समूची दुनिया इस समय चीन से चले कोरोना वायरस से परेशान है। इसकी परेशानी बढ़ाने में इस दुनिया को बचाने वाले कथित धर्मों का काफी योगदान रहा है। शुरुआत से ही जब से इस वायरस ने चीन को छोड़ यूरोप में पैर पसारा, वहाँ पर इसे बढ़ाने में चर्च का पूरा योगदान रहा. इस वायरस को कमजोर करने एवं इसकी कड़ियों को तोड़ने के लिए अत्यंत आवश्यक है कि सामजिक दूरी बनाई राखी जाए ताकि यह व्यक्ति से व्यक्ति में न फ़ैल सके और एक ही जगह जाकर समाप्त हो जाए. परन्तु धर्म ऐसा करने से स्पष्ट तौर पर रोकता है। न केवल धार्मिक आयोजनों में अधिक भीड़ इकट्ठा होती है, बल्कि इन आयोजनों में लापरवाही बरती जाती है क्योंकि वहां मौजूद जनसमूह को अदृश्य ताकत का एहसास होता है जो कथित तौर पर उसकी रक्षा कर उसे आशीर्वाद देने के लिए व्याकुल होती है. ऐसे में नियम एवं कानून कोई मायने नहीं रह जाते हैं। यही कारण है यूरोप में चर्चों में इकट्ठा हुई भीड़ के कारण यह वायरस बहुत तेजी से यूरोप में फैला और आज दुनिया में हो रही लगभग आधी मौत केवल यूरोप में हो रही हैं।

मार्च प्रथम सप्ताह से अब तक जब से भारत में इस वायरस की गतिविधियां बढ़ी तब से भारत में ऐसे बहुतेरे आयोजन देखे गए जब धार्मिक क्रिया कलाप, सतसंग, नमाज और अन्य कार्यों के लिए भीड़ इकठ्ठा हुई। यह सब अब तक केवल आलोचना तक सीमित था लेकिन दिल्ली निजामुद्दीन काण्ड ने एक दम समस्त भारत के जनमानस का ध्यान इसकी और कर दिया। हालाँकि इसके बाद भी धार्मिक आयोजन हुए हैं और अभी भी चल रहे हैं लेकिन राजनैतिक कारणों से यह मामला अब इतना ऊपर जा चुका है कि अब कोरोना के अपराधी धर्म विशेष के लोगों को माना जा रहा है, भले ही सच्चाई इससे परे हो क्योंकि ठीक इस समय ही दिल्ली मजनू का टीला गुरूद्वारे में तीन सौ से अधिक सिख संगत जमा थी तो दूसरी और दक्षिण भारत में ऐसे कुछ आयोजनों को अभी भी देखा जा रहा है. लेकिन इससे इतर पद्मश्री ज्ञानी दर्शन सिंह का मामला देखा जा रहा है जो 19 मार्च को चंडीगढ़ आये थे 27 सेक्टर में किसी धार्मिक कार्यक्रम के लिए। उनकी कोरोना वायरस से हुई मौत के बाद के क्रिया कलापों ने एक दम धर्म को बिमारी से छोटा बना दिया। समाचार पत्रों के अनुसार उन्हें कांधा देने के लिए चार कंधे और अंतिम संस्कार के लिए जगह तक नहीं दी गयी। एक आम व्यक्ति के लिए ऐसा बर्ताव फिर भी गले उतर सकता है लेकिन एक पाठी जिसने अपना जीवन श्री गुरु ग्रन्थ साहब की सेवा में लगा दिया और जो श्री हरमिंदर साहब में प्रमुख पाठी रह चुके थे, उनके साथ ऐसा बर्ताव बताता है कि कहीं न कहीं धर्म पर बीमारी भारी है और व्यक्ति बुरे समय में अच्छे और बुरे का ख्याल रखे बिना ही कार्य करता है और जंगल राज लागू हो जाता है।

स्पष्ट दिख रहा है कि जब अपने पर आती है तो रिश्ते नाते, धर्म, कर्म काण्ड सब कुछ पीछे हो जाते हैं और स्वयं की रक्षा ही इकलौता धर्म रह जाता है। ऐसे में देखने वाली बात यह है कि फिर व्यक्ति धर्म का आश्रय लेता ही क्यों है ? क्यों नहीं मुक्त विश्व में केवल मानवता पर आश्रय लिया जाता ? धर्म यदि इतना ही मजबूत होता तो आज अंतिम संस्कार तक तो कम से कम साथ निभाता। आज इस धरती पर यदि कोई ईश्वर है तो वह विज्ञान है और वे डॉक्टर और उनका स्टाफ है जो हमारी रक्षा के लिए लगातार लड़ रहा है और अंतिम समय तक साथ निभा रहा है। ऐसे में मुझे उपकार फिल्म का गाना याद आ रहा है। उपकार फिल्म में प्राण द्वारा गाया जा रहा गाना “कस्मे वादे, प्यार वफ़ा सब बातें हैं बातों का क्या? कोई किसी का नहीं जहां में ये झूठे नाते हैं नातों का क्या ?”

इन झूठे धार्मिक प्रपंचों के कारण हम सब खतरे में हैं, भीड़ को इकट्ठा करना बंद करें, अपने घर में रहें और स्वयं को सुरक्षित रखें। यदि आप स्वयं को सुरक्षित रखेंगे तो ही समाज सुरक्षित रहेगा। विज्ञानं को तवज्जो दें विश्वास को नहीं। दान मंदिर/मस्जिद/मजारों में नहीं हस्पतालों में दें ताकि वहां मरीजों को ठीक किया जा सके। प्रकृति का ख्याल रखें, यह स्पष्ट तौर पर समझें कि हम प्रकृति की वजह से हैं न कि प्रकृति हमारी वजह से।