मेरे भारत में कुछ ख़ास है,
प्याज से सरकार बदलती है, दंगों से सरकार बनती है,
नौकरी का फैंसला पैदा होने पर होता है,
लिंग का फैंसला पैदा होने से पहले होता है,
गरीब की तकदीर में तो बहुत कुछ ख़ास है,
पहले हाथ जुड्वाता है बाद में हाथ जोड़ता है.
मेरे भारत में कुछ ख़ास है.
जनता यहाँ गाली देती है पर कुछ बदलती नहीं,
एक धर्म को गाली देना यहाँ धर्मनिरपेक्षता है,
अंग्रेजी बोलने को लोग बड़ा मानते हैं,
पर १२ कोस पर यहाँ बोली बदलती है,
हर प्रदेश की अपनी वेश भूषा है,
किस्मत फिर भी पेंट-कोट से बदला करती है.
मेरे भारत में कुछ ख़ास है,
यहाँ तकदीरें पुरुषार्थ से नहीं जुगाड़ों से बदला करती है.
—रविन्द्र सिंह ढुल, जींद, दिनांक: १५-०६-२०११