आह आह आह jonatan pie 6tm54xn1k o unsplash 750x350

आह

आह देखो यह राह मैंने ही बनाई थी

इस राह पर माटी मैंने ही बिछाई थी
इस माटी से तुमने एक मूरत बनाई थी

इस मूरत से निकल
तुम आज उस नए राह पर चले गए

जिस राह पर न मेरी माटी है
न मेरा अक्स

पर अपना ध्यान रखना

देखना बिन माटी के अक्सर
पैरों में कंकड़ चल जाते हैं।

गर कंकड़ चले और राह असम्भव लगे तो आ जाना
मेरी राह पर माटी बिछी है

मैं नहीं मिलूंगा पर वह माटी तुम्हें ले जायेगी।

याद है

याद है,
तुम और मैं
पहाड़ी वाले शहर की
लम्बी, घुमावदार,
सड़्क पर
बिना कुछ बोले
हाथ में हाथ डाले
बेमतलब, बेपरवाह
मीलों चला करते थे,
खम्भों को गिना करते थे,
और मैं जब
चलते चलते
थक जाता था
तुम कहती थीं ,
बस
उस अगले खम्भे
तक और ।

आज
मैं अकेला ही
उस सड़्क पर निकल आया हूँ ,
खम्भे मुझे अजीब
निगाह से
देख रहे हैं
मुझ से तुम्हारा पता
पूछ रहे हैं
मैं थक के चूर चूर हो गया हूँ
लेकिन वापस नहीं लौटना है
हिम्मत कर के ,
अगले खम्भे तक पहुँचना है
सोचता हूँ
तुम्हें तेज चलने की आदत थी,
शायद
अगले खम्भे तक पुहुँच कर
तुम मेरा
इन्तजार कर रही हो !

मैं तुम्हें कोई दोष नहीं देता

मैं तुम्हें कोई दोष नहीं देता

सब दोष अपने संग वरता हूँ।
जीवन की इस अनकही पहेली पर
स्वयम् के प्राण मैं हरता हूँ।

मेरे जीवन का उत्तरदायी कौन
यह न कोई पूछेगा

इस जीवन की अथाह व्यथा को
कौन अपने संग वरेगा?

चल निकला मैं अब
उस सफ़र पर,
जिसका न कोई अंत है,
जिसकी न कोई परिधि है,

पर मैं तुम्हें  कोई दोष नहीं देता,
जाने से पहले सब दोष स्वयं पर वरता हूँ।

पास खडा था भ्रष्टाचार

सुबह उठ कर आँख खुली तो पास खडा था भ्रष्टाचार,

अट्टहास लगाता हुआ, प्रश्न चिह्न लगाता हुआ.
जब पूछा मैंने, तुझमें इतने प्राण कहाँ से आये,
के तुम बिन पूछे, बिन बताए मेरे घर भी दौड़ आये.
हंसता हुआ, वो बोला, तुम शायद अवगत नहीं,
कल रात ही संसद में मुझे जीवनदान मिला है.
देश शायद सो रहा था, दिवा स्वप्न के बीज अपने घर में बो रहा था,
इतने में एक कानून आया, जिसने भ्रष्टाचार को मिटाने का संकल्प दोहराया.
बस उस कानून से मुझे जीवन दान मिला है,
अब तक तो मैं सिर्फ घर के बाहर सड़क पर, दफ्तरों में पाया जाता था,
अब मैं घर में, आपके साथ खड़ा,
अट्टहास करूँगा, आपकी बेचैनी पर,
मेरा जीवन हरण करने चला था जो चौकीदार,
उसे ही रिश्वत से मैंने अपने साथ मिला लिया…..

हाँ मैं चलती हूँ

हाँ मैं चलती हूँ

तुमने मुझे चलने से रोका
तुमने मुझे जीने से रोका
तुमने मुझे गाने से रोका
तुमने मुझे खाने से रोका

मेरे कदम कदम पर कांटे बिछाये
पर मेरे कदम कभी न रुक पाये

फिर भी मैं चलती हूँ
चलते चलते खिलती हूँ
चलते चलते जलती हूँ

मगर फिर भी मैं चलती हूँ

सोचते तो बहुत होंगे तुम
क्यों न मैं रुक पायी
क्यों न तुम मुझे रोक पाये?

मैं चलती हूँ क्योंकि
मेरे चलने से ही तुम चलते हो
गर मैं रुकी
तो तुम रुक जाओगे

तो मैं चलती हूँ
चलते चलते जलती हूँ
फिर भी मैं चलती हूँ।

गर तुम होते पास

गर तुम होते पास

तो श्वासों को पहचान मिलती
तो अधरों की वह प्यास बुझती
तो जीवन को नव पहचान मिलती
आते जब तुम मेरे पास
तो इक नव गीत मैं गुनगुनाता
मेरी नयी पहचान बनाता

लेट जाता उस गोद में
जिस गोद में बसता जीवन है
सहलाता उन केशों को
कर चक्षु को बंद जब स्वप्न लोक आता
तो सोचता ऐ प्रिये
के तुम होती तो जीवन ऐसा कटता
के जैसे चलता नदिया में जल है
के चलती जैसे धरती पर पवन है।

आओ नव इतिहास बनाएं
लगा पंख अपने ऊपर
किसी दुनिया में उड़ जाएँ।

अविराम चलता यह जीवन

अविराम चलता यह जीवन
इक नए मोड़ पर खड़ा है।पूछता है क्या किया जो
मुझे कोसते हो

कब मैंने तुम्हें हराया;
कब तुम्हारा दिल दुखाया

कब किस्मत के लेखे को;
मैं बदल पाया!

मैंने कहा ऐ जीवन;
कोसता यूं नहीं मैं के मैंने ठोकर खाई है;
कोसता यूं नहीं के मैं आज हारा हुआ हूँ;

कोसता यूं हूँ के भाग्य के लेखे को तूं बदल न पाया;

कोसता यूं हूँ के जब जीवन मेरा है;
यह भाग्य मेरा है तो फिर किसी का जीवन इसे प्रभावित क्यों करता है;
क्यों इन श्वासों के साथ दूसरे श्वासों का जुड़ाव हो जाता है;
क्यों तेरी तकदीर किसी और की तकदीर के साथ जुड़ जाती है;
क्यों तूँ निराश होता है;
जीवन ने कहा:
मैं तो तेरा ही भाग हूँ;
कोस मत बदल दे;
भाग्यरेखा क्या रोकेगी तुझे;
उठ खड़ा हो और चल;
इसे महान तूँ बनाएगा; इस व्याकुलता को तूँ मिटाएगा।
तब आया समझ ये जीवन तो आईना ही है मेरा;
इसमें केवल मैं ही तो हूँ; साथ ही हैं वे सब जिन्हें मैं चाहता हूँ।

भ्रष्ट देश के भ्रष्ट निवासी, हम सब एक हैं

भ्रष्ट देश के भ्रष्ट निवासी, हम सब एक हैं.
एक देश है, हजारों भाषा,
हजारों जाति और अनेक धर्म.
उबलता है देश सारा, के भारत नहीं है हमारा.
उबलते हैं सभी धर्म, के भारत नहीं है हमारा.

एक धर्म है हमारा, जो रखे देश को एक,
इस देश के भ्रष्ट लोग न पूछे कोई जाति,
बस हाथ फैलाकर करते स्वागत, हो कोई भी धर्म,
हमको पैसा देदो भाई, भले हो आपका कोई भी मर्म.

भारत एक है जब सामने आवे भ्रष्टाचार,
भ्रष्ट देश के भ्रष्ट निवासी एक साथ करें गुणगान,
हमारे सपने को भी कभी मिलेगा आकार,
बने भारत का एक नया ही राष्ट्रगान,
“भ्रष्ट देश के भ्रष्ट निवासी हम सब एक हैं,
कई धर्म हैं कई भाषा, होती हैं कई जाति भी,
एकता और अखंडता को एकजुट रखने में हम सब एक हैं,
जब तक जेब में आते नोट, भारत एक है.
भ्रष्ट देश के भ्रष्ट निवासी हम सब एक हैं.”—-रविन्द्र

सरकार और आम आदमी…

मैं खड़ा हूँ,
मेरा अंतर्द्वंद मुझे जीने न दे रहा है,
जब सारा भारत खड़ा है तो मैं क्यों सो रहा हूँ?
ऐसा सोच आम आदमी एक दिन सारे भारत के साथ धरने पर बैठ गया,
सुबह पत्रकारों ने आम आदमी को नेता घोषित किया,

दोपहर आम आदमी को भारत का भविष्य घोषित किया,

शाम आई और आम आदमी ने बैठकर सोचा,
मेरी सरकार शायद आम आदमी की सरकार है,
मेरे दुःख से शायद किसी को सरोकार है,
जब-जब मैंने उठना चाहा, बाँध हाथ बिठा दिया,
जब-जब मैंने उड़ना चाह, बाँध पंख बिठा दिया,
शायद वह पुरानी यादें, अब बस यादें हैं.
इसी उधेड़ बुन में वह आम आदमी, सो गया.

उठ सुबह जब हुआ नया सवेरा,
प्रभात की किरणों ने आम आदमी का चेहरा जगमगाया,
आम आदमी ने खुद को सड़क पर पाया,
न पेट में अनाज, न तन पर कोई कपडा,
कहाँ गया जो मेरे पास था मेरा रैन बसेरा,

टूटा दिवा स्वप्न तो उसे याद आया,
कल था चुनाव, आम आदमी राजा था,
आज है आम आदमी की नयी सरकार,
और आम आदमी फिर से हाथ बाँध कर नए सवेरे को याद कर रहा है.

“सोच सोच कर मैंने सरकार बनायीं, पर फिर भी इतनी अक्ल मुझे न आई,
सरकार आम आदमी के लिए नहीं, सरकार आम आदमी से बनती है.
कार्य तब भी वह अपने लिए करती थी, कार्य अब भी वह अपने लिए ही करती है.”

-रविन्द्र सिंह ढुल/२५.१२.२०११

मेरी जाति “आम आदमी” है

मेरी जाति “आम आदमी” है.
सड़क पर फटे हाल एक पुरुष को खड़ा देख,नेता जी रुके,
उनसे पूछा,
तुम कौन हो भाई,
बड़े गरीब और पिछड़े हुए लगते हो,
कितने पढ़े लिखे हो, क्या करते हो,
परिवार में कौन कौन है, क्या क्या करता है,
तुम गरीबी रेखा से नीचे हो?
अगर हो तो तुम्हें चावल मिलेगा, तेल मिलेगा घर मिलेगा,
तुम पिछड़ी जाति के हो, अगर हो तो तुम्हें छात्रवृति मिलेगी,
नौकरी मिलेगी, प्रोत्साहन मिलेगा,
तुम अनुसूचित जाति के हो?
अगर हो तो तुम्हें सरकार नौकरी देगी, बच्चों को पढ़ाएगी,
सब कुछ तुम्हें मुफ्त मिलेगा, तुम बोलो भाई तुम कौन हो?
तुम महिला होते तो तुम्हें अलग से खड़े होने का मौका मिलता,
आरक्षण मिलता, सब कुछ मिलता, पर तुम कुछ बोलते नहीं, कुछ बोलो!
इतनी देर से परेशान वो पुरुष बोला,
नेता जी,
बड़ा दुःख है मुझे कि मैं इनमें से कुछ नहीं,
पर आप समझ पायेंगे ही नहीं मैं क्या हूँ,
भारत की सभी सरकारें मेरे नाम से मत लेती हैं,
मेरा नाम हर घोषणा पत्र में होता है, मेरे नाम से सब आगे बढ़ते हैं,
आपने भी कभी न कभी मेरी जाति का नाम जरूर सुना होगा,
पर दुःख है कि यहाँ मुझे पूछने वाला कोई नहीं,
मैं भूखा हूँ, अनाज नहीं मिलता,
मेरे बच्चे पढना चाहते हैं पर उन्हें दाखिला नहीं मिलता,
मैं पढ़ा लिखा हूँ, मुझे काम नहीं मिलता,
रहने को छत नहीं, पर मुझे घर नहीं मिलता.
नेता जी हैरान परेशान देखते रहे,
वो पुरुष बोलता रहा,
नेता जी मेरी जाति”आम आदमी”  है,
इस देश में सबको सब कुछ मिलता है,
पर मुझे कोई नहीं पूछता,
हर चुनाव में मैं मत का प्रयोग करता हूँ,
मेरे मत से सरकार बदलती है,
पर मैं पचास साल पहले भी भूखा था,
आज भी हूँ.
मैं आम आदमी हूँ,
क्या आप मेरी सहायता करेंगे?
नेता जी अनमना सा मूंह लेकर अपनी गाडी में चले गए,
और आम आदमी अगले नेता जी कि गाडी का इंतज़ार करने लगा.
—–रविन्द्र सिंह ढुल, १४-०६-२०११, जींद