महान दार्शनिक सुकरात को एक बार उनके परिचित ने कहा, “क्या आप जानते हैं, आपका मित्र आपके बारे में क्या कह रहा है?”

सुकरात कुछ क्षण सोच कर बोले,”एक मिनट रुको! तुम मेरे मित्र के बारे में जो बताने जा रहे हो, क्या वह पूर्णतया सत्य है?”
‘नहीं वास्तव में ऐसा मैंने सुना है…’ वह परिचित बोले.
“अच्छा तो तुम नहीं जानते कि वह सत्य है भी नहीं…लेकिन जो तुम बताने जा रहे हो क्या वह प्रिय है? सुकरात ने पूछा.
‘नहीं, इसके विपरीत है!’ परिचित बोले.
‘ठहरो, तुम मेरे बारे में कुछ बुरा बताने जा रहे हो, वह न सत्य है, न प्रिय है, कोई नहीं कम से कम वह मेरे लिए लाभकारी तो होगा’ सुकरात ने जानना चाहा.
‘नहीं, बिल्कुल नहीं….”परिचित बोले.
इसके बाद सुकरात ने कहा,’जो न सत्य है, न प्रिय है और न ही शुभ एवं लाभकारी है, तुम उसे क्यों बताना चाहते हो?’
वह परिचित व्यक्ति पूरी तरह निरुत्तर रह गया. “सत्यम, शिवम् सुन्दरम ” का यह सुन्दर उदाहरण आज मुझे एक समाचार पत्र से प्राप्त हुआ है.