भ्रष्ट देश के भ्रष्ट निवासी, हम सब एक हैं

भ्रष्ट देश के भ्रष्ट निवासी, हम सब एक हैं.
एक देश है, हजारों भाषा,
हजारों जाति और अनेक धर्म.
उबलता है देश सारा, के भारत नहीं है हमारा.
उबलते हैं सभी धर्म, के भारत नहीं है हमारा.

एक धर्म है हमारा, जो रखे देश को एक,
इस देश के भ्रष्ट लोग न पूछे कोई जाति,
बस हाथ फैलाकर करते स्वागत, हो कोई भी धर्म,
हमको पैसा देदो भाई, भले हो आपका कोई भी मर्म.

भारत एक है जब सामने आवे भ्रष्टाचार,
भ्रष्ट देश के भ्रष्ट निवासी एक साथ करें गुणगान,
हमारे सपने को भी कभी मिलेगा आकार,
बने भारत का एक नया ही राष्ट्रगान,
“भ्रष्ट देश के भ्रष्ट निवासी हम सब एक हैं,
कई धर्म हैं कई भाषा, होती हैं कई जाति भी,
एकता और अखंडता को एकजुट रखने में हम सब एक हैं,
जब तक जेब में आते नोट, भारत एक है.
भ्रष्ट देश के भ्रष्ट निवासी हम सब एक हैं.”—-रविन्द्र

तलाश

इक आह सी दिल में उठती है, इक दर्द जिगर में उठता है,
हम रात में उठके रोते हैं, जब सारा ज़माना सोता है.

 

ये मेरा जीवन है, जो जाने मुझ से क्या चाहता है.

 दिन होता है तो कुछ और तलाश होती है, रात होती है तो कुछ और तलाश होती है.
 जब चलते हैं तो इक मंजिल की और मंजिल पे किसी राह की तलाश होती है.
करना क्या चाहते हैं ये तो पता नहीं, पर जाने किस पते की तलाश होती है.
 चलते चलते जो मिले रह गुज़र, तो रास्ता ठीक से निकल गया,
वरना तो रास्ते में हर रोज इक रह गुजर की तलाश होती है.
तलाश करते करते ये जिंदगी इक तलाश बन गयी है, पर फिर भी इस तलाश में इक जिंदगी की तलाश होती है.
इक अजीब सी उलझन में फंसी है जिंदगानी, पर इस उलझन में भी एक रास्ते की तलाश होती है.
इक रब के दीदार से ये तलाश कहाँ पूरी हुई, जो इक रब के बाद दूसरे रब की तलाश होती है.
रविन्द्र सिंह ढुल/ ०७.०१.२०१२/जींद