बाबू मोशाय जिंदगी बड़ी होनी चाहिए लम्बी नहीं। स्वर्गीय राजेश खन्ना की महान फ़िल्म आनन्द का यह डायलॉग असल मे डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का कहा अमर वाक्य है।

कोई ऐसे ही अम्बेडकर नहीं बन जाता। अपने वर्ग के प्रथम स्नातक बन अर्थशास्त्र जैसे विषय मे पीएचडी करने के अलावा समाज शास्त्र के लगभग सभी विषयों ऑथोरिटी रखने वाले डॉक्टर अम्बेडकर का समस्त जीवन छुआछूत से लड़ने में गुजरा। पूना पैक्ट की लड़ाई से लेकर महाड़ सत्याग्रह और कालाराम मंदिर सत्याग्रह तक उनके जीवन मे इतने उतार चढ़ाव आये कि वे एक लीजेंड बन कर आज भी जीवित हैं। इस देश का प्रथम कानूनमंत्री बनने से लेकर मृत्यू के 4 दशक बाद मिले भारतरत्न तक, संविधान निर्माता डॉक्टर अम्बेडकर को मरणोपरांत भी भेदभाव का ही सामना करना पड़ा।

वे जहां समान नागरिक सहिंता के समर्थक थे तो दूसरी ओर अनुच्छेद 370 के प्रखर आलोचक। एक प्रखर अर्थशास्त्री से लेकर विधि स्नातक तक उनकी उपलब्धियां इतनी हैं कि एक मानव के जीवन काल मे इतना बड़ा होना सम्भव नहीं इसलिए उन्हें महामानव कहा जाए तो भी कम ही होगा। इस देश के अंदर पैदा हो इस माटी का सम्मान बढाने वाले डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को बारम्बार नमन!

मैं व्यक्तिगत रूप से समझ नहीं पा रहा हूं कि क्यों धर्म को इस विशाल, व्यापक क्षेत्राधिकार के रूप में दी जानी चाहिए ताकि पूरे जीवन को कवर किया जा सके और उस क्षेत्र पर अतिक्रमण से विधायिका को रोक सके। सब के बाद, हम क्या कर रहे हैं के लिए इस स्वतंत्रता? हमारे सामाजिक व्यवस्था में सुधार करने के लिए हमें यह स्वतंत्रता हो रही है, जो असमानता, भेदभाव और अन्य चीजों से भरा है, जो हमारे मौलिक अधिकारों के साथ संघर्ष करते हैं।