र देव युद्ध तक करने के लिए उतारू रहते थे। पुराण इंद्र देव के उन कार्यों से भरे हुए हैं जहाँ वे ऋषियों की तपस्याओं को भंग करने के लिए अपनी अप्सराओं का प्रयोग करते थे।

नैतिकता का पैमाना भी अलग अलग समय में अलग अलग ही रहा है। जहाँ समाज के उच्च वर्ग अर्थात ब्राह्मण और क्षत्रियों के लिए बहु विवाह आदि प्रथाएं प्रचलन में थीं तो दूसरी और शूद्रों को आज्ञा दी जाती थी कि वे एक ही पत्नी से संतुष्ट रहे। गन्धर्व विवाह की प्रथा यहाँ क्षत्रियों में प्रचुरता से उपलब्ध थी और यह विवाह निम्न जातियों के लिए वर्जित था। किसी भी जगह किसी भी महिला को बुला कर उसको अपनी पत्नी मान उसका सम्भोग करना और उसके बाद आगे निकल जाना यह क्षत्रियों की शान माना जाता था। ऐसा विधि संपन्न हो सके इस लिए क्षत्रियों को गधर्व विवाह करने की आज्ञा दी गयी। युद्ध के लिए एवं विभिन्न राज्यों को जीतने के लिए क्षत्रियों को इतना कानूनी अधिकार देना उस समय न्याय सम्मत माना गया। पर हम इतिहास में देखते हैं कि महिला को इस प्रकार बहुत विवाह की आज्ञा शास्त्र नहीं देते हैं। नारी को भोग की वस्तु माना जाता था। उसका अपना निजी कोई भी अस्तित्व न था अतः वह पुरुषों के कहे अनुसार चलने के लिए मजबूर थी। कुछ विशेष कार्यों को अंजाम देने के लिए परिवार बनाए गए उनमें प्रथम कार्य था पीढ़ी को बढ़ाना अर्थात पिता को अपनी पीढ़ी को आगे बढाने के लिए परिवार की आवश्यकता थी। दूसरा कार्य था यौन समबन्ध, पुरुष एवं महिला को यौन संबंधों की आवश्यकता रहती है; इन्हें दायरे में बाँधने के लिए भी परिवार बनाए गए। तीसरा कार्य था आर्थिक आधार; पुरुष जो कार्य करने के लिए बाहर जाता था उसे घर के अन्दर खाना मिले और वह महिला जो शारीरिक कार्य करने में पुरुषों की तरह कुशल नहीं थी उसे आर्थिक सुरक्षा मिले। इस लिए परिवार की रचना हुई। पर विवाह का नैतिकता से क्या सम्बन्ध है? एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के लिए कुछ भी नहीं। क्योंकि विवाह का समाज से और आर्थिक स्थिति से सम्बन्ध है और इस से बाहर विवाह का कोई अस्तित्व नहीं। पुरुष जो कमा कर लाते थे और उनके पास जमीन आदि थी तो उस जमीन को एवं उस धन को उत्तराधिकारी की आवश्यकता थी। विवाह जैसे कार्य को सामाजिक मान्यता देकर कानूनी रूप से उस संपत्ति को अधिकारी दिया जाता था और इस से बाहर विवाह की कोई भी मान्यता नहीं। विवाहोत्तर संबंधों के लिए पुरुषों के लिए वैश्यालय बने हुए थे और उन्हें सामाजिक मान्यता भी हासिल थी। यहाँ पुरुष महिलाओं के साथ संसर्ग कर सकते थे और उसके बदले अपनी संपत्ति में से कुछ भी दे सकते थे। यदि हम मध्यकालीन समय से कुछ समय पहले के भारत में लगभग दो हजार से कुछ वर्ष पूर्व जाएँ तो हम देखते हैं कि वेश्याओं को जिस प्रकार का सामजिक आदर प्राप्त था उस प्रकार का आदर आज आम महिला को भी प्राप्त न है। यह सब जरूरतों के हिसाब से बदल दिया जाता। महिलायें कम वस्त्र पहनती और उस ही प्रकार गर्म राष्ट्र होने के कारण पुरुष भी कम वस्त्र पहनते। वह समय किस हद तक विलासतापूर्ण था इस का उत्तर हमें खजुराहो आदि मंदिरों में जाकर मिल जाता है अथवा वात्स्यायन के कामसूत्र में झाँक कर मिल सकता है। श्रृगार रस की हजारों पुस्तकें हमें इतिहास में मुक्त रूप से मिलेंगी। नैतिकता का पैमाना केवल मात्र निम्न एवं निम्न मध्य वर्ग के लिए है एवं था। उच्च वर्ग ने हमेशा इस नैतिकता के पैमाने तोड़ आगे बढ़ने का कार्य किया है। एक एक राजा की पांच सौ तक भी निजी दासियाँ होना आम बात थी। शाहजहाँ जिसने तथाकथित रूप से मुमताज के लिए ताजमहल बनवाया मुमताज उसकी नौंवीं बीवी थी और अन्य बीवियां भी जीवित थीं। निम्न वर्ग क्योंकि आर्थिक रूप से इतना संपन्न नहीं था तो उसे शिक्षा दी जाती कि वे एक विवाह की प्रथा का पालन करे क्योंकि समाज के हिसाब से वह एक से अधिक महिला को रखने में आर्थिक रूप से संपन्न नहीं था। जहाँगीर के हरम में एक हजार से अधिक निजी दासियाँ थीं। ये तो मुस्लिम शासक हैं यदि हम उस से पहले चाणक्य के समय में महानंद को देखें तो महानंद के पास विलासता से रहने के अलावा कोई और कार्य ही नहीं था और उसकी इस ही आदत से चिड कर चाणक्य ने उसे पदच्युत करने का संकल्प उठाया था। दक्षिण के एक राजा जिनका सम्पूर्ण विवरण दीवान जर्मनी दास की “महाराजा” नामक पुस्तक में आता है, उसने अपने राज्य के लिए आवश्यक किया हुआ था कि जब भी वे सड़क पर निकलते तो महिलाओं के लिए आवश्यक था कि वे छाती के ऊपर से अपना वस्त्र उतार कर उनका सम्मान करें। इस बेकार की प्रथा को एक अंग्रेज अफसर ने बंद करवाया तो राजा ने एक नव प्रथा प्रारंभ कर दी और वह यह थी कि अब महिलाओं के लिए आवश्यक था कि वे अपने नीचे पहने हुए वस्त्र को आँखों तक उठा कर राजा का सम्मान करतीं और उस समय उनके लिए आवश्यक था कि वे नीचे कोई अन्तः वस्त्र न पहने। नैतिकता का सच्चा एवं झूठा पैमाना जब हमें उत्तर की पटियाला रियासत में ले जाता है तो पटियाला के महाराजा के हरम में ढाई सौ से अधिक रानियाँ थीं और उन्होंने एक लेब बना रखी थी जहाँ लगातार देश विदेश से आये वैज्ञानिक राजा की यौन शक्ति को बढाने की दवा बनाते। राजा वर्ष में एक बार अपना शाही आभूषण पहन कर माल रोड पर यात्रा पर निकलते थे और उस समय वे नग्न अवस्था में होते और उनका लिंग उत्तेजित अवस्था में होता। राजा यह दिखाते थे कि अभी उनकी यौन शक्ति सही सलामत है। यह प्रथा दौ सौ सालों तक चलती रहीं जब भारत की स्वतंत्रता के बाद इसे बंद किया गया। नैतिकता के ये दोहरे पैमाने किस प्रकार हमारे समाज में बने यह सोचना भी अजीब होगा। पटियाला के राजा के स्विमिंग पूल में सीढियां बनी थीं और जब वे सीढ़ियों पर चढ़ते तो उन्होने हुक्म सुनाया हुआ था कि सीढ़ियों के दोनों और नग्नावस्था में दासियाँ मौजूद रहे और वे दासियों के स्तनों को अपने हाथों से पकड़ ऊपर चढ़ते। ये राजा ही अपनी प्रजा को नैतिकता की शिक्षा देते ताकि जनता उनके सम्पूर्ण नियंत्रण में रहे। चीन के कुछ इलाकों में आज भी एक प्रथा जीवित है जहाँ पति अपनी पत्नी को स्वेच्छा से उसके प्रेमी के साथ यौन सम्बन्ध बनाने की अनुमति देते हैं और स्वयं अन्य महिलाओं की खोज में निकल पड़ते हैं। उनके प्रेमियों के लिए आवश्यक है कि वे रात को आयें और जलती हुई मशालों के साथ आयें ताकि समस्त गाँव को पता चल सके कि प्रेमी आ रहा है। पति स्वयं प्रेमी का स्वागत करता है और उसे खाना खिला कर स्वयं मशाल ले अपनी प्रेमिका के पास निकल पड़ता है। क्या भारतीय समाज अब इस प्रथा को अनैतिक कहेगा? आपके लिए होंगी पर कम से कम उनके लिये नहीं। चीन के कुछ नारी प्रधान कबीलों में महिलाओं को बड़े होते ही उनकी ईश्वर के साथ शादी कर दी जाती है और शादी दिखाने के लिए उनके वस्त्रों पर एक विशेष प्रकार का वस्त्र और पहना दिया जाता है जो इस बात का सबूत रहता है कि अमुक महिला की इश्वर के साथ शादी हो चुकी है। ईश्वर के साथ शादी होने के बाद वह महिला जीवन भर अपनी मन मर्जी के पुरुषों से यौन सम्बन्ध बनाने के लिए स्वतंत्र है और इस बात में समाज उसका साथ देगा। वह जब चाहे बच्चे पैदा कर अपनी इस स्वतंत्रता पर रोक लगा सकती है। अब इसे नैतिकता के किस पैमाने पर तोलेगा हमारा समाज?

भारतीय समाज की एक खासियत रही है और वह है दोगलापन! बगल में छुरी और मूंह में राम राम यह भारतीय समाज की एक ऐसी खासियत है जिसका मेल शायद ही विश्व में कहीं और दिखे। “ग्राहक ही भगवान् है” ऐसा अपनी दुकानों के आगे लिख ये दुकानदार किस प्रकार अपने भगवान् को लूटते हैं और फिर बाद में दीपावली के समय किस प्रकार अपने भगवान् की छिप कर पूजा करते हैं और किस प्रकार बड़े बड़े मंदिरों में लाखों करोड़ों का दान देते हैं ताकि उनके ये पाप छिप सकें; यह बात किसी से छिपी नहीं है। हम ऊपर से नैतिकता का ढोंग करते हैं और अन्दर हमारी एक अलग ही दुनिया रहती है यह हम सब जानते हैं। नारी को एक तरफ देवी मान पूजने वाला भारतीय पुरुष किस प्रकार नारी का निरादर सदियों से करता आया है यह किसी से छिपा नहीं है। मुझे इस प्रकार की दोहरी नैतिकता से बड़ा जबरदस्त गुस्सा है। मनसा वाचा एवं कर्मणा तीनों का एक साथ होना शायद ही किसी भारतीय पुरुष में हमें दिखे। इसे सत्य में ही नैतिक पतन कहा जा सकता है और इसकी कोई सीमा नहीं। इस जगह मेरा मानना है कि विचारों को स्वतंत्र रूप से छोड़ देना चाहिए ताकि मनुष्य का अन्दर एवं बाहर सब कुछ एक जैसा हो सके; एक दम एक समान और बिन किसी धोखे के! पर नैतिकता को निजी संबंधों के साथ जोड़ना मुझे अखरता है क्योंकि नैतिकता का यह पहलू समाज के हर समय के साथ अलग अलग होता आया है और होता रहेगा। इसे समाज के गिराव अथवा ऊपर उठने के साथ देखना गलत और स्वयं को धोखा देने के बराबर है। मनुष्य जीवन का कुल काल अधिकाधिक सौ वर्ष के आस पास रहता है और मेरे जीवन के पैंतीस वर्षों में ही यह नैतिकता इतनी बदली है कि मेरे बाद अर्थात आज से लगभग सत्तर पिचहत्तर वर्ष के बाद ये एक जैसी रहेगी इस पर मुझे सम्पूर्ण संदेह है अतः मैं इसे नैतिकता के साथ जोड़ने से पूर्णतया इनकार करता हूँ। जहाँ उत्तर भारत के हिन्दुओं में बुआ की लड़की अथवा मामा की लड़की को बहन माना जाता है तो दूसरी और पकिस्तान में बुआ की अथवा मामा की लड़की से बाकायदा विवाह किया जाता है और यह प्रथा वहां से आकर भारत में बसे पंजाबी समुदाय में भी प्रचलित है। इस प्रथा को दक्षिण भारतीय राज्यों में भी देखा जा सकता है। शरियत में मुसलमान चार विवाह कर सकता है तो वहीँ मुस्लिम महिला को ऐसा करने की मनाही है। मुस्लिम पुरुष गैर मुस्लिम महिला से शादी कर सकता है तो शरियत में मुस्लिम महिला के लिए ऐसा करना मौत की सजा देने वाली सजा है। धर्म का इस से नग्न पाखण्ड कहाँ मिलेगा? नेपाल में और उत्तर पूर्व में महिला एक से अधिक पुरुष से विवाह कर सकती है तो यहाँ हिन्दू मैरिज एक्ट में यह गैर कानूनी है हालांकि साथ में यह प्रावधान किया है कि बहु विवाह वहां किया जा सकता है जहाँ परंपरा ऐसा करने को मान्यता देती हो। 1950 में हिन्दू मैरिज एक्ट के आने से पहले बहुत विवाह हिन्दुओं में मान्यता प्राप्त था और कानून के पारित होते ही अब यह अनैतिक कैसे हो सकता है? हालांकि यह अब गैर कानूनी अवश्य है और ऐसा महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार देने के लिए तथा जनसँख्या को बढ़ने से रोकने के लिए किया गया मालूम होता है। पाकिस्तान में मुस्लिम एक ही शादी कर सकता है तो भारत में आज भी चार शादी कर सकता है। यहाँ इतनी अलग अलग प्रथाओं एवं परम्पराओं में नैतिकता का आगमन कहाँ से आता है इसे समझना नामुमकिन है अतः मैं इसे नैतिकता के साथ जोड़ने से सम्पूर्ण रूप से इनकार करता हूँ। आज की ये प्रथाए आज से सौ वर्ष के बाद जीवित रहेंगी यह नहीं कहा जा सकता अतः इसे नैतिकता के साथ जोड़ने से अनैतिक कुछ नहीं। जहाँ भारत में दो हजार वर्ष पहले वैश्या प्रथा को कानूनी मान्यता प्राप्त थी तो आज इसे गैर कानूनी माना जाता है वहीँ दूसरी और विश्व के बहुत से देशों में इसे कानूनी मान्यता पूर्णतया हासिल है। अब वेश्या के साथ संसर्ग या तो कानूनी है अथवा गैर कानूनी। पर यह अनैतिक बिलकुल भी नहीं कहा जा सकता है क्योंकि पुरुष और महिला में प्रथम मौलिक सम्बन्ध ही यौन सम्बन्ध है तो इसे नैतिकता के साथ जोड़ भारतीय समाज सदियों से स्वयं को धोखा देता रहा है। जिस राष्ट्र में खजुराहो में यौन सम्बन्ध को ईश्वर के साथ जोड़ देखा गया है उस राष्ट्र में पोर्न के नैतिक अथवा अनैतिक होने पर बहस हो इससे अधिक दोगलापन क्या होगा। सबके मोबाइलों में अथवा निजी जीवन में इसकी उपलब्धता है और हम बाहर से इसके विरुद्ध बोल स्वयं को एवं दूसरों को धोखा देते रहे हैं। जहाँ हिन्दू मैरिज एक्ट पुरुष की शादी योग्य उम्र 21 वर्ष मानता है तो वहीँ आर्य समाज तो इतना आगे चला गया है कि वह मानता है कि एक पुरुष को आदर्श स्थिति में 48 वर्ष से पहले शादी नहीं करनी चाहिए और वह अपने से आधी उम्र की लड़की अर्थात 24 वर्ष की लड़की के साथ शादी करे। मैं तो इसे अनैतिक मानूंगा। अपनी बेटी की उम्र की लड़की के साथ शादी कर कौनसा नैतिक पैमाना पार कर रहा है आर्य समाज मैं इसे समझने में पूरी तरह से असमर्थ हूँ। इस्लाम दूसरी और महिला के रजस्वला होते ही उसे शादी के लायक मान लेता है अर्थात लगभग 12 अथवा 13 वर्ष की उम्र में। कितना अजीब है? इस प्रकार की बेवकूफी भरी विसंगतियां सम्पूर्ण विश्व में भरी हुई हैं अतः इस सम्बन्ध को नैतिक अथवा अनैतिक मानना प्रकृति को धोखा देने के अलावा कुछ नहीं। इसे मानव की इच्छा के ऊपर छोड़ देना चाहिए और इसमें केवल मात्र एक बात को याद रखना आवश्यक है कि सम्बन्ध इच्छा विरुद्ध न बनें। इससे अधिक समाज को बीच में आने का कोई अधिकार नहीं है। यह व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता का मामला है और इसे व्यक्ति पर ही छोड़ना उचित है। यदि एक पुरुष और एक महिला एक साथ सम्बन्ध बनाना चाहते हैं तो समाज को चाहते हुए भी बीच में आने का अधिकार नहीं है।

मेरे विचारों को क्रांतिकारी माना जा सकता है अथवा मुझे बागी मान इस समाज से निकाला जा सकता है। यही तो मैं चाहता हूँ; इससे पहले कि मैं सामाजिक चक्र से बाहर निकलूँ समाज स्वयं मुझे मुक्ति देदे तो अच्छा। मैं समाज के बेढंगे और मूर्खता पूर्ण कार्य इस चक्र से बाहर बैठ देखना चाहता हूँ। ऐसा लगता है कि कहीं मुक्ति का सही पैमाना इस ढकोसले से बाहर निकलना तो नहीं? कहीं मुक्ति की कोई अन्य अवधारणा हो ही न! मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि एक कथा के अनुसार ब्रह्मा का अपनी स्वयम की पुत्री पर दिल आ गया था। ब्रह्मा जो सृष्टि के रचनाकार हैं वे अपनी पुत्री के साथ सम्बन्ध बना लें और समाज इसे नैतिक मान ले और बाद में किसी दूसरी महिला के साथ अथवा पुरुष के साथ सम्बन्ध बनाने को अनैतिक मान ले यह ढकोसला नहीं तो क्या है? श्री कृष्ण की सौलह हजार रानियाँ किस श्रेणी में नैतिक हैं? अथवा उनका राधा के साथ प्रेम और साथ में रुक्मणी के साथ विवाह नैतिकता के कौनसे पैमाने में आता है? किस नैतिक कार्य के कारण कुंती को विवाह पूर्व कर्ण पैदा हुआ था और पांडू के नपुंसक होने के बावजूद भी युधिस्ठिर, भीम और अर्जुन जैसे बलशाली पुत्र पैदा हुए थे? किस प्रकार महर्षि व्यास ने एक रानी को अपनी नजर मात्र से गर्भवती बना दिया था? यह सब तो थोड़े से उदहारण हैं और यदि मैं केवल इन उदाहरणों को ढूँढने निकलूँ तो एक पूरी पुस्तक अथवा कई पुस्तकें केवल मात्र इन उदाहरणों की होंगी। यह समाज की इतनी बड़ी विकृति है जिसका तोड़ समूचे विश्व में कहीं नहीं मिलेगा। तो क्यों इन नकली नैतिकता के कार्यों में पड़े हैं; स्वच्छंद विचरण कीजिये।

अपनी सीमित बुद्धि से मैं अब वेदों का कुछ अर्थ निकालने का प्रयास करता हूँ। यह एक लम्बी साधना है जिसका प्रारंभ मैं कर चुका हूँ। अभी सीखने में समय लगेगा पर मैं निश्चित ही या तो इस समाज को तबाह कर दूंगा अथवा स्वयं समाप्त हो जाऊंगा। पर एक बात निश्चित है कि चुप नहीं बैठूँगा क्योंकि यह एक मात्र पाप कर्म है। समाज ने धर्मादि कर्म कांडों से और तथाकथित नैतिकता से मनुष्य की स्वतंत्रता को हजारों वर्षों से छीना है; इसका विरोध करना आवश्यक है। मैं नहीं चाहता कि मेरी आने वाली पीढियां भी इस भ्रमजाल में रह कर अपना जीवन समाप्त कर दें जिस प्रकार मैंने अपने जीवन के 35 वर्ष समाप्त कर दिए। समय बहुत कम है तथा करने के लिए कार्य बहुत ही अधिक।

हमारे वेद नारियों के बारे में क्या विचार रखते हैं उसे समझना भी आवश्यक है। नीचे दिए दो मन्त्रों के भागों से यह समझने का प्रयास करता हूँ:

इन्द्रश्चिद्घा तद्ब्रतीत स्त्रिया अशान्स्यं मनः, उतो अह क्रतुं रघुं ऋग्वेद ८/३३/१७

अर्थात इंद्र ने कहा कि नारी के मन का शासन असंभव है क्योंकि उसकी बुद्धि छोटी होती है। एक और मन्त्र है इस ही प्रकार का इसे भी समझ लें:

न वै स्त्रैणानि सख्यानि संति सालावृकाणां हृद्यन्येता ऋग्वेद १०/९५/१५

      अर्थात स्त्रियों का प्रेम एवं मित्र कभी स्थायी नहीं होते, स्त्रियों एवं वृकों का ह्रदय एक समान होता है। छोटी बुद्धि वाली नारी के प्रेम पर विश्वास करने से प्रभु ने मना किया है और उसकी तुलना असुर(वृक) के ह्रदय से की है। इस प्रकार की असंस्कारी भाषा को ईश्वर का कहा बता कर भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति गर्व महसूस करती है। किस प्रकार नारी विरोधी बना कर समाज को नारी की स्वतंत्रता छीनी गयी इसका उदाहरण केवल मात्र इन दो मन्त्रों से ही समझा जा सकता है। अब एक प्रश्न और वह यह है कि यदि भगवान् को पता था कि नारी की बुद्धि छोटी है एवं उस छोटी बुद्धि के कारण उसे समान अधिकारों से वंचित होना होगा तो क्यों नहीं आप सब के भगवान् ने उसे थोड़ी अधिक बुद्धि दे दी होती तो उस का भी काम चल जाता एवं यह जगत भी सुचारू रूप से चलता रहता। अब इसे कम से कम कर्म का फल नहीं मान खारिज कर सकता धर्म। गरीबी, अमीरी, सुख एवं दुःख आदि सांसारिक कार्यों को तो धर्म ने आपके पूर्व कर्मों का फल माना है पर नारी की मानसिक कमजोरी कौनसे कर्म का फल है यह मैं समझ नहीं पा रहा। कृपया कर मेरा ज्ञान वर्धन करें।

और किस प्रकार की नैतिकता को हम ढो रहे हैं उसका उत्तर भी हमें केवल मात्र ऋग्वेद में ही मिल जाता है। आगे बढने से पहले जरा उस पर नजर डालना भी आवश्यक है।

प्रतिष्ट यस्य वीरकर्ममिश्न्द्निष्ठितं नु नर्यो अपौहत्,

पुनस्तदा वृहति यत्कनाया दुहितुरा अनुभृतमनर्वा ऋग्वेद १०/६१/५

      अर्थात जो प्रजापति का वीर्य पुत्रोत्पादन में समर्थ है, वह बढ़ कर निकला। प्रजापति ने मनुष्यों के हित के लिए वीर्य का त्याग किया अर्थात छोड़ा। अपनी सुन्दर कन्या(ऊषा) के शरीर में ब्रह्म व् प्रजापति ने उस शुक्र(वीर्य) का सेक किया अर्थात सींचा।

      इतने में क्या होगा इसे आगे बढाते हुए कहा है:

मध्या यत्क्तर्वमभवद्भीके कामं कृण्वाने पितरि युवत्याम,

मनानग्रेतो जहतुविर्यन्ता सानौ निषिक्तं सुकृतस्य योनौ ऋग्वेद १०/६१/६

      अर्थात जिस समय पिता युवती कन्या(उषा) के ऊपर पूर्वोक्त रूप से रतिकामी(कामुक) हुए और दोनों का संगमन(सहवास) हुआ, उस समय दोनों के परस्पर संगमन से अल्प शुक्र(वीर्य) का सेक अर्थात सींचन हुआ। सुकर्म के आधारस्वरुप एक उन्नत स्थान में उस शुक्र का सेक हुआ।

अब जरा आगे बढ़ते हुए पढ़ते हैं:

पिता यत्स्वाम् दुहितरमधिष्कन्क्षमया रेतः संजग्मानो निषिञ्चत,

स्वाध्य: अजनयन ब्रह्म देवा वास्तोष्पतिं व्रतपां निरतक्षन् ऋग्वेद १०/६१/७

अर्थात जिस समय पिता ने अपनी कन्या के साथ सम्भोग किया, उस समय पृथ्वी के साथ मिल कर शुक्र का सेक किया अर्थात वीर्य सींचा, सुकृती देवों ने व्रतरक्षक ब्रह्म( वास्तोष्पति एवं रूद्र) का निर्माण किया।

 इसे साफ़ शब्दों में समझने का प्रयास करें तो अर्थ यह निकलता है कि सृष्टि के रचयिता ब्रह्म ने अपनी पुत्री ऊषा के साथ सम्भोग करने के बाद वास्तोष्पति एवं रूद्र का निर्माण किया। इस प्रकार की नीच बात को हम ईश्वर के श्री मुख से निकला मानते हैं एवं उसके कहे अनुसार हम नैतिकता की बातें करते हैं।

ऋग्वेद तो और भी आगे बढ़ता है एक श्लोक के अनुसार वहां शश्वती नामक स्त्री एक आर्य पुरुष के लिंग को देख कर कहती है कि हे आर्य बहुत उत्तम भोग साधक वस्तु को तुम धारण करते हो। मन्त्र में यहाँ तक कहा गया है कि लिंग हड्डी से रहित, विशाल एवं नीचे की और लंबायमान है और इसे देख कर ही शश्वती यह बात कहती है। मन्त्र नीचे प्रस्तुत करता हूँ।

अन्वस्य स्थूरं ददृशे पुरस्तादनस्थः ऊरूरवरम्बमाणः,

शश्वती नार्यभिचक्ष्याह सुभद्रमर्य भोजनं बिभर्षि ऋग्वेद ८/१/३४

अब इस अनैतिकता को छोड़ना उचित है अथवा अन्य अनैतिकताओं को। हिन्दू धर्म एवं सभी धर्मों में कहीं न कहीं इस प्रकार के बेवकूफाना बातें मिलना आम बात है। अब स्वतंत्रता को ध्येय मान चलने के समय यह सोचना भी आवश्यक है कि स्वतंत्रता किस प्रकार हासिल हो। इसके लिए समाज के इस कुचक्र को तोडना ही होगा। इसके अलावा हमारे पास कोई और चारा नहीं है। समाज एवं व्यक्ति पूरी तरह से एक दूसरे के विरोध में हैं। दोनों में से केवल एक ही जीवित रह सकता है; दोनों कभी एक साथ नहीं जी सकते हैं। आप स्वतंत्र होने का प्रयास करें; आपको आपकी औकात बता दी जायेगी। समाज के ठेकेदार कुछ ही पलों में आपकी आखों के सामने मौत का तांडव कर रहे होंगे। पर इसका मतलब यह नहीं है कि मैं लड़ना छोड़ दूं। राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर के शब्दों में मानिए तो अभी युद्ध शेष है और इस युद्ध में जो तटस्थ है समय उसके भी अपराध लिखेगा। मैं स्वयं को भविष्य की आने वाली पीढ़ियों का अपराधी नहीं बना सकता हूँ अतः स्वयम के जीवन की सम्पूर्ण तिलांजलि देने पर आपदा हूँ। मुझे पता है कि ईश्वर को साथ न ले जाने से मेरी कठिनाइयाँ दोगुनी हो जायेंगी पर फिर भी मैं निश्चय कर चुका हूँ कि मेरे इस युद्ध में मेरे साथ केवल मेरी चेतना ही जायेगी। इसके अलावा मैं किसी को भी पूर्ण रूप से अस्वीकार करता हूँ। हाँ मेरे जैसे कुछ और सिरफिरे मेरे साथ चलना चाहें तो उनका भरपूर स्वागत है।

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध

फ्रेडरिक नियेत्ज़े एक दार्शनिक हुए उन्होंने एक जगह लिखा कि जिस दिन ईश्वर की मृत्यू होगी उस दिन मनुष्य स्वतंत्र हो जायेगा। ईश्वर की मृत्यू? बड़ी गंभीर परिस्थिति है? पण्डे पुजारियो को तो हजम होगी नहीं बाकि का पता नहीं। पर ईश्वर तो अजन्मा है उसकी मृत्यू कैसे होगी? उसकी मृत्यू होगी आप सबके उस चेतन से जो यह समझ बैठा है कि आपका ईश्वर उनके ईश्वर से श्रेष्ठ है। आप के सभी धर्म एवं पुस्तके ईश्वर के एक होने का उपदेश दे रहे हैं फिर भी आप अपने अपने ईश्वर की सुरक्षा में लगे हैं। स्वतंत्रता चाहते हैं तो इस ईश्वर को मृत्यू को प्राप्त होने दीजिये। समाप्त कीजिये ढोंग को। अद्वैतवाद का सन्देश देने वाले विवेकानंद के भारत में अभी भी तैंतीस करोड़ देवता बसते हैं और इतने देवों के बावजूद भी दरिंदे जन्म लेते हैं। स्वयम् बेड़ियाँ लगा कर बैठी जनता जब स्वयम् के अधिकारों का दम्भ भरती है तो हैरानी होती है।अजीब चक्कर है। अमीर हैं तो सब चुप रहें क्योंकि आप पिछले जन्म का पुण्य कमाया हुआ भोग रहे हैं भले ही पाप कर आप अमीर क्यों न हुए हों इस जन्म में। गरीब हैं तो आप बोलेंगे ही क्या क्योंकि आप पिछले जन्म के पाप का फल भोग रहे हैं।चुप रहिये वरना क्या पता अगले जन्म में गधे बन पैदा हों। भारत का धर्म तर्क के परे जा कर भक्तों को बेवक़ूफ़ बनाता है। दाऊद तो पिछले जन्म के किये पुण्य भोग रहा है और दूसरी ओर कोई ईमानदार किसान कर्ज के तले दब आत्महत्या करता है। उसका यह जन्म भी खराब और पिछला भी खराब। जो धर्म आपका वर्तमान नहीं बना पाया उस से दूसरे जन्मों की इच्छा रखना बेमानी है। धर्म के बारे में कार्ल मार्क्स का दृष्टिकोण समझने योग्य है। “मनुष्य धर्म को बनाता है; धर्म मनुष्य को नहीं बनाता। धर्म वास्तव में, मनुष्य की आत्मचेतना और आत्मभावना है, जिसने या तो अभी तक अपने आप को पाया नहीं है, या (यदि अपने आप को पाया भी है तो) अपने आप को फिर से खो दिया है। लेकिन आदमी कोई ऐसी अमूर्त सत्ता नहीं है जो दुनिया से बाहर कहीं पालथी मारे बैठी हुई हो। मनुष्य की दुनिया मनुष्यों, राज्य, समाज की दुनिया है। यह राज्य, यह समाज धर्म पैदा करता है, एक उल्टी विश्व चेतना पैदा करता है, क्योंकि ये खुद एक उल्टी दुनिया है। धर्म इसी दुनिया का एक सामान्यीकृत सिद्धांत है, इसका विश्वकोशीय सार-संग्रह है, एक लोकप्रिय रूप में इसका तर्क है…। इसलिए धर्म के विरुद्ध संघर्ष उस दुनिया के विरुद्ध एक प्रत्यक्ष अभियान है जिसकी आत्मिक सुगंध धर्म है। धर्म उत्पीड़ित प्राणी की आह है, एक हृदयहीन दुनिया का एहसास है, ठीक वैसे ही जैसे कि यह आत्महीन दशाओं की आत्मा है। ‘यह जनता के लिए अफीम है।’ लोग वास्तव में तब तक सुखी नहीँ हो सकते, जब तक कि वे धर्म का उन्मूलन कर, इसके मिथ्या सुख से निजात नहीं पा लेते। यह अपेक्षा कि लोग इस मरीचिका से अपनेआप को स्वयं अपनी ही दशा की खातिर मुक्त करें, यह अपेक्षा है कि वे ‘उस दशा का ही त्याग कर दें जिसे इस मरीचिका की जरूरत होती है।’
आलोचना का हथियार हथियारों की आलोचना का स्थान नहीं ले सकता। भौतिक शक्तियों को निश्चित रूप से भौतिक शक्तियों द्वारा ही उखाड़ फेंका जाना चाहिए; लेकिन सिद्धांत भी जब जनसमुदायों में रच-बस जाता है, तो एक भौतिक शक्ति बन जाता है।“- कार्ल मार्क्स की कृति ‘हेगेल के न्याय सम्बन्धी दर्शन की समीक्षा का प्रयास’ से उद्धृत।

मुझे इस बीच शहीद भगत सिंह के लेख, “मैं नास्तिक क्यों हूँ” इस को पढने का मौका मिला। भगत सिंह बेहद विश्वास के साथ कहते हैं कि, “‘विश्वास’ कष्टों को हलका कर देता है। यहाँ तक कि उन्हें सुखकर बना सकता है। ईश्वर में मनुष्य को अत्यधिक सान्त्वना देने वाला एक आधार मिल सकता है। उसके बिना मनुष्य को अपने ऊपर निर्भर करना पड़ता है। तूफ़ान और झंझावात के बीच अपने पाँवों पर खड़ा रहना कोई बच्चों का खेल नहीं है। परीक्षा की इन घड़ियों में अहंकार यदि है, तो भाप बन कर उड़ जाता है और मनुष्य अपने विश्वास को ठुकराने का साहस नहीं कर पाता। यदि ऐसा करता है, तो इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि उसके पास सिर्फ़ अहंकार नहीं वरन् कोई अन्य शक्ति है। आज बिलकुल वैसी ही स्थिति है।“ इस लेख को लिखने के समय वे अपनी फांसी से चंद दिवस दूर थे ‘विश्वास’ कष्टों को हलका कर देता है। यहाँ तक कि उन्हें सुखकर बना सकता है। ईश्वर में मनुष्य को अत्यधिक सान्त्वना देने वाला एक आधार मिल सकता है। उसके बिना मनुष्य को अपने ऊपर निर्भर करना पड़ता है। तूफ़ान और झंझावात के बीच अपने पाँवों पर खड़ा रहना कोई बच्चों का खेल नहीं है। परीक्षा की इन घड़ियों में अहंकार यदि है, तो भाप बन कर उड़ जाता है और मनुष्य अपने विश्वास को ठुकराने का साहस नहीं कर पाता। यदि ऐसा करता है, तो इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि उसके पास सिर्फ़ अहंकार नहीं वरन् कोई अन्य शक्ति है। आज बिलकुल वैसी ही स्थिति है। वे आगे कहते हैं, “आलोचना और स्वतन्त्र विचार एक क्रान्तिकारी के दोनो अनिवार्य गुण हैं। क्योंकि हमारे पूर्वजों ने किसी परम आत्मा के प्रति विश्वास बना लिया था। अतः कोई भी व्यक्ति जो उस विश्वास को सत्यता या उस परम आत्मा के अस्तित्व को ही चुनौती दे, उसको विधर्मी, विश्वासघाती कहा जायेगा।“

शहीद भगत सिंह के विचारों को खारिज कर देने का संकल्प मेरे अन्दर नहीं है एवं वे मेरी स्वयं की तर्क शक्ति पर भी पूर्णतया सही उतरते हैं। मैं आज 2015 के प्रारंभ में सही से तो नहीं कह सकता हूँ कि मैं उनकी तरह पूर्ण रूप से नास्तिक हो गया हूँ एवं परम सत्ता को मानने से पूर्ण रूप से इनकार करता हूँ एवं केवल मात्र भगत सिंह जी के यथार्थवाद को ही मानता हूँ। हाँ एक बात निश्चित रूप से मानता हूँ कि दिन प्रतिदिन मेरे कदम केवल मात्र इस ही निष्कर्ष की और बढ़ रहे हैं एवं साथ में बढ़ रही है मेरी संकल्प शक्ति जो केवल मात्र मुझे मुझमें विश्वास करने की शिक्षा देती है और मुझे किसी भी प्रकार की शिक्षा से दूर रहने की आज्ञा देती है। सरदार भगत सिंह जी ने अपने चेतन को भी मानने से इनकार कर दिया था। वे कहते हैं कि जिस पल उन्हें फांसी लगेगी वह अंतिम क्षण होगा एवं पूर्ण विराम होगा। उस से बाहर किसी भी प्रकार की आत्मा का कोई भी अस्तित्व नहीं। मैं अभी इतनी जल्दी इस निष्कर्ष पर नहीं पंहुचा हूँ। पर विचारों का बदलना मानसिक तरक्की का एक सुनिश्चित एवं सत्य भाग है एवं मैं उसे स्वीकारता हूँ। आज से एक वर्ष पहले तक मैं कट्टर हिन्दू होते हुए भी उदारशील होने का दंभ भरता था एवं विश्वास करता था कि सर्व धर्म समभावः। पर अब मेरे विचार केवल मात्र एक ही वर्ष में इतने बदल गए हैं जितने पिछले चौंतीस वर्ष में नहीं बदले थे। मैं एक नव पुरुष की तरह मेरी इकलौती ध्वजा को लेकर खड़ा हूँ। यह ध्वजा लहरा रही है एवं लहराती रहेगी। मुझे कोई भी फर्क नहीं पड़ता कि कोई और इस ध्वजा के नीचे आकर सुकून महसूस करने का प्रयास करना चाहता है अथवा नहीं। मैं किसी की अपेक्षा भी नहीं कर रहा हूँ क्योंकि मैंने जो पथ चुना है उसका अंत केवल मात्र समाज के हाथों क्रूर मृत्यु है और मैं नहीं चाहूँगा कि मेरे इस युद्ध में मेरे साथ मैं किसी और की भी जान ले लूं। समाज ने किसी भी सुधारक को जीने न दिया है एवं न ही जीने देगा। कोई भी सुधारक विश्व में आकर गुत्थी सुलझाने की जगह उसे और उलझाकर चला जाता है। मुझे नहीं पता कि मेरी परिगति क्या होगी; पर एक बात अवश्य है कि कुछ प्रश्न अवश्य छोड़ कर जाऊंगा एवं यह मेरा परम ध्येय है कि यदि कुछ और नहीं तो कुछ लोगों के जहाँ में कुछ ऐसे कचोटने वाले प्रश्न छोड़ जाऊंगा जिनका उत्तर उनके पास भी न होगा यदि वे मेरी तरह केवल मात्र तर्क के हिसाब से सोचने वाले न हुए तो। न भी हो; मेरी बुद्धि पर विजय पाने का हक़ केवल मात्र मेरे पास रखा है मैंने और मैं यह अधिकार किसी और को देने से पूरी तरह से इनकार करता हूँ। मैं जानता हूँ कि मेरा पथ बेहद कठिन है पर इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि मैं इस पथ पर चलना बंद कर दूंगा। भेड़ की तरह चलना मेरे जीवन को नहीं भाता है। लोग सीधे चलेंगे और आगे जायेंगे तो मैं पलट कर उल्टा चल पीछे जाऊंगा। हो सकता है….हो क्यों सकता है यह तो होगा ही कि मैं अकेला छोड़ दिया जाऊंगा एवं मेरी गति भी किसी क्रांतिकारी की तरह हो पर विचार प्रवाह नहीं रुकेगा। अंतिम क्षण तक नहीं रुकेगा; भले ही मेरी कोई भी गति क्यों न हो। सरदार भगत सिंह की मानसिक दशा को समझने का प्रयत्न करना यहाँ आवश्यक है। वे अपने लेख में आगे कहते हैं, “मैं जानता हूँ कि ईश्वर पर विश्वास ने आज मेरा जीवन आसान और मेरा बोझ हलका कर दिया होता। उस पर मेरे अविश्वास ने सारे वातावरण को अत्यन्त शुष्क बना दिया है। थोड़ा-सा रहस्यवाद इसे कवित्वमय बना सकता है। किन्तु मेरे भाग्य को किसी उन्माद का सहारा नहीं चाहिए। मैं यथार्थवादी हूँ। मैं अन्तः प्रकृति पर विवेक की सहायता से विजय चाहता हूँ। इस ध्येय में मैं सदैव सफल नहीं हुआ हूँ। प्रयास करना मनुष्य का कर्तव्य है। सफलता तो संयोग तथा वातावरण पर निर्भर है। कोई भी मनुष्य, जिसमें तनिक भी विवेक शक्ति है, वह अपने वातावरण को तार्किक रूप से समझना चाहेगा। जहाँ सीधा प्रमाण नहीं है, वहाँ दर्शन शास्त्र का महत्व है। जब हमारे पूर्वजों ने फुरसत के समय विश्व के रहस्य को, इसके भूत, वर्तमान एवं भविष्य को, इसके क्यों और कहाँ से को समझने का प्रयास किया तो सीधे परिणामों के कठिन अभाव में हर व्यक्ति ने इन प्रश्नों को अपने ढ़ंग से हल किया। यही कारण है कि विभिन्न धार्मिक मतों में हमको इतना अन्तर मिलता है, जो कभी-कभी वैमनस्य तथा झगड़े का रूप ले लेता है। न केवल पूर्व और पश्चिम के दर्शनों में मतभेद है, बल्कि प्रत्येक गोलार्ध के अपने विभिन्न मतों में आपस में अन्तर है। पूर्व के धर्मों में, इस्लाम तथा हिन्दू धर्म में ज़रा भी अनुरूपता नहीं है। भारत में ही बौद्ध तथा जैन धर्म उस ब्राह्मणवाद से बहुत अलग है, जिसमें स्वयं आर्यसमाज व सनातन धर्म जैसे विरोधी मत पाये जाते हैं। पुराने समय का एक स्वतन्त्र विचारक चार्वाक है। उसने ईश्वर को पुराने समय में ही चुनौती दी थी। हर व्यक्ति अपने को सही मानता है। दुर्भाग्य की बात है कि बजाय पुराने विचारकों के अनुभवों तथा विचारों को भविष्य में अज्ञानता के विरुद्ध लड़ाई का आधार बनाने के हम आलसियों की तरह, जो हम सिद्ध हो चुके हैं, उनके कथन में अविचल एवं संशयहीन विश्वास की चीख पुकार करते रहते हैं और इस प्रकार मानवता के विकास को जड़ बनाने के दोषी हैं।“

आर्य समाज का मूल सिद्धांत है एवं यही सिद्धांत हमें वेदांत में भी प्रचुरता में मिलता है। यह कहता है, “इदं न ममः” अर्थात यह मेरा नहीं है। इस सिद्धांत की खासियत यह है कि आर्य समाजी स्वयं के किये सभी कार्यों को ईश्वर को अर्पण कर चलता है। बड़ा संतोष जनक है यह। एक साखी में कहा है, “ मेरा मुझमें कुछ नहीं, जो कुछ है वो तोर, तेरा तुझ को सौंपते, क्या लागे मोर” । हे ईश्वर आपने ही दिया एवं आपको ही सौंप दिया। अति संतोष जनक तरीके से व्यक्ति कहता है कि देने वाला वो है एवं लेने वाला भी वो है। अतः सुख एवं दुःख में एक प्रकार का भाव रखो। मोह माया में न फंसो। ये सांसारिक मोह माया आपको समाप्त कर देगी। इस प्रकार की महान शिक्षा केवल मात्र गरीबों को दी जाती थी। राजाओं को अभी भी हमला कर नाना प्रकार के राज्यों को जीतने का अधिकार हासिल था। गरीब जब कुछ मांगता तो उसे कह दिया जाता कि जो उसके पास है वह दाता का दिया है। उसके साथ क्या जाएगा तूं संतोष कर, संतोष कर कि तेरे भाग्य का तुझे मिल चुका है। और जो मिलना होगा वह भी आगे कहीं मिल जाएगा। अब कुछ मत मांग! लो, अनपढ़ गरीब प्रसन्न, गया था रोटी मांगने और उपदेश रोटी से भी बड़ा मिल गया। मैं समझ नहीं पाता हूँ कि इसकी जगह उसे भी शिक्षा एवं अधिकार दिया जाता कि ले तलवार एवं कर कर्म; उस राजा को कर पदच्युत और बन जा राजा। पुरुषार्थ करना ही होगा तुझे! तो वह संतुष्ट न होता एवं तलवार मांगता, इस से ब्राह्मण की गद्दी एवं राजा की गद्दी दोनों पर खतरा मंडराता। अतः कर दिया कार्य। क्या बोलेंगे यहाँ पर “जय राम जी की” अथवा “राम नाम सत्य है” । नाम दोनों में राम का है पर भावार्थ इतना भयंकर रूप से बदल जाता है। प्रथम को आप संबोधन के रूप में प्रयोग करते हैं। कह के देखिये घर आये महमान को राम नाम सत्य है। लग जाएगा अपनी औकात का पता। सर पे दो जूते और दस गालियाँ देकर मेहमान घर से जाएगा। फर्क कहाँ आया? सोच कर देखिये….बेचारा मरना नहीं चाहता है और आपने उसे अभिवादन की जगह सुख से मरने का मन्त्र दे दिया। घोर अत्याचार…..! राम वही और आपका अपने मेहमान के लिए प्रेम भी वही पर देखो क्या कमाल हुआ; आपको गालियाँ पड़ी। फर्क केवल मात्र आपकी सोच का है जिसके अन्दर बिठा दिया गया है कि “राम नाम सत्य है” यह अंतिम यात्रा में बोलना है। बस……और कभी बोला तो घोर अपमान होगा जीवित व्यक्ति का। क्यों….जीवित को यदि कह दिया जाए कि केवल राम नाम ही सत्य है तो उसका क्या अपमान। या आपको मरने से डर लगता है? “जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु:” जब इस अखंड सत्य का आपको पता है कि जीवित व्यक्ति को मरना ही है तो क्यों आपके मेहमान ने आपको गालियाँ दी? अब आप बुरे हो गये यदि आपने उसे सत्य बता दिया। इसकी जगह कह देते न कि तुम जियो हजारों साल तो आपको इतने आशीष मिलते कि पूछिए मत! कितना दोगलापन है इस समाज में? बस इस दोगलेपन के विरुद्ध ही तो लड़ाई है मेरी; लड़ाई नहीं इसे युद्ध मानिए….बड़ा युद्ध! राम के नाम से तो प्रेम है ही नहीं; पहले में भी राम का नाम ही आपने सत्य बताया बस उसकी जय बोली और दूसरी बार में भी आपने राम का नाम सत्य बोला। राम से किसे लेना देना, बस आपको अमरता प्राप्त हो जाए; पसरे रहिये ईश्वर के आगे कि मुझसे कोई पाप कर्म न हो कहीं 84 लाख योनियों को न भोगना पड़े। जान लीजिये कि यदि केवल मात्र आत्मा ही अनंत है तो उसका कोई आकार तो होगा नहीं; या वह भी है? बताइए तो……चलो मान लेते हैं कि आकार है; जब परमात्मा आपके जैसा हू ब हू दिखता है तो आत्मा भी तो आपकी आपके जैसी ही होती होगी? अब सोचिये कि इस बार के आपके किसी पाप के लिए आपको अगले जन्म में बिल्ली बना दिया जाए तो बताइए ज़रा कि बिल्ली के शरीर में आदमी की आत्मा कैसे एडजस्ट होगी? या ऊपर परमात्मा की किसी फेक्टरी में आत्मा का स्वरुप बदल कर उसे पहले आदमी से बिल्ली की आत्मा बनाया जाएगा? एक पश्चिमी तथाकथित पापी था उसका नाम था नीरो जिसने रोम को जला दिया था और उसके कारण कुछ लोगों की मृत्यु भी हुई थी। इतिहास में उसे इतनी गालियाँ दी जाती हैं कि पूछिए मत। ईश्वर की महिमा से जो हर रोज सैंकड़ों बेजुबान हादसों में मारे जाते हैं फिर भी आप उसे पूजते हैं? ईश्वर को बड़ा नीरो कहिये ना? लड़खड़ा गयी जुबान? क्यों? चंगेज खान ने हजारों को मारा; हजारों बलात्कार किये। उसे आप गालियाँ देते हैं और अपनी स्वयं की पुत्री के साथ व्यभिचार करने वाले ब्रह्म को पूजते है। सरासर दोगलापन है यह और इसमें मेरा किसी भी प्रकार का कोई भी विश्वास न है। अर्जुन ने अपने जीवन काल में जितने राष्ट्र जीते हर राष्ट्र में एक शादी की एवं एक पत्नी को छोड़ दिया ताकि उसका उत्तराधिकारी वहां पर राज कर पाए। उसे सर्वोच्च सम्मान दिया जाता है और आपका कानून दूसरी शादी करने वाले को जेल में डाल देता है। डालिए प्रभु मना किसने किया क्योंकि कानून का राज है पर अब दूसरी शादी को कृपया नैतिकता के साथ न जोडें। मुस्लिम गैर मुस्लिम लड़की से शादी करे तो वह सही है पर इसके विरुद्ध मुस्लिम लड़की ऐसा करे तो उसे इस्लाम हराम बताता है अर्थात दोजख (नरक) में जाने का पूरा इंतजाम। अल्लाह मियाँ नहीं चाहते ऐसा इसका कारण आपको बताता हूँ। अल्लाह मियाँ ने कहा है कि मुसलमान का फर्ज है कि सारी धरती मुस्लिम बन जाए अब मुसलमान लड़का शादी करे तो उसका वंश मुसलमान होगा पर उसकी जगह मुस्लिम लड़की गैर मुस्लिम से शादी करे तो वंश गैर मुस्लिम का बढेगा। अल्लाह मियाँ से ये बर्दाश्त न हुआ तो उन्होंने कुअरान ए शरीफ में इसको पूरी तरह से मना कर दिया। जो मुसलमानों के लिए हराम है वह हिन्दुओं के लिए पाप है। पाप और अनैतिकता में बड़ा थोडा सा फर्क है और वह महत्त्वपूर्ण है। पाप में कुछ एसी अनर्गल बातें भी शामिल हैं जिनका सही नैतिकता से कोई सरोकार नहीं है। सही नैतिकता का क्या पैमाना हो? सही नैतिकता का केवल मात्र एक ही पैमाना है कि आपका कदम किसी और की स्वतंत्रता में हनन न बनें। इसके अलावा सब नैतिक है। मानव् का प्रथम नैसर्गिक अधिकार स्वतंत्रता है और इसे बचा कर रखना सबसे बड़ा कार्य भी। स्वतंत्रता सोचने की, लिखने की, पढने की, बोलने की, मनमर्जी के लोगों से मिलने की एवं अपनी मन मर्जी का कार्य करने की जबतक वह दूसरों के स्वतंत्र जीवन में खलल न डाले। भीम को वनवास के दौरान हिडिम्बा जो एक असुर थी( असुर अर्थात अनार्य अर्थात वे लोग जो आर्य जाति के नहीं थे) पसंद आई और भीम ने उससे वहीँ अपनी पत्नी (द्रौपदी)के साथ होने के बावजूद भी गन्धर्व विवाह कर लिया। विवाह भी किया और वह गर्भवती भी हो गयी। अब देखिये आगे कहानी; जब उसका पुत्र(घटोत्कच) बड़ा हो गया उसके बाद ही उसने हिडिम्बा का मूंह देखा। सोचिये यदि महाभारत का धर्म युद्ध न होता तो क्या भीम कभी हिडिम्बा का मूंह उस रात के बाद कभी देखता। एक असुर (रावण) को अपनी बहन के अपमान का बदला लेने के लिए हिन्दू धर्म के अवतार श्री राम ने मार दिया और श्री राम जिन्होंने भगवान् होते हुए भी अपनी पत्नी (सीता) के ऊपर शक किया जिसके कारण धरती पुत्री दोबारा धरती में ही समा गयी; उसे हम सत्य मान कर पूजते हैं। पूजिए रावण को जिसने बहन के सम्मान की रक्षा के लिए एवं सीता के साथ किसी भी प्रकार का दुर्व्यवहार किये बिन जान दे दी और मरने से पहले श्री राम के आगे हाथ जोड़ क्षमा भी मांगी। या आप उस राम को पूजेंगे जिसने पेड़ के पीछे छिप कर अपने से बलवान बाली की हत्या कर दी ताकि उसके दुर्बल भाई सुग्रीव को वह उनका साथ देने का इनाम दे सके अथवा घर के भेदी विभीषण से रहस्य पूछ रावण की हत्या कर दी। श्री राम ने रामायण के दो प्रमुख पात्रों बाली एवं रावण की धोखे से हत्या की, रावण की बहन का अपमान किया, अपनी पत्नी पर शक किया एवं उसकी अग्नि परीक्षा ली, मेघनाथ जैसे वीर को धोखे से मरवाया उनके हर जगह मंदिर हैं और रावण का ऐसा अपमान कि विजयदशमी के दिन हर वर्ष उसके पुतले फूंके जाते हैं। सोचिये ज़रा……? रामचरितमानस की एक चौपाई है “रघुकुल रीति सदा चरी आई प्राण जाए पर वचन न जाई” अब भला कोई पूछे तो रावण ने कौनसा ऐसा वचन भंग किया था जो उसे इतनी बड़ी सजा हजारों सालों से दी जाती है? आर्य भी तो भारत में आक्रान्ता ही थे! वे कौनसे भारत के मूल निवासी थे? भारत के मूल निवासियों को तो आर्य अनार्य अर्थात असुर के रूप में जानते हैं। सर पर दो सींग लगाए हवा में तथाकथित रूप से उड़ने वाले असुरों के कोइ अवशेष आज तक प्राप्त न हुए जबकि करोड़ों वर्ष पुराने डाइनासोरों के अवशेष आज भी प्राप्त होते हैं। ये लुप्त कैसे हो गए? हिन्दुओं के कथित वामन अवतार ने किस प्रकार महा परकर्मी राजा बलि का राज्य हथियाया था और राजा बलि ने अपने वचन को रखते हुए वह एक धोखेबाज आर्य को दे भी दिया था; उस से हमारे ढोंग का पता नहीं चलता क्या? राजा बलि को भी तो राक्षस माना जाता है! तरह तरह की इस प्रकार की बातों से भरा हमारा इतिहास एवं इसके पुरौधाओं की बताई नैतिकता पर चलते आज के पुरुष कितने निकम्मे अध्यापकों की बातों के पीछे चल रहे हैं उसके इतने उदाहरण हैं कि समस्त जीवन भर भी ढूंढते रहें तो कम। बेहद चालाक एवं चतुर आर्यों ने सब कुछ स्वयं की इच्छा अनुरूप बना लिया। समाज के अगेड़े लोग किस प्रकार पिछड़ों पर बिन किसी समस्या के राज करें यह सब इस ही कारण हुआ।

अब आते हैं मान्यताओं पर! विश्व के सबसे करारे झूठों में से एक है मान्यताएं। मान्यता अर्थात कुछ एसी बातें जिन्हें हम हूबहू मानना आवश्यक है; बिना किसी हेर फेर के। मान्यता ठीक इस प्रकार की कि जिस प्रकार अरस्तु द्वारा पृथ्वी गोल है यह कहे जाने से पहले पश्चिम में माना जाता था कि पृथ्वी चपटी है; आप सीधे चलेंगे तो आप एक दिन नीचे गिर जायेंगे। इसका अंत में परिणाम यह हुआ कि उन्हें जेल में डाल दिया गया और तथाकथित समाज ने अपनी मान्यता विज्ञान के आगे समाप्त नहीं की। मैं यह मानता हूँ क्योंकि मुझे कहा गया है कि इसे माना जाए। मैं इस बात से सम्पूर्ण रूप से इनकार करता हूँ एवं घोषणा करता हूँ कि मेरे विवेक से बाहर की किसी भी बात को मैं किसी भी हाल में नहीं मानूंगा। भले ही इसके लिए मुझे कुछ भी क्यों न करना पड़े। मान्यताएं…..अच्छा मजाक है कि मैं कुछ भी सोचूँ पर मुझे वही सोचना है जो मुझे सोचने के लिए कहा गया है। इस से बड़ी जलालत स्वतंत्रता के लिए कोई नहीं। इस मान्यता नामक शब्द से मेरा किसी प्रकार का कोई रिश्ता नहीं। इसे मैं सम्पूर्ण रूप से तिलांजलि देता हूँ एवं आगे बढ़ने का संकल्प लेता हूँ। मैं समाज की बनायी गयी मान्यताओं को तिलांजलि दे आगे बढूंगा और उन्हें हर हाल में धराशाई करूंगा। भले ही इसके लिए मुझे मेरी जान ही क्यों न न्यौछावर करनी पड़े। मुझे अब किसी इश्वर की शक्ति अथवा आशीर्वाद की आवश्यकता नहीं। कितना अच्छा लगता है धार्मिक भजन गा एवं धार्मिक कार्य कर अपना जीवन यापन करना। पर अब स्वयं के साथ इस फरेब को मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता। इन्द्रिय निग्रह का जो बेकार का कार्य हिन्दू धर्म बताता है उसको तो तिलांजलि देनी ही होगी। मेरे ह्रदय में उठ रहे वेग एवं विचारों को बाहर आने का सम्पूर्ण अधिकार है। तब भी जब समाज उसे सुनना चाहता है एवं तब भी जब समाज उसे सुन कर राजी नहीं। तब भी यदि वे समाज के बने बनाए ढर्रे के अनुसार चलने में सक्षम हैं एवं तब भी जब वे अक्षम हैं। मेरे ह्रदय के विचार एवं उनके अनुसार कार्य करता मैं; इसमें कोई तीसरा प्रवेश नहीं करेगा। मैं उसे एसी आज्ञा न दूंगा। कोई और कह भी कैसे सकता है कि मैं अपने ह्रदय के अनुसार कार्य न करूँ अथवा संकल्प न लूं। किसी और को इस प्रकार का हक़ न है।

 

***

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *