हरियाणा पंचायती राज अधिनियम में संशोधन और आधे हरियाणा के अधिकारों की हत्या  हरियाणा पंचायती राज अधिनियम में संशोधन और आधे हरियाणा के अधिकारों की हत्या Haryana panchayat election 750x350

हरियाणा पंचायती राज अधिनियम में संशोधन और आधे हरियाणा के अधिकारों की हत्या

हरियाणा सरकार ने बहुत गाजे बाजे के साथ हरियाणा पंचायती राज अधिनियम में सन 2020 में संशोधन किया था। इस संशोधन के बाद भाजपा और हमारी देसी जजपा ने खूब राजनीति की कि सरकार ने महिलाओं और पिछड़ा वर्ग के अधिकारों की रक्षा करने के लिए यह संशोधन पारित किया है और विपक्ष खासकर कांग्रेस इसका नाजायज विरोध कर रही है। जबकि इसका कोई विरोध नहीं किया गया। अधिनियम बिलकुल बिना विरोध के पारित हुआ। राजनीती का विषय इस बात को बनाया गया कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता श्री करण सिंह दलाल के सुपुत्र दीपकरण दलाल ने इस मामले में कोर्ट में याचिका दायर की, जबकि यह याचिका उनके क्लाइंट्स ने दायर की थी और उन्होंने अधिवक्ता का अपना फर्ज निभाने के लिए केवल उनको रिप्रेजेंट किया। खैर इस विषय पर मैं टेलीविजन पर बहुत सी डिबेट्स कर चुका हूँ। सरकार ने खुद कोर्ट में स्टेटमेंट दी कि हम चुनाव नहीं करवाएंगे। संविधान और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के खिलाफ संशोधन पारित किया गया और आरोप कांग्रेस पर जड़ दिया गया। खैर, इस बार जो मुद्दा मैं सार्वजानिक कर रहा हूँ वह यह है कि इस गैरकानूनी संशोधन ने आधे हरियाणा से हमेशा के लिए चेयरमैनी के चुनाव में भाग लेने का अधिकार छीन लिया है।

आखिर क्या है समस्या ?

दरअसल सरकार ने अधिनियम पारित करते हुए महिलाओं के लिए 50% आरक्षण का प्रावधान किया और बाकि 50% का प्रावधान महिलाओं के अलावा अन्य के लिए किया गया। इस महिलाओं के अलावा अन्य शब्द की कहीं भी व्याख्या नहीं है इसलिए व्याकरण रूप में पुरुष और किन्नरों को इसमें शामिल करते हैं। ऐसे में प्रॅक्टिकली आधी सीट महिलाओं और आधी सीट पुरुषों के लिए रिजर्व हैं। यही रिजर्वेशन पंचायत समिति वार्डों में, यही रिजर्वेशन जिला परिषद् वार्डों में और यही रिजर्वेशन समिति एवं परिषद् के चेयरमैन के लिए की गयी है। ऐसे में आधे हरियाणा की चेयरमैनी महिलाओं और पुरुषों में बंट गयी है।

अब यहाँ तक सब कुछ साफ़ सुथरा दिखता है, अब बात करते हैं समस्या की। बात ऐसी है कि सीटें रोटेशन में बदलेंगी। यानी जो सीट 2022 में महिलाओं के लिए रिजर्व है वो सीट अगली बार पुरुषों के लिए रिजर्व हो जाएंगी। वही फार्मूला वार्ड से चेयरमैनी में लागू होगा। चेयरमैन बनेंगे वार्ड के मेंबर्स के चुनाव से। अब इस पूरी स्थिति को समझने के लिए एक उदाहरण लेते हैं।

मान लीजिये एक जिले में दो सीट जिला परिषद् की हैं जिनका वार्ड नंबर 1 एवं 2 है। इन दोनों सीट में से एक चेयरमैन बनेगा। 2022 में वार्ड नंबर 1 पुरुषों के लिए रिजर्व है और वार्ड नंबर 2 महिलाओं के लिए रिजर्व है एवं इस बार चेयरमैनी महिलाओं के लिए रिजर्व है। इसका मतलब ये हुआ कि इस बार चेयरमैन वार्ड नंबर 2 से बनेगा। देखने में यह स्थिति साफ़ और स्पष्ट टाइप दिखती है। पर चलिए अब हम चलते हैं 2027 में। इस बार रोटेशन में वार्ड नंबर 1 महिलाओं के लिए रिजर्व रहेगा और वार्ड नंबर 2 पुरुषों के लिए और चेयरमैनी पुरुषों के लिए रिजर्व रहेगी। ऐसे में इस बार फिर से चेयरमैनी आएगी वार्ड नंबर 2 में और वार्ड नंबर 1 का अधिकार हमेशा के लिए चला गया है। किसी भी वर्ष में और किसी भी चुनाव में वार्ड नंबर 1 से कभी चेयरमैन बन ही नहीं पायेगा।

ठीक इस ही प्रकार समस्त हरियाणा में यह रिजर्वेशन प्रभाव दिखाएगी, ऐसे में आधा हरियाणा कभी चेयरमैन के चुनाव में कभी भाग ही नहीं ले पायेगा। आसान भाषा में समझिये कि इस बार मुख्यमंत्री करनाल विधानसभा से आते हैं। अगर कोई प्रक्रिया में ऐसा बदलाव किया जाये जो ये कहे कि अगर हरियाणा में मुखयमंत्री बनना है तो करनाल से ही चुनाव लड़ना होगा तो आप उसे क्या कहेंगे ? सुधार या मूर्खता पूर्ण गैरकानूनी बदलाव !

कुछ ऐसा ही हरियाणा की अनपढ़ सरकार ने किया है जिस पर मैंने दो याचिकाएं अपने क्लाइंट्स के लिए डाली हैं, अब देखते हैं कि ऊँट किस करवट बैठेगा।?

कोरोना के खतरे, कितने तैयार हैं हम? कोरोना के खतरे, कितने तैयार हैं हम? कोरोना के खतरे, कितने तैयार हैं हम? corona 0 750x350

कोरोना के खतरे, कितने तैयार हैं हम?

प्रधानमंत्री की 26 अप्रेल की मन की बात के बाद मीडिया के माध्यम से छिटपुट खबरें आ रही हैं कि लॉकडाउन के बढ़ने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। 6 राज्य तो सीधे सीधे इस पक्ष में हैं कि इसे बढ़ाया जाए।  इसके अलावा हरियाणा समेत बहुत से राज्य सीधे कह रहे हैं कि वे इस मामले में केंद्र के दिशानिर्देशों का पालन करेंगे। मंत्रालय की रिपोर्ट्स के मुताबिक लगभग 80 जिले इस समय ऐसे हैं जहाँ कोरोना का नामोनिशान नहीं है। इसमें हरियाणा के 3 जिले भी शामिल हैं। लेकिन कोरोना का खतरा घटने की फ़िलहाल कोई संभावना नहीं दिख रही है। बहुत से हॉटस्पॉट ऐसे बन रहे हैं जहाँ यह कोरोना का कहर बहुतों की जान लेने को स्पष्ट तौर पर उतारू दिख रहा है। 

गुजरात, महाराष्ट्र और  मध्य प्रदेश तीन ऐसे राज्य हैं जहाँ स्पष्ट तौर पर तबाही का अंदेशा दिख रहा है। महाराष्ट्र में मुंबई और पुणे, मध्य प्रदेश में इंदौर और गुजरात में अहमदाबाद अत्यंत खतरनाक परिस्थिति से गुजर रहे हैं। इसके अलावा कोरोना वायरस के लगातार बदलते स्वरूप और म्यूटेशन खतरे को बढ़ा रहे हैं। इस समय की रिपोर्ट को मानें तो कोरोना भारत में पांच अलग अलग म्यूटेशन में पाया जा चुका है। इसके अलावा दो अलग अलग स्ट्रेन का वायरस भारत में इस समय अटैक कर रहा है। आज की मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत में 17 अलग अलग देशों के म्यूटेशन्स मौजूद हैं। इसके अलावा एल एवं एस स्ट्रेन के वायरस अलग अलग राज्यों में देखने को मिल रहे हैं।  अब तक के मेडिकल रिसर्च के मुताबिक एल स्ट्रेन वायरस अत्यंत घातक है। अमेरिका और चीन के वुहान में इस स्ट्रेन ने ही कहर बरपाया है। यह वायरस इस समय गुजरात के अहमदाबाद एवं मध्य प्रदेश के इंदौर में दिख रहा है। यही कारण है कि वहां लगातार मरीजों की संख्या एवं मरने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। आगरा के महापौर ने अपनी लिखी चिट्ठी में कहा है कि यदि हम नहीं सम्भल पाए तो आगरा वुहान में बदलने में देर नहीं लगाएगा। ज्ञातव्य है कि आगरा में नीदरलैंड वाली म्यूटेशन भी देखने को मिली है। अब तक के शोध के मुताबिक चीन अब तक 4300 अलग अलग म्यूटेशंस दर्ज कर चुका है। इससे स्पष्ट पता लगता है कि वायरस अत्यंत घातक है एवं लगातार अपने स्वरूप को ढाल रहा है। इसके कारण न केवल शोध में दिक्क्त आ रही है इसके अलावा इसकी मेडिकेशन भी ठीक से नहीं बन पा रही है।

अहमदाबाद में 27 फरवरी को नमस्ते ट्रम्प कार्यक्रम के बाद लगातार प्रधानमंत्री को घेरा जाता रहा है। हालाँकि इस कार्यक्रम का कोई अब तक वैज्ञानिक लेना देना नहीं मिला है लेकिन अहमदाबाद में एल श्रेणी का स्ट्रेन पाया जा रहा है जिसने अमेरिका को हिला कर रख दिया है। ऐसे में इसे इस कार्यक्रम से जोड़ने के लिए विपक्ष को एक मुद्दा तो मिल ही गया है। जब लॉकडाउन हुआ तो सबसे पहले प्रवासी मजदूरों ने अपने घरों की तरफ लौटना शुरू किया। गुजरात के बड़े शहरों में, मुंबई, दिल्ली में लगातार मजदूरों की भीड़ एकत्रित हुई जिसने सामाजिक दूरी बनाये रखने की अपील को दरकिनार किया। इसके कारण से भी इन शहरों के इंफेक्शन की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। वहीँ दूसरी और मुंबई में महामारी लगातार बढ़ती जा रही है।  मुंबई में सबसे खतरनाक स्थिति धारावी की है जहाँ इसके बढ़ने की वजह से तबाही से इंकार नहीं किया जा सकता है। ध्यान रहे कि धारावी एक ऐसी बस्ती है जहाँ भारत का सबसे अधिक जनसंख्या घनत्व है। कल तक धारावी में दो सौ से अधिक मरीज आ चुके हैं और उनका बढ़ना लगातार जारी है। हरियाणा कमोबेश बहुत अच्छा चल रहा है। मरीजों की अधिक संख्या सोनीपत, गुड़गांव, नूह , फरीदाबाद, पलवल में देखने को मिल रही है।

सबसे अधिक दिक्क्त रेवेन्यू को लेकर है। इंडस्ट्री बंद होने की वजह से एक्ससाइज एन्ड टेक्सेशन मंत्रालय एवं जीएसटी की रिसिप्ट बहुत ज्यादा नीचे जा चुकी है। जहाँ कुछ प्रदेश शराब की दुकानों को खोलने के पक्ष में दिख रहे हैं वहीँ उनके ऐसा करने पर केंद्र ने पूरी तरह से रोक लगा रखी है। मेडिकल विशेषज्ञों का कहना है कि सोशल डिस्टेंसिंग मेंटेन रहना बहुत मुश्किल है एवं शराब की दुकाने खुलते ही भीड़ के वहाँ टूट पड़ने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। इन सबके बीच विपक्ष अभी भी लगातार आरोप लगा रहा है कि सरकार टैस्टिंग नहीं बढ़ा रही है जिसके कारण तेजी से नए केस का पता नहीं लग रहा है और संक्रमण के फैलाव से रोका नहीं जा रहा है। इन सबके बीच सरकार स्पष्ट तौर पर मान कर चल रही है कि भारत अब तक कम्युनिटी इंफेक्शन की तरफ नहीं बढ़ा है।  आर्थिक हालातों का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि जहाँ केंद्र सरकार ने डीए पर रोक लगाई है तो उत्तरप्रदेश ने छह तरह के भत्तों पर रोक लगा दी है।  हालाँकि यह सब मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए परेशानी का सबब है। सरकार को चाहिए कि अमीरों पर अतिरिक्त कर लगाए ताकि घाटे की भरपाई की जा सके।  फ़िलहाल सरकार की ऐसी मंशा दिखाई नहीं दे रही है। ऐसे में गरीबों की हालात बद से बदतर होना निश्चित है और मध्यमवर्गीय परिवारों का समस्याओं से घिरना एक प्रकार से निश्चित हो चुका है। इस सब का लम्बे समय तक लिए जा रहे विकास के लक्ष्यों पर बहुत भारी प्रभाव पढ़ना निश्चित माना जा सकता है।

इस सब के बीच उम्मीद की किरण केवल प्लाज़्मा थेरपी के कारण घट रहे मरीज ही हैं। इसके अलावा अभी दिल्ली दूर दिखाई देती है और लॉकडाउन का बढ़ना निश्चित दिख रहा है। बाकी आज प्रधानमंत्री सभी प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से बात करेंगे। इसके बाद क्या निर्णय होता है यह समय बताएगा।

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95% of Arab Women Never Had Orgasm

“95% of Arab Women Never Had Orgasm” भाजपा के बेंगलोर (साउथ) के सांसद तेजस्वी सूर्या के इस ट्वीट ने इंटरनेट की दुनिया में आग लगा दी है। हालाँकि यह ट्वीट उनके सांसद बनने से पहले का है जब उन्होंने तारिक फतेह को कॉट करते हुए 2015 में यह लिखा था। उस समय वे सांसद भी नहीं थे।  लेकिन जैसे ही उनका स्क्रीनशॉट वायरल हुआ, तैसे ही इंटरनेट की दुनिया में जैसे भूचाल आ गया। अरब देशों के बड़े बड़े राजनयिकों के अलावा शाही परिवारों के लोगों ने भी इस ट्वीट पर विरोध जताया और भारत सरकार को कोसा। कोसने का लेवल यहाँ तक रहा कि इस्लाम फोबिया के नाम से ट्रेंड 21 अप्रेल को समूचे विश्व में टॉप कर गया और आर्टिकल लिखे जाने तक इस हैशटैग के साथ लगभग 697000 ट्वीट हो चुके थे। इस मामले की संवेदना को समझते हुए प्रधानमंत्री को भी बाकायदा पब्लिक में आकर कहना पड़ा कि हम सबको मिल कर धर्म, जाति आदि का भेदभाव किये बिना वायरस से लड़ना है। ज्ञातव्य है कि कोरोना वायरस के फैलाव के शुरू होने के बाद कुछ लोगों ने (जिसमें वरिष्ठ मीडिया भी शामिल था ) कोरोना के फैलाव के लिए दिल्ली में एक जमात के कार्यक्रम को दोषी ठहराना शुरू कर दिया था। एक ऐसे समय में जब समूचा विश्व घरों में बंद है , ऐसे में हर छोटी से छोटी बात को नोटिस किया जा रहा है। हालाँकि जमात में जो हुआ उसको जायज ठहराना अपने आप में नाजायज है फिर भी केवल जमात को ही दोषी ठहराना केवल कोरी राजनीति के अलावा कुछ नहीं है।  हरियाणवी कुश्ती स्टार बबिता फोगट भी इस मामले में कूदी और सीधे आरोप लगाया कि भारत में कोरोना जमात की वजह से फैला है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने 19 अप्रेल को आंकड़े जारी करते हुए कहा कि भारत में कुल कोरोना मरीजों में से 29% के लगभग जमात से हैं। अब कम से कम इसे टोटल तो नहीं कहा जा सकता। अन्य 71 % का जमात से कोई लेना देना नहीं है और भारत में पहले कोरोना के मरीज का भी जमात से कोई लेना देना नहीं था। इसे केवल एक सूटेबल राजनीति का ही भाग माना जा सकता है इसके अलावा कुछ नहीं। आंकड़े बताते हैं कि लगभग समूचे विश्व में धार्मिक समूहों की वजह से कोरोना का फैलाव बहुत ज्यादा तेजी से हुआ है। इटली में चर्च तो ब्रिटेन में इस्कॉन की इसमें भूमिका पहले ही सामने आ चुकी है। ऐसे में वायरस को धर्म से जोड़ना राजनीति के अलावा कुछ नहीं है , जिसमें मैं स्वयं को शामिल नहीं पाता हूँ।

खैर जो भी हो यह इस्लाम फोबिया वाली बात सौ आने सही है। किसी भी धर्म के लोग पूरी तरह खराब नहीं हो सकते। यह सच है कि इस्लाम के अंदर कटटरपन है और आजकल आतंकवाद के फैलाव में इस्लाम धर्म को मानने वालों का रोल किसी से छिपा नहीं है। फिर भी मैं यह मानता हूँ कि इसके लिए शरीफ लोगों को तंग नहीं किया जा सकता है। यह भेदभाव हमें खराब करेगा और अरब देशों का यह गुस्सा उसकी शुरुआत भर है। तेल सप्लाई में और भारत के बिजनेस में अरब देशों का बहुत बड़ा रोल है और उसे कमतर कर आंकना ही मूर्खता है। इस्लाम को गाली दे राजनीति चलाना कभी न कभी तो भारी पड़ना ही था। पिछले तीन दिन से हम यह रिजल्ट देख रहे हैं। ठीक है कि भारत में इस्लाम बहुलता में नहीं है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि समूचे विश्व में नहीं है। ट्रोल आर्मी को यह एहसास होना चाहिए था कि वैश्वीकरण के इस समय में हम किसी भी देश से दूर नहीं हो सकते हैं, खासकर जब हमारे व्यापारिक हित जुड़े हुए हों। इस्लाम जनसँख्या के आधार  पर विश्व का सबसे ज्यादा माने जाने वाला धर्म है और ज्यादातर देशों के साथ हमारे व्यापारिक रिश्ते भी हैं।  आप समझिये कि अकेले UAE के साथ व्यापार की बात को भी छोड़ दो तो भी लगभग तीन करोड़ भारतीय वहाँ पर काम करते हैं। यह आंकड़ा बता सकता है कि जो बीज हम बो रहे हैं यदि इसकी फसल भारत से बाहर कटनी शुरू हो गयी तो यह भारत और भारतीयों के लिए एक बहुत बड़ा झटका होगी। अतः हमें इस्लाम अथवा धर्मों को राजनीति का भाग बनाने से बचना होगा और इस बात को अहमियत देनी होगी कि भारत एक है  और भारत में रहने  वाले सभी नागरिक भारतीय हैं। इस्लाम को गाली देना देशभक्ति नहीं।

आजादी की 72वीं सालगिरह मुबारक

72 वाँ स्वतन्त्रता दिवस

आजाद मानसिकता और गुलाम देश से मुक्ति पा कर गुलाम मानसिकता और आजाद देश की 72 वीं सालगिरह की सबको बधाई. एक देश के रूप में भारत को बने आज 71 साल हो गये हैं. इस बीच हम सुई तक ना बना सकने वाले देश से मिसाइल बनाने वाले देश तक पंहुचे हैं. हम और आगे भी जायेंगे. पर क्या यह वह सहर है जिसके लिये हम चले थे? फैज ने आजादी पर एक बेहद उम्दा ग़ज़ल लिखी थी. उसे यहाँ पर उद्धृत करना अत्यंत आवश्यक है:

यह दाग़-दाग़ उजाला, यह शब गज़ीदा सहर
वो इंतज़ार था जिसका यह वो सहर तो नहीं
यह वो सहर तो नहीं जिसकी आरज़ू लेकर
चले थे यार कि मिल जाएगी कहीं न कहीं

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चले चलो के ये मंजिल अभी नहीं आई

शहीद भगत सिंह ने अपने विचारों में कहा है कि वे देश नहीं अपितु व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के लिए लड़ रहे हैं. जब तक विचारों की आजादी नहीं होगी तब तक सीमाओं की आजादी बेमानी है. राजनैतिक स्वतन्त्रता हमें मिली; हम डोमिनियन स्टेट से आज एक पूर्णतया स्वतंत्र राज्य बन गये हैं. हम किसी राज के अधीन नहीं; हम पांच वर्ष में अपनी स्वयम की सरकार चुनते हैं. हमारे सभी किये गये कार्यों की जिम्मेदारी हमारी है. यह देश हम स्वयम चलाते हैं और इसकी सभी सफलताओं और विफलताओं के लिए हम स्वयम जिम्मेदार हैं. धर्म के आधार पर दो देश बनना; लगभग साढ़े पांच सौ रियासतों ने दो राष्ट्रों के रूप में अपनी पहचान आज से 71 वर्ष पहले पाई थी. राजशाही से लोकतंत्र तक का यह सफर अत्यंत दुष्कर रहा.

70 के दशक में एक अच्छी फीचर फिल्म आई थी जिसका नाम था “हम हिन्दुस्तानी”. सुनील दत्त की इस फिल्म का एक गीत राजनैतिक पार्टियों की जान है. “छोड़ों कल की बातें; कल की बात पुरानी” नामक इस गीत में एक पैरा है जिसमें लिखा है:

“आज पुरानी ज़ंजीरों को तोड़ चुके हैं

क्या देखें उस मंज़िल को जो छोड़ चुके हैं

चांद के दर पर जा पहुंचा है आज ज़माना

नए जगत से हम भी नाता जोड़ चुके हैं

नया खून है नई उमंगें, अब है नई जवानी”

आज यह गीत फिर से याद आया. “जंजीरें” यह शब्द महत्त्वपूर्ण है; जंजीरे कई प्रकार की होती हैं; कुछ जंजीरें सामाजिक होती हैं; कुछ राजनैतिक हो सकती हैं तो कुछ धार्मिक होती हैं. फलां से ब्याह नहीं करना; फलां गलत है; फला सही है यह जंजीरें सामाजिक हैं. फलां व्यक्ति इसलिए गलत है कि वह फलां धर्म को फ़ॉलो करता है यह धार्मिक जंजीरें हैं तो फलां व्यक्ति फलां राजनीतिक पार्टी से जुड़ा है अतः वह सही है अथवा गलत है तो ये राजनैतिक जंजीरे हैं. नेताजी सुभाष चन्द्र बोस मानते थे कि भारत की स्थिति ऐसी नहीं कि उसे पूर्ण स्वतन्त्रता दी जाए; उसे आंशिक स्वतन्त्रता देकर एक कठोर तानशाह की जरूरत है. यह बात उन्होंने आल इण्डिया रेडियो को एक भाषण में कही थी.

हम एक ऐसे देश के बाशिंदे हैं जहाँ हम नैतिक रूप से अत्यंत बलवान हैं पर हमारी नैतिकता केवल इस बात से खत्म हो जाति है कि हमारे बच्चे किसी अन्य जाति में ब्याहे जाते हैं. हमारी नैतिकता का पैमाना बहुत खतरनाक है; भारत में गूगल पर सबसे ज्यादा सर्च करने वाली सेलिब्रिटी सन्नी लियोन है पर उसके ऊपर कोई फिल्म बनती है तो हमारी नैतिकता के ऊपर एक बहुत बड़ा कुठाराघात होता है. हम मन्दिर और मस्जिद के नाम पर लड़ भी सकते हैं और मर भी सकते हैं. आधा देश तो केवल इस बात पर कन्फ्यूज है कि वह पहले देश के लिए लड़े अथवा धर्म के लिए या फिर मानवता के लिए लड़े. धर्म को तिलांजली देने वाला यहाँ वामपंथी और यहाँ के सबसे बड़े धर्म हिन्दू धर्म (जिसका नाम किसी भी धर्म ग्रन्थ में नहीं आता है) की आलोचना करने वाला हर एक पुरुष मुल्ला (मुस्लिम धर्म का समर्थक) माना जाता है. हम मस्जिद तोड़ने के नाम पर जानें ले सकते हैं; धर्म के नाम पर देश की सीमाओं का बंटवारा कर सकते हैं. हम इमानदार हैं लेकिन ट्रेफिक चालान के समय पर जान पहचान वाले की सिफारिश ढूंढ सकते हैं. हमें ईमानदार सरकार चाहिए लेकिन अपने बेटे का रोल नम्बर किसी जानकार को अथवा पैसा लेने वाले को देना पसंद करते हैं. हम भ्रष्टाचार को कलंक मानते हैं लेकिन फिर भी नैतिक और आर्थिक रूप से भ्रष्ट हैं. हमें धर्म के नाम पर क़ानून चाहिए; हम आधुनिक संविधान की जगह सड़ी गली शरियत की व्यवस्था को लागू करना चाहते हैं. तिलक, पगड़ी, टोपी हमारी नैतिकता की पहचान है. हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है लेकिन गंगा के अंदर सबसे पहले हम गंदगी डालेंगे फिर उसकी सफाई के नाम पर 75 सौ करोड़ रूपये खा जायेंगे. फिर भी मरने मारने को तैयार हो जायेंगे. हम मानसिक तौर पर कहीं धर्म, कहीं व्यवस्था, कहीं जाति तो कहीं राजनैतिक सोच के गुलाम हैं. स्वतंत्र विचार पर पहले भी हम फांसी पर लटकते थे और आज भी लटकते हैं. गांधी से हमें इसलिए दिक्कत हुई की उसने कथित तौर पर हिन्दू विरोधी कार्य किया तो अन्धविश्वास से मुक्ति दिलाने के लिए कार्य करने वाले आज गोली के शिकार बनते हैं. एक समय था जब प्लूटो को इस बात के लिए मुकद्दमे का सामना करना पडा था कि उसने कहा था कि पृथ्वी गोल है तो आज कुछ वैज्ञानिक रूप से विरोधाभासों का विरोध करने पर हत्या हो जाती है. हम आज भी यह नहीं समझ पाए हैं कि हमें तवज्जो किसे देनी चाहिए राष्ट्रवाद को; धर्म को अथवा मानवता को? हम राष्ट्रवाद की सही और सच्ची भावना से भी मरहूम है. समस्त राष्ट्र के नागरिको का सम्मान और उनकी रक्षा ही तो राष्ट्रवाद है. पर क्या यह भावना हम ला पाए हैं? सेलेक्टिव राष्ट्रवाद को उठा गर्व महसूस करने वाले ग्रुप्स बाकियों को देशद्रोही अथवा पाकिस्तानी बताने में भी गुरेज नहीं करते. इस देश के सम्मान के लिए दिन रात जद्दोजहद करने वाले लोगों को भी सेलेक्टिव राष्ट्रवाद में देशद्रोही बता दिया जाता है. स्वयम को पढ़े लिखे बताने वाले लोग आज भी दूसरी जाति अथवा धर्म में शादी तक करने पर मरने और मारने पर उतारू हो जाते हैं. सालों साल से चले आ रहे इस कार्य के बीच हम सच में आगे भी बढ़े हैं. हम सोफ्टवेयर में वर्ल्ड लीडर हैं; हम एक बहुत बड़ा अंतर्राष्ट्रीय बाजार हैं; हम चाँद तक लगभग पंहुच ही गये हैं; हम परमाणू देश हैं; पूर्णतया साधन सम्पन्न हमारी सेना विश्व की चुनिन्दा मजबूत सेनाओं में से एक है. हमारे आइआइटी और आईआईएम विश्व में धाक रखते हैं. सीमित संसाधनों के बावजूद भी हम अनाज के मामले में पूर्णतया स्वनिर्भर हैं. लेकिन अभी बहुत कुछ करना बाकि है. मंजिल अभी बहुत दूर है. मैं धर्म/मजहब आदि का घोर विरोधी हूँ लेकिन हमेशा सोचता हूँ कि गर सभी इन सीमाओं को तोड़ एक साथ रहें तो यह देश सच में बहुत खूबसूरत है. हम शायद आने वाले खतरों को देख और समझ नहीं पा रहे हैं. यह विश्व आतंकवाद से प्रताड़ित हो धीरे धीरे तीसरे विश्वयुद्ध की ओर बढ़ रहा है. हमारे संसाधन धीरे धीरे कम हो रहे हैं. प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता कम हो रही है; अन्नदाता अपने सीमित संसाधनों के कारण धीरे धीरे कमजोर हो रहा है. जंग सीमित संसाधनों और विकास की हो; अदम गोंडवी साहब ने दो ही पंक्तियों में सार व्यक्त किया है:

छेड़िये इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के ख़िलाफ़
दोस्त, मेरे मजहबी नग्मात को मत छेड़िये

हम सब मिल जुल कर रहें; मेहनत करें; स्वयम को और इस देश को आगे ले जाएँ; शिक्षा की श्रेणी में हमारा देश अग्रणी बने; हमारी सोच वैज्ञानिक हो; हम समाज के सही रूप को समझें; हम किताबी नहीं अपितु मानसिक तौर पर इमानदार हों; मेरी आज यही तमन्ना है.

जय हिन्द

वन्दे मातरम

संघ, पटाखे और मूर्खता संघ, पटाखे और मूर्खता संघ, पटाखे और मूर्खता patakhe

संघ, पटाखे और मूर्खता

सुप्रीम कोर्ट ने कुछ ही दिन पहले पटाखों की बिक्री पर बैन लगाया था. इस बैन पर तरह तरह की प्रतिक्रियाएं आई उनमें से सबसे प्रमुख प्रतिक्रियाएं एक ऐसे वर्ग की आयीं जिसने यह दिखाने की कोशिश की कि सुप्रीमकोर्ट का पटाखों पर बैन हिन्दू धर्म के विरुद्ध है और सुप्रीमकोर्ट को यह बैन मुस्लिम धर्म के विरुद्ध भी लगाना चाहिए. यह प्रतिक्रिया जायज ही भाजपा एवं संघ की तरफ से आई. इस पार्टी से यही आशा रखी जा सकती थी. भाजपा से प्रगृति के बारे में सोचने एवं कुछ करने की आशा करना स्वयम को निराश करने योग्य है. यह दिमागी रूप से असहाय एवं अपंग लोगों की पार्टी बनती जा रही है. वृहद रूप से मुद्दों के बारे में चर्चा, समाज की एवं राष्ट्र की प्रमुख समस्याओं के बारे में चर्चा की न इनसे आशा की जा सकती और न ही इनके यह वश में है. गाय, गंगा, गायत्री, सरस्वती, मन्दिर आदि इनके लिए मुद्दे हैं. गरीबी, बेरोजगारी, तरक्की, विज्ञान आदि नहीं. खैर, पटाखा बिक्री पर बैन व्यापारियों के लिए कहीं न कहीं हानिकारक साबित हुआ है इसमें कोई शक नहीं और मैंने प्रमुखता से टीवी डिबेट्स में यह मुद्दा उठाया है कि व्यापारियों की यह हालत सरकार की वजह से हुई है जो अपनी जिम्मेदारी से भाग रही है. ऐसे में इनके नुक्सान की भरपाई सरकार को करनी चाहिए. ज्ञातव्य है कि सुप्रीमकोर्ट ने पटाखे की बिक्री पर चिंता 2005 में ही जता दी थी. उस समय से अभी तक बारह वर्ष हो गये हैं और प्रदूषण का स्तर दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है. संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार भारत के हर नागरिक के पास है और जीवन के अधिकार में स्वच्छ वायु, जल भी शामिल है. इस अधिकार को भारत के हर नागरिक को उपलब्ध कराने के लिए माननीय सुप्रीमकोर्ट ने हजारों एतिहासिक फैंसले दिए हैं. ऐसे में सुप्रीमकोर्ट के इस फैंसले को हिन्दू विरोधी बताना मानसिक अपंगता से अधिक कुछ भी नहीं है.

सुप्रीमकोर्ट ने सबसे पहले M.C.Mehta के फैंसलों में दिल्ली से हानिकारक फेक्ट्री बाहर शिफ्ट कराई, फरीदाबाद में लगभग 1500 यूनिट फेक्टरियों की बंद कराई, अरावली को बचाने के लिए सालों से लगातार सुनवाई चल रही है. वेटलैंड को लेकर सुनवाई हो या गंगा के प्रदूषण को लेकर, दिल्ली में यमुना की सफाई हो या दस वर्ष से पुराने डीजल वाहनों का बंद करना; यह सब हमें न्यायपालिका के सौजन्य से ही मिला है. दिल्ली में CNG वाहन से लेकर ट्रेफिक पर रेगुलेशन तक सब कुछ हमें सुप्रीमकोर्ट ने ही दिया है. ऐसे में इस फैंसले को आगे रख कोर्ट को ही धर्म का विरोधी बताने वाले लोगों को क्या कहना चाहिए यह मेरी समझ से बाहर है. खैर, सुप्रीमकोर्ट के फैंसले के बाद सोशल मीडिया पर अलग अलग ट्रेंड शुरू हुए. कल मेरे एक ट्रेंड पकड़ में आया जो #मीलॉर्ड लिखने से दिख रहा था. लोगों ने जानबूझ कर यह टैग इस्तेमाल किया और अधिकाधिक पटाखे बजाये. जानकारी के अनुसार सुप्रीमकोर्ट के बाहर जाकर भी रात को पटाखे बजाए गये. कुछ शहरों में बहुतेरी जगह पर रात 9:30 के बाद आतिशबाजी शुरू हुई क्योंकि माननीय पंजाब एवं हरयाणा उच्च न्यायालय ने इस समय के बाद पटाखे चलाने पर बैन लगा रखा था. यह सब इवेंट्स कहीं न कहीं सरकार द्वारा प्रायोजित हैं क्योंकि सरकार में शामिल सांसद, विधायकों ने ही सबसे पहले फैंसले को धर्म विरोधी बताया.

पर क्या फैंसला धर्म विरोधी है? वैदिक धर्म के अनुसार यह सृष्टि पञ्च तत्वों से बनी है. वायु, जल, पृथ्वी, आकाश एवं अग्नि. हिन्दू धर्म इन पञ्च तत्वों की पूजा एवं आराधना के आस पास घूमता है. कहा जाता है कि मृत्यू के बाद शरीर इस पंचतत्व में ही विलीन हो जाता है. यही कारण है कि हिन्दू धर्म के अनुसार मृत्यु के बाद मृत शरीर को अग्नि दी जाती है. पटाखे इन पञ्च तत्वों में से कम से कम 4 तत्वों को गम्भीर रूप से नुक्सान करते हैं. हिन्दू धर्म की अग्नि पूजन विधि, वैदिक हवन विधि यह सब पञ्च तत्व की शुद्धि के लिए ही होते हैं. ऐसे में पञ्च तत्व को प्रदूषित करने वाला कुछ भी हो सकता है पर सच्चा हिन्दू नहीं. रामायण की किन्द्व्नती के अनुसार श्रीराम के आने के बाद अयोध्या में घी के दिए जलाए गये थे. ऐसे में प्रमुख मान्यता घी के दिए जलाने की है जिसे बाद में मोमबत्ती और इलेक्ट्रिकल लाइट्स से सपोर्ट कर दिया गया. पर क्या पटाखे पुरातन हिन्दू धर्म का हिस्सा थे? व्यापारीकरण के बढने के साथ इस त्यौहार पर पटाखों की बिक्री शुरू हुई. पटाखे बनने ही कुछ डेढ़ सौ वर्ष पहले प्रारम्भ हुए हैं तो यह हिन्दू धर्म का हिस्सा कैसे हुए? यह केवल व्यापारीकरण के दौर में शुरू की गयी नई प्रथा है जिसे हम पर्यावरण के लिए सहज ही छोड़ सकते हैं. मैं इस बात के पूर्ण समर्थन में हूँ कि पटाखों की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबन्ध हो और इन्हें किसी भी स्तर पर बजाने की आज्ञा न दी जाये. परम्परा अथवा प्रथा के नाम पर नववर्ष, गुरुपर्ब, दिवाली और यहाँ तक कि होली पर भी इन्हें चलाना केवल गलत ही कहा जायेगा. शादी ब्याह में भी इनके इस्तेमाल को मैं गलत मानता हूँ; यही कारण है कि स्वयम की शादी में भी मैंने इनका इस्तेमाल नहीं होने दिया था. सेहत के लिए बेहद हानिकारिक ये पटाखे कहीं भी कोई फायदा नहीं करते; ऐसे में इन्हें छोड़ना ही श्रेयस्कर है.

क्या मैं मुस्लिम समर्थक हूँ? कुछ बेहुदे व्यक्ति मेरे पटाखों के विरोध को मेरे कथित मुस्लिम धर्म समर्थन से जोड़ रहे हैं. इन्हें बेहूदा ही कहना सही है क्योंकि न उनकी भाषा ही संस्कारवान है और न ही उनके स्वयम के संस्कार ही यहाँ झलक रहे हैं. कुछ का कहना है कि मैं बकरे काटने का समर्थक हूँ. श्रीमान जी मैं जीव हत्या के इतना खिलाफ हूँ कि मैं खाने में भी पूर्णतया शाकाहारी हूँ. रही बात ईद पर बकरे कटने की तो इसका पहले भी विरोध किया था, आज भी करता हूँ और कल भी विरोध में ही मिलूंगा. मैं कोई धर्मनिरपेक्ष नहीं जो एक धर्म का समर्थन कर दूसरे का विरोध करूं. मेरे लिए सब धर्म एक समान हैं और गंदगी का घर हैं. इन्हें समाप्त कर देना ही मानवता के हित में है. फिर भले ही मुस्लिम धर्म के नाम पर चल रहा मानवीय आतंकवाद हो अथवा हिन्दू धर्म के नाम पर चल रहा गौ आतंकवाद, पटाखा आतंकवाद हो. यह उन कथित हिन्दू धर्म के हिमायतियों को ही सोचना चाहिए कि वे हिन्दू धर्म के कितना समर्थन में हैं? पंचतत्व में गंदगी फैला कर किस मूंह से आप पंचतत्व शुद्धि का नाटक करेंगे. चलिए, मैं तो चाहूँगा कि आपके घर में कोई दमा का मरीज न हो. समूचे विश्व में सबसे अधिक दमे के मरीजों को अपने अंदर समाहित किये भारतवर्ष में इतने खतरनाक प्रदूषण से आप केवल स्वयम का ही नुकसान नहीं कर रहे अपितु उन लाखों बच्चों और बूढों के जीवन को खतरे में डाल रहे हैं जो दमे के मरीज हैं अथवा श्वास की किसी भी बीमारी से पीड़ित हैं.

अपने धर्म की मान्यताओं को प्रदूषित कर धर्म की रक्षा आपको मुबारक भाई. आपके अलावा सभी मित्रों को दीपावली की मुबारकबाद. इस कथित हिन्दू धर्म के समर्थन में प्रोपोगेन्डा फैलाने वाले संघ को तो बिलकुल भी कोई मुबारकबाद नहीं.आप देश विरोधी हैं यह पहले भी पता था पर कल यकीन हो गया वह भी सबूत के साथ. आपने देश को केवल सीमा माना है और देश के नागरिक, देश की वायु, देश के जल को शायद अभी भी पाकिस्तानी मानते हैं.

बाबा गुरमीत राम रहीम गिरफ्तारी; कुछ सवाल

आम तौर पर चुप्पी साधे रहने वाला लो प्रोफाइल लेकिन साफ़ सुथरा शहर पंचकुला आज कल गलत कारणों से चर्चा में है. दरअसल डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम इंसा की पंचकुला सीबीआई कोर्ट में पेशी 25 अगस्त के लिए निर्धारित थी. पन्द्रह वर्ष पुराने साध्वी यौन शोषण मामले में बहस पूरी होने के बाद यहाँ मामले का फैंसला सुनाया जाना था. यही वह कारण था कि पंचकुला एक दम से राष्ट्रीय सुर्ख़ियों में आ गया. 25 अगस्त को डेरा मुखी की पेशी के बाद उन्हें सजा सुना दी गयी और उस सजा के बाद पंचकुला में जो तांडव हुआ वह समस्त राष्ट्र ने देखा है. 76 गाड़ियाँ जला दी गयी, 35 से अधिक डेरा समर्थक हिंसा के बाद सुरक्षा बलों की गोली के शिकार हुए. डेरा हेडक्वार्टर सिरसा कमोबेश थोडा अधिक शांत लेकिन पूरी तरह तनावपूर्ण रहा. वहां भी कुछ लोग गोलियों के शिकार बने. आइये इस घटनाक्रम के इतिहास को जानते हैं और बाद में लिए जाने लायक सबक देखते हैं.

25 अगस्त 2017 को होने वाली पेशी के दौरान माननीय सीबीआई अदालत ने डेरा मुखी को निजी तौर पर पेश होने का आदेश दिया. कानूनन रूप से आरोपी को सजा अथवा बरी करने का कार्य अदालत आरोपी के सामने ही करती है ताकि वह ऊपरी अदालत में जाकर यह न कह सके कि उसे सजा देने से पहले सुनवाई का अधिकार नहीं मिला. कानून में ऐसे प्रावधान भी किये गये हैं. ऐसे में उन्हें पेश होने के लिए कहना प्राकृतिक न्याय के अनुरूप था. यहीं से पंचकुला सुर्ख़ियों में आया. एक एक कर यहाँ डेरा समर्थक जमा होने शुरू हो गये. स्थिति और भी गंभीर हो गयी जब हरियाणा के मुख्यमंत्री ने बाकायदा प्रैस कोंफ्रेंस कर मीडिया को जानकारी दी कि 25 तारिख को डेरा मुखी कोर्ट में पेश होंगे. ऐसे में मीडिया के माध्यम से भी समर्थकों तक आधिकारिक मैसेज पंहुच गया कि डेरा मुखी पंचकुला में आयेंगे. हालाँकि बाद में डेरे के द्वारा मुख्यमंत्री के ब्यान का खंडन किया गया और यह कहा कि डेरे की तरफ से ऐसा कोई आश्वासन नहीं दिया गया है एवं वे कानून का सम्मान करते हैं. पंचकुला में एहतियातन धारा 144 लगा दी गयी. लेकिन बावजूद उसके खेल बिगड़ना शुरू हो गया. चारों तरफ पुलिस के पहरे के बावजूद लगभग 2500 समर्थक एक दिन पंचकुला जिला न्यायालय के कोम्प्लेक्स में प्रवेश कर गये. यह बड़ी चूक थी. इसके बाद पहरा और कडा कर दिया गया और अदालत के वकीलों को भी कड़ी तलाशी अभियान से गुजारा जाने लगा और उनकी गाड़ियों की पार्किंग तक बदल दी गयी. इस बात को लेकर वकीलों के अंदर नाराजगी आई और बात कहासुनी तक भी पंहुच गयी. बढती टेंशन के माहौल में जिला बार एसोसिएशन पंचकुला ने अपना कार्य 23 अगस्त से 25 अगस्त तक सुरक्षा के लिहाज से सस्पेंड करने का फैंसला कर लिया. यह कदम दुर्भाग्यपूर्ण था. एक आरोपी की पेशी के कारण ही यदि न्यायालय के अंदर कार्य बंद हो जायेगा तो स्वतंत्रता को खतरा होना लाजमी है. इस बीच डेरा समर्थक ;लगातार जीरकपुर के रास्ते से पंचकुला में प्रवेश करते गये और मीडिया के आकलन के अनुसार 18 अगस्त से 22 अगस्त के बीच लगभग डेढ़ लाख लोग आ गये. धारा 144 के बावजूद भी इतने लोगों का पंचकुला में इकट्ठा होना खतरनाक था. ज्ञातव्य है कि पंचकुला छोटा शहर है और यहाँ की कुल जनसख्या लगभग 3.5 लाख ही है. बाहर से आने वाले लोग पंचकुला के हर पार्क में फ़ैल गये. सरकार और निगम के द्वारा अलग से इंतजाम करने की जगह पब्लिक टॉयलेट तक बंद कर दिए गये. ऐसे में यहाँ बारिश के दिनों में हालात और खराब हो गये. 21 तारीख आते आते लोग सेक्टर 21, 23, 24 में घरों के आगे बैठना शुरू हो गये. पंचकुला के बहुत से लोगों की हालत एक तरह बंधक जैसी हो गयी. यह सब शर्मनाक था और एक बड़ी विपदा को जन्म देने के लिए काफी था. ऐसे में मैंने माननीय हाईकोर्ट में जनहित याचिका के द्वारा जाने का फैंसला लिया. सरकार पंचकुला के लोगों को डेरा समर्थकों की दया का पात्र बना कर नहीं छोड़ सकती थी. मामला 23 अगस्त सुबह फ़ाइल कर दिया गया. किसी विपरीत स्थिति के बावजूद भी मामला हर हाल में सुनवाई के लिए कोर्ट में आये इसके लिए दोपहर दो बजे मैंने अपने कुछ वकील साथियों के साथ जा माननीय न्यायमूर्ति अजय कुमार मित्तल की खंडपीठ के आगे गुजारिश की कि इसे 23 को ही सुनवाई के लिए रख लिया जाये लेकिन न्यायालय ने मेरी रिक्वेस्ट में देरी के चलते इसे 24 अगस्त के लिए रख दिया. 23 अगस्त को एक और दुर्भाग्यपूर्ण खबर आई. उच्च न्यायालय की बार एसोसिएशन माननीय कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश से मिलने गयी और रिक्वेस्ट की कि पंचकुला से आने वाले 800-1000 वकीलों को जान का खतरा है और यदि वे कोर्ट में पेश न हो पायें तो उनके मामलों में कोई नकारात्मक ऑर्डर न दिए जाये. इस गुजारिश को माननीय जस्टिस सारों ने मान लिया.

24 अगस्त से 26 अगस्त 2017 के बीच की एतिहासिक कार्यवाही:

मामला लगभग 10:30 पर माननीय जस्टिस सारों और जस्टिस अवनीश झिंगन की खंडपीठ के आगे सुनवाई के लिए आया. यह हैरानी की बात थी कि मामले की संजीदगी को देख माननीय न्यायालय ने हरयाणा और पंजाब के महाधिवक्ता को एवं केंद्र से अतिरिक्त सोलिसिटर जरनल श्री सत्यपाल जैन को पहले से ही कोर्ट में आने के लिए कह दिया था. सुबह की सुनवाई में माननीय कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की कि यदि फरवरी 2016 वाला घटनाक्रम दोबारा हुआ तो कोर्ट हरयाणा के DGP को बर्खास्त करने से भी नहीं हिचकेगी. केंद्र से कहा गया कि कोर्ट को नहीं लगता कि हरयाणा की तैयारी ठीक है और वह सम्भालने में सक्षम है; क़ानून व्यवस्था बनाये रखना केंद्र का भी दायित्व है. केंद्र यह बताये कि सुरक्षा के लिहाज से केंद्र ने हरयाणा एवं पंजाब को क्या सहायता दी और कितनी और देने में सक्षम है. मामले को दोपहर बाद 2 बजे के लिए रख लिया गया. हरियाणा से पूछा गया कि धारा 144 के बावजूद इतने लोगों का पंचकुला में होना हैरान करने वाला है; सरकार इसका आदेश पेश करे. दोपहर बाद जैसे ही मामला सुनवाई के लिए आया तो मंजर बेहद हैरान करने वाला था. धारा 144 के ऑर्डर में कभी भी 5 अथवा 5 से अधिक लोगों का पंचकुला में आना मना ही नहीं किया गया था. ऐसे में जवाबदेही तो बनती ही थी. हरयाणा के ADGP श्री चावला कोर्ट में स्वयं पेश हुए और उन्होंने कहा कि उन्होंने पुख्ता जानकारी जुटाई है कि डेरे के द्वारा अपने समर्थकों को पंचकुला आने के लिए कहा गया है. उनके द्वारा यह भी कहा गया कि वे पंचकुला में लोगों का आना रोकने में अक्षम हैं. ऐसा लगता था कि पंचकुला को दया पर छोड़ दिया गया था. केंद्र ने कहा कि पंजाब को 75 एवं हरयाणा को केवल 56 कम्पनियां उपलब्ध कराई गयी हैं. यह संख्या बेहद कम थी. चूंकि एक कम्पनी में केवल 130 जवान होते हैं और एक जवान की एक दिन में केवल 8 घंटे की ही ड्यूटी रहती है ऐसे में क़ानून व्यवस्था का क्या हाल हो सकता था यह सोचने में भी डर लगता है. इसके बाद मामले को तीसरी बार सुनवाई के लिए शाम 3:30 पर रख लिया गया. तीसरी सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत भी पीठ का हिस्सा बन गये. पूर्ण पीठ के आदेश के बाद हरयाणा को 49 अतिरिक्त कम्पनी और पंजाब को 9 अतिरिक्त कम्पनियां मुहैया करवाई गयी. साथ ही सरकार को सुनिषित करने के लिए कहा गया कि डेरा समर्थकों को घर वापस जाने के लिए कह दिया जाये और डेरे को आदेश दिए गये कि डेरा मुखी अपने समर्थकों से वापस जाने के लिए अपील करें. एतिहासिक रूप से कोर्ट ने आदेश दिए कि कोई भी व्यक्ति, धार्मिक नेता, राजनेता आदि भडकाऊ बयानबाजी नहीं करेगा.

24 अगस्त की रात:

24 अगस्त की रात सरकार के द्वारा समर्थकों को बाहर निकालने की कथित कोशिश की गई लेकिन वह कोशिश माजरी चौक पुल के नीचे तक ही सीमित रह गयी. लेकिन एक अच्छा कार्य हुआ. कोर्ट के आदेश के बाद इन समर्थकों को लगभग सैक्टर 5 पंचकुला तक सीमित कर दिया गया. इसके अतिरिक्त कुछ लोग किसी किसी बिल्डिंग में रह गये. ज्ञातव्य है कि कोर्ट की सुनवाई में बहुत से वकील साथियों ने आप बीती भी सुनाई थी; उनके अनुसार कुछ लोगों ने घरों में भी घुसने की कोशिश की थी. देर रात मुख्यमंत्री सचिवालय के एक वरिष्ट अधिकारी ने आकर इस ओपरेशन को भी रोक दिया. ऐसे में सभी लोग पंचकुला में ही रह गये.

25 अगस्त का दिन और उसके बाद :

25 अगस्त को सुबह 11 बजे सुनवाई हुई. माननीय कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसा लगता है कि सरकार डेरे के साथ मिली हुई है. मैंने कहा कि लगभग 800 गाड़ियों का काफिला सिरसा से चला है और यह काफिला स्वयं खतरा हो सकता है. जब कोर्ट ने पूछा तो महाधिवक्ता ने कहा कि उन्हें बताई गयी जानकारी के अनुसार कुल 7 गाड़ियाँ आ रही हैं. कौन सही था यह आप सबने देखा होगा. इसके अलावा सरकार ने कहा कि सैक्टर 5 में कुछ लोग रह गये हैं और बाकियों को कोर्ट के आदेश के बाद निकाल दिया गया है. कोर्ट ने आदेश दिया कि सुरक्षा बनाये रखने के लिए सैनिक कोई भी कार्यवाही करने से न चूकें और किसी आदेश का इंतज़ार न करें.  मामले को दोपहर बाद 4 बजे के लिए रख लिया गया. इस बीच सीबीआई कोर्ट ने डेरा मुखी को सजा सुना दी और उसके बाद डेरा समर्थकों के द्वारा व्यापक हिंसा फैलाई गयी. कोर्ट के आदेश के अनुसार फ़ोर्स ने अपना काम किया और आर्मी स्टैंड बाई रही. पंचकुला में कथित तौर पर कर्फ्यू लगा दिया गया. सिरसा और पंजाब के कई शहरों में भी यकायक हिंसा हुई. कोर्ट ने डेरे के वकील को आदेश दिया कि रिकवरी के लिए तैयार रहें और डेरा अपनी सम्पत्ति को ट्रांसफर न करे. नुक्सान के जायजे के लिए एवं अन्य कार्यों के लिए कोर्ट को 26 अगस्त छुट्टी के दिन के लिए स्थगित कर दिया गया. छुट्टी वाले दिन कोर्ट फिर से बैठी जहाँ जानकारी दी गयी कि 28 लोग पंचकुला में मृत्यू को प्राप्त हुए हैं और बहुत से घायल हैं. पंजाब में कोई मृत्यू नहीं हुई. पंचकुला के DCP को सस्पेंड कर दिया गया है. माननीय कोर्ट ने इसपर हैरानी जताई कि इतने निचले स्तर के अधिकारी को सस्पेंड करना यह साबित करता है कि सरकार कहीं न कहीं डेरे के साथ मिलीं हुई थी और पंचकुला में जानबूझ कर लोगों को आने दिया गया. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह मामले की तह तक जाएगी और इस मामले में किसी को नहीं बक्शा जायेगा. 29 अगस्त को सुनवाई के दौरान माननीय कोर्ट ने इस बात पर एतराज जताया कि सरकार यह कह रही है कि पंचकुला में लोगों को इकट्ठा होने देना प्लान का हिस्सा था. कोर्ट ने कहा कि यदि यह प्लान था तो धारा 144 का गलत ऑर्डर पास करने के लिए DCP को सस्पेंड ही क्यों किया गया. सरकार ने बार बार कोर्ट को अँधेरे में रखा. कहा गया सब कुछ कंट्रोल में है; बावजूद इसके इतनी व्यापक स्तर पर हिंसा हुई.

इस मामले में अब आगे सुनवाई 27 सितम्बर को होगी लेकिन सबक तो हम ले ही सकते हैं. राजनीति से धर्म को पूर्णतया अलग करना समय की जरूरत है. भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है एवं सरकारें धर्म से स्वयं को दूर रखें.माननीय कोर्ट की सक्रियता एतिहासिक थी और इससे जनता का न्यायपालिका पर विश्वास बहुत बढ़ा है. मेरे कुछ प्रश्न हैं यदि कोई सरकार उत्तर दे पाए तो:

  1. धारा 144 का गलत ऑर्डर क्यों पास किया गया और यदि यह सही था तो कोर्ट में इसे टाइपिंग एरर क्यों बताया गया?
  2. बिना जांच के मुख्यमंत्री ने डेरा प्रेमियों को निर्दोष क्यों बताया और मुख्यमंत्री ने मीडिया के सामने पहले यह क्यों कहा कि उन्होंने डेरा मुखी से स्वयं बात की है. यदि मुख्यमंत्री दोषियों को जानते थे तो उन्होंने पहले उन्हें पंचकुला में क्यों नहीं पकड़ा?
  3. कथित प्लानिंग में पंचकुला को जलने के लिए क्यों छोड़ दिया गया. यदि कोर्ट के आदेश पर सेक्टर खाली न करवाए जाते तो?
  4. नाम चर्चा घर सेक्टर 23 में लगातार भंडारा चल रहा था; इन्हें सिलिंडर की आपूर्ति कहाँ से हो रही थी और रसद कहाँ से दी जा रही थी? शिक्षा मंत्री की मानें तो क्या यह सरकार कर रही थी?
  5. डेरा मुखी के साथ उनकी मूंह बोली बेटी हनिप्रीत हेलिकोप्टर में रोहतक क्यों गयी? DGP कहते हैं आदेश कोर्ट से आया और कोर्ट ऐसा आदेश देने से ही मना कर रही है.
  6. कर्फ्यू के बावजूद सिरसा से 350 गाड़ियाँ (सरकार के अनुसार) कैसे निकली और उनकी जांच क्यों नहीं हुई? पंचकुला में धारा 144 होने के बावजूद भी 173 गाड़ियाँ क्यों पंहुची और उन्हें आने का आदेश किसने दिया?
  7. केंद्र ने इतनी कम सुरक्षा क्यों मुहैया करवाई? क्या सच में ही केंद्र हरयाणा या पंजाब को कुछ नहीं मानता?
  8. उस अधिकारी के विरुद्ध क्या कार्यवाही होगी जिसने रात को पुलिस का ओपरेशन रुकवाया?
  9. यदि सरकार ने प्लानिंग की थी तो DCP को सस्पेंड क्यों किया गया?
  10. पुख्ता जानकारी होने के बावजूद भी सरकार पब्लिक में क्यों कहती रही कि पंचकुला में शांतिप्रिय लोग बैठे हैं. नाम चर्चा घरों को चैक क्यों नहीं किया गया?
  11. इतनी सुरक्षा के बावजूद भी पंचकुला में लोग हथियार लेकर कैसे आये?
  12. कोर्ट में बार बार झूठ बोलने की क्या वजह है?
  13. मुख्यमंत्री को हिंसा करने वालो के समर्थन में क्यों आना पड़ा?
  14. केवल तीन महीने पहले सरकार ने कोर्ट में रिपोर्ट सोंपी है कि डेरे में कोई आपत्तिजनक चीज नहीं है तो ये हथियार कहाँ से आये?
  15. अभी तक भी सरकार के मंत्रीगण डेरे को क्यों डिफेंड कर रहे हैं?
  16. रामविलास शर्मा जी के विरुद्ध कानूनी प्रक्रिया में बाधा डालने के लिए कोई कार्यवाही क्यों नहीं हुई?
  17. अभी तक सिरसा के प्रमुख डेरे में आर्मी को क्यों नहीं जाने दिया जा रहा और इतनी सुरक्षा के बावजूद भी लगभग 15 ट्रक बिना चैकिंग सिरसा डेरे को छोड़ राजस्थान कैसे पंहुचे हैं? डेरा मुखी का परिवार घेराव के बावजूद भी राजस्थान पंहुचने में कैसे सफल हुआ?
  18. पंचकुला के लोगों के जीवन को खतरे में डालने का सरकार के पास क्या अधिकार था?

“क्या जय महाराष्ट्र सही है”

यही कोई पंद्रह वर्ष पहले दूरदर्शन पर एक सीरियल आता था “चाणक्य” नाम से . देश प्रेम के वाक्यों से लबालब यह सीरियल सही मायने में एक महान रचना थी। उस सीरियल के एक एपिसोड में चाणक्य कहते हैं,

“यवनों ने भिन्न-भिन्न जनपदों के आस्था के भेद को नहीं देखा था. आक्रान्ताओं ने सभी के साथ एक जैसा व्यवहार किया था.  दुर्भाग्य ही था की सभी जनपदों ने मिलकर यवनों का सम्मिलित रूप से प्रतिकार नहीं किया.  क्यों??  क्योंकि हममे राष्ट्रीय चरित्र का अभाव था. यदि सभी जनपदों ने राष्ट्र के रूप में संगठित होकर यवनों का प्रतिकार किया होता तो क्या यवनों के लिए इस धरा पर विजय पाना संभव था? यदि सिन्धु की रक्षा का दायित्व सभी जनपदों के लिया होता तो क्या यवनों को सिन्धु को पार कर पाना संभव था? पर कठ, मद्रक, क्षुद्रक और मालव गणराज्यों को ये विश्वास नहीं हो रहा था की उनके प्रदेशों की सीमाओं का द्वार भी तक्षशिला हैं. जहाँ तक हमारी संस्कृति का विस्तार हैं, वहां तक हमारी सीमाए हैं.  हिमालय से समुद्र पर्यंत ये संपूर्ण भूमि हमारी अपनी भूमि हैं, हमारा अपना राष्ट्र हैं. और इस राष्ट्र की रक्षा हम नहीं करेंगे तो इस राष्ट्र की रक्षा कौन करेगा.   यदि हमने अबभी संगठित होकर राष्ट्र के रूप में अपना परिचय नहीं दिया तो आक्रान्ताओं का पुनरागमन हो सकता हैं और इतिहास की पुनरावृत्ति. यदि हम अबभी संगठित नहीं हुए तो आक्रान्ताओं का मार्ग प्रशस्त हैं. आवश्यकता हैं हमें एक छत्र के नीचे एकत्र होने की. ताकि ये राष्ट्र सुदृढ़ और सक्षम हो, शक्तिशाली हो, गौरवशाली हो, और हम अमृत के अमर्त्य पुत्र कह सकें की प्रशस्त पुण्य-पंथ हैं, बढे चलो बढे चलो..”

आज कल राज ठाकरे राष्ट्रीय चेन्नलों पर अपने एक घटिया से बयान के कारण छाए हुए हैं। अपने बुजुर्ग बाल ठाकरे के नक़्शे कदम पर चलते हुए राज ठाकरे मराठी मानुष, जय महाराष्ट्र का नारा कई वर्षों से बुलंद किये हुए हैं और कांग्रेस की सरकार जानकार उनपर कार्यवाही नहीं कर रही। राज ठाकरे के बढ़ने पर शिव सेना का सीधा नुक्सान होगा और कांग्रेस का फायदा। तो कोई भी उन्हें रोकने की कोशिश नहीं कर रहा और वे लगातार बदजुबानी कर रहे हैं। छत्रपति शिवाजी महाराज ने औरंगजेब के समय पर “स्वराज” की स्थापना की थी। उसकी खासियत थी कि  उन्होंने विदेशी तरीकों की जगह देशी तरीकों को तवज्जो दी थी। उनके राज्य को आक्रान्ताओं से मुक्ति दी थी। ठाकरे परिवार अपना आदर्श छत्रपति को घोषित करते हैं और सीधे सीधे ऐसा करके छत्रपति का अपमान करते हैं। छत्रपति की राजनीति का अध्ययन यदि किया जाए तो आप पायेंगे कि  वे हमेशा राष्ट्र प्रेम को तवज्जो देते थे। इसी कारण वे अपने राज्य का विस्तार करते हुए भी अन्याय से दूर रहे। यहाँ तक कि  उन्होंने अपने पुत्र को भी नहीं बक्शा। इसके उलट आजकल के ये तथाकथित नेता मराठी अस्मिता के नाम पर राष्ट्र की अस्मिता का हरण कर रहे हैं। उनके इस कदम का क्या नुक्सान हो सकता है वह ऊपर दिए चाणक्य के वाक्यों में स्पष्ट देखा जा सकता है।

संगठन ही जीवन है और संगठित रह कर ही हम महान राष्ट्र के रूप में अपना विकास कर सकते हैं। राज ठाकरे शायद यह भूल रहे हैं कि  मुंबई को अंग्रेजों ने बसाया था और एक मछुआरों के गाँव को इतना विशाल रूप यहाँ बसे विभिन्न सम्प्रदायों के लोगों ने दिया क्या मुंबई की कल्पना राजस्थान से आये “बिड़ला ” या गुजरात से आये “टाटा” के बिना की जा सकती है। क्या मराठी मानुष बिहार के विस्थापितों के म्हणत काश जीवन का मुकाबला कर पायेंगे। क्या मराठी मानुष का ढोल पीट रहे मनसे के कार्यकर्ता ईंट, पत्थर को उठाकर वहां इमारतें बनाएँगे, या रिक्शा चलाएंगे? यदि नहीं तो बिहार के बिना महाराष्ट्र कहाँ से संभव है। ऐसा नहीं कि  बिहार के केवल मजदूर ही वहां हैं, अपितु वहां पर बिहार के अफसर और बड़े व्यापारी भी हैं। ये सब उस संस्कृति का हिस्सा है जो गर्व से समूचे भारत में सबसे अनूठी संस्कृति होने का सही दंभ भारती है। भारत का संविधान भारत के किसी भी नागरिक को भारत के किसी भी हिस्से में जाकर व्यापार करने की, वहां बसने की आगया देता है। एक घटिया सी पार्टी संविधान से कभी भी ऊपर नहीं हो सकती। यह समझना अति आवश्यक है। इसे केवल बिहार और महाराष्ट्र की समस्या समझकर दरकिनार करने वाले समूचे भारत वासियों को मैं कहना चाहूँगा कि  इनके परिवार का कोई आदमी फिर से झंडा उठा कर क्या पता किसी दिन हरियाणा पंजाब के लोगों को निकालने निकल पड़े इसका मूंह तोड़ जवाब देना जरूरी है। जरूरत है ठाकरे परिवार को जेल के अन्दर दाल दिया जाए ताकि भारत एक रह पाए। इस देश में केवल “जय हिंद” का नारा ही बुलंद रहना चाहिए न की “जय महाराष्ट” या कुछ और। कोई भी राज्य, कोई भी धर्म कोई भी जाति  राष्ट्र से ऊपर नहीं हो सकती। हमारी अनूठी सांस्कृतिक विविधता का ख्याल केवल हम ही रख पायेंगे कोई और नहीं। ठाकरे परिवार का सामाजिक बहिष्कार करना जरूरी है। -रविद्र

भारत की आद्र्भूमियाँ(WETLANDS) और भारत सरकार की विफलता

2010 में जब भारत सरकार ने आद्र्भूमियों के संरक्षण और प्रबंधन के लिए नियम बनाए थे तो सबको आशा थी के जयराम रमेश के पर्यावरण मंत्री होने के नाते शायद सरकार कोई ठोस कदम उठाए, पर यह कानून भी अन्य कानूनों की तरह बिना धार की तलवार बना दिया गया. पूरे विरोध के बावजूद भी इसे 2011 में सरकार ने अधिसूचित कर दिया. २ फरवरी को विश्व आद्र्भूमि दिवस पर शायद ही किसी मीडिया हाउस ने या सरकारी संस्थान ने कोई सार्थक प्रयास किया हो. यहाँ हम यह जानने का प्रयत्न करते हैं कि कानून बनाने में क्या भूल हुई और क्या खतरे हैं भारत की आद्र्भूमियों को.
नदियों, जलाशय एवं जमीनी पानी की तरह ही आद्र्भूमि भी जलीय चक्र का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. ये न केवल जमीनी पानी को रिचार्ज करने के काम आती हैं, अपितु जैविक विविधता, जल स्वच्छीकरण, पक्षियों के लिए आराम करने की जगह, जलवायु नियंत्रण आदि कई महत्वपूर्ण कार्य करती हैं. इनकी प्रयावरण की महत्ता को देखते हुए, विश्व समुदाय ने मिलकर 1971 में रामसर अभिसमय(Convention) में इन्हें संरक्षित करने का संकल्प किया था एवं ऐसी आद्र्भूमियों को चिह्नित करने का बीड़ा उठाया था जो अंतर्राष्ट्रीय महत्ता रखती हैं. भारत में ऐसी आद्र्भूमियों की संख्या 25 है जो रामसर अभिसमय के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय आद्र्भूमि हैं.
इनकी महत्ता को देखते हुए केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय आद्र्भूमि संरक्षण प्रोग्राम भी 1985-86 में घोषित किया था, पर वह भी आशाओं के अनुरूप कार्य नहीं कर पाया.
इन नियमों की सबसे बड़ी कमी यह है कि आद्र्भूमियों के संरक्षण का सारा जिम्मा केंद्र एवं राज्य सरकार के पास है. लगभग सभी आद्र्भूमि; चाहे वे मानव निर्मित हों या प्राकृतिक ; अपने आस पास एक बड़े समाज का भरण पोषण करती हैं. इनमें मछली पकड़ने वाले, खेती करने वाले एवं अन्य छोटे मोटे कार्य करने वाले असंख्य लोग हैं. भारत के कानून में इन लोगों को कोई स्थान नहीं दिया गया है. हालांकि नियम ये सब गतिविधियाँ सरकार के नियंत्रण में चलाने की अनुमति देते हैं परन्तु इन लोगों की सलाह और इन लोगों के मेलजोल के बिना आद्र्भूमियों का संरक्षण हो पायेगा यह मुश्किल लगता है.
दूसरी महत्त्व पूर्ण कमियाँ इन नियमों में यह हैं कि लोकल मशीनरी जैसे पंचायत, जिला परिषद् को कोई भी रोल नहीं दिया गया है. इनके पूरे सहयोग के बिना, एवं सलाह के बिना आद्र्भूमि संरक्षण संभव हो पायेगा यह मुश्किल है. लोकल मशीनरी न केवल एक महत्त्वपूर्ण रोल अदा कर सकती हैं बल्कि इनकी सहायता से आद्र्भूमि के आस पास रहने वाले जन-मानस को भी शिक्षित किया जा सकता है. यह एक सत्य है कि कानून बनाना कभी भी किसी समस्या का हल नहीं कर पाया है, इसका हल केवल शिक्षा से हो सकता है. जब तक आस पास के लोग इसे समझेंगे नहीं कि आद्र्भूमि महत्वपूर्ण क्यों है, इनका संरक्षण करना संभव कैसे हो पायेगा. यहाँ यह कहना महत्वपूर्ण होगा कि पिछले दस पन्द्रह सालों में भारत अपनी 38% आद्र्भूमियों के एरिया को खो चुका है और इसके विभिन्न कारण हैं. यदि अब भी शिक्षित नहीं किया गया समाज को तो बहुत देर हो जायेगी.
अगली कमियां इन नियमों में यह है कि नियमों में एक वर्ष के भीतर भीतर आद्र्भूमियों की सफाई का एक असंभव कार्य करने का बीड़ा उठाया गया है पर यह कहीं भी लक्षित नहीं है कि यह कैसे होगा और इसके लिए क्या क्या क्रिया-कलाप किये जायेंगे. जो कार्य भारत में पिछले साठ वर्षों में नहीं हो पाया, वह एक वर्ष में हो जाएगा यह असंभव  लगता है.
विभिन्न कमियों में से एक कमी यह भी है कि आद्र्भूमि को नुकसान पंहुचाने वाली गति-विधियों को करने वालों को कितनी सजा मिलेगी. क्या यह आवश्यक नहीं था कि एक कठोर सजा का प्रावधान किया जाता, जबकि समस्त भारत में शिकारी, जल प्रदूषण, गैर कानूनी मछली पकड़ने वाले आद्र्भूमियों को एक ऐसा नुक्सान पंहुचा रहे हैं जो कभी भी ठीक नहीं हो पायेगा. अब ज़रा देखिये, कि सरकार की अनुमति से कोई भी गतिविधि की जा सकती है आद्र्भूमियों में; ज़रा सोचिये कि इसका आद्र्भूमि को फायदा होगा या नुक्सान. अच्छे प्रयावरण को संविधान का एक मौलिक अधिकार माना गया है (देखिये चमेली सिंह बनाम उत्तर प्रदेश सरकार, 1996 सुप्रीम कोर्ट).
आद्र्भूमियों को चिह्नित करने का तरीका भी गलत है. मुख्य नदी धारा को आद्र्भूमि नहीं माना गया है. अधिकतर आद्र्भूमि किसी न किसी जलधारा से ही निर्मित होती हैं. जब तक जलधारा में प्रदूषण एवं अन्य गैरकानूनी गतिविधियों को रोका नहीं जाएगा,तब तक आद्र्भूमि संरक्षित हो जायेंगी यह संदिग्ध है. हरियाणा की एक महत्वपूर्ण आद्र्भूमि है सुल्तान्पुर(गुडगाँव); यह मुख्य रूप से यमुना से आये जल से निर्मित है. यमुना के प्रदूषण ने इस पर इतना गहरा प्रभाव डाला है कि इसका जल काला हो गया है. यही हाल पंजाब की हरिके आद्र्भूमि का है जहां सतलुज और रावी का प्रदूषण एक कठिन परिस्थिति उत्पन्न कर रहा है.
हमें सोचना चाहिए और समझना भी चाहिए कि आद्र्भूमि प्रयावरण संरक्षण के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण हैं. न केवल सूखे के समय, बल्कि हर मुश्किल परिस्थिति में प्रयावरण के संतुलन को बनाए रखने में इनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है. पर सरकारें कुछ नहीं कर रही हैं और सभी प्रकार की गैर कानूनी गतिविधियाँ जैसे मछली पकड़ना, शिकार, खनन, जल प्रदूषण यहाँ पर धड़ल्ले से चल रहा है. यदि हम आज भी न संभलें तो बहुत देर हो जायेगी और नुक्सान ऐसा होगा जिसकी भरपाई आने वाली सदियाँ भी नहीं कर पाएंगी.

भारतीय भाषाओँ का विनाश और इंग्लिश

लार्ड मैकाले ने भारत में ब्रिटिश शिक्षा पद्दति को जब सख्ती से लागू किया था तो उसने ब्रिटिश सरकार को यह विश्वास दिलवाया था कि भारत में अंग्रेजी और अंग्रेजियत का प्रचार एवं प्रसार यदि किया गया तो भारत की संस्कृति धीरे धीरे समाप्त हो जाएगी और भारत की आने वाली पीढियां एक ऐसे समय में पैदा होंगी जब वे सिर्फ अंग्रेजी में सोचेंगे, अंग्रेजी में पढेंगे और अंततः यदि ब्रिटिश वहां न भी रहे तो भी सांस्कृतिक रूप से भारत हमेशा के लिए ब्रिटेन का गुलाम हो जाएगा. इस ही नीति के तहत उस समय प्रचलित हिन्दुस्तानी, उर्दू और हिंदी जैसी प्रमुख भाषाओं की जगह शिक्षा के लिए अंग्रेजी का प्रयोग किया गया. तीस चालीस साल आते आते भारत में एक ऐसी जमात तैयार हो गयी जो हिंदी और हिन्दुस्तानी को अपनी शान के खिलाफ और संस्कृत को मृत भाषा मानती थी. जब भारत आजाद हुआ तो संविधान निर्माताओं के ऊपर नया संकट पैदा हुआ, उन्हें यह तय करना था के भारत की राष्ट्रीय भाषा क्या होगी. महात्मा गाँधी के शब्दों में,” जो सभ्यता अपनी पृथकता और भाषा को त्याग देगी वह मृतप्राय हो जायेगी“. एक लम्बी चौड़ी बहस के बाद यह तय किया गया कि भारत वर्ष की मुख्य भाषाओं को संविधान में मान्यता दी जायेगी. अंग्रेजी को शासकीय भाषा के रूप में प्रयोग किया जाएगा और 1965 तक उसे भारत से चलता कर दिया जाएगा. पर इस सन तक आते आते भारत कई हिंदी विरोधी दंगों से गुजरा जिनमें से मुख्य दंगे मद्रास में हुए जहां पर लगभग अस्सी विद्यार्थियों ने स्वयं को आग लगा कर मृत्यु के हवाले कर दिया. इन सब का कहना था कि हिंदी नहीं उनकी अपनी भाषा राष्ट्रीय भाषा बने. अतः एक संविधानिक संशोधन लाकर १९६५ को वैकल्पिक साल बना दिया गया. पर हिंदी और अन्य भाषाओं को बचाने के लिए इच्छा शक्ति तब तक समाप्त हो गयी थी क्योंकि एक पूरी पीढ़ी तैयार हो चुकी थी जो अंग्रेजी को अपने जीवन का अभिन्न अंग एवं अन्य भाषाओं को सौतेला समझती थी. विश्व की सबसे समृद्ध सांस्कृतिक विरासत एवं सबसे महान भाषा संस्कृत की जननी इस भारत भूमि पर उसकी अपनी भाषाएँ बेगानी हो गयी. एक कवि की हिंदी की उपेक्षा पर एक दर्दनांक कविता से समझें तो ,“खाट पर पसरी हुई मेहमान अंग्रेजी के साथ, अपने घर में हिंदी की लाचारगी को सोचना” . इस ही दुर्दशा को देख कर भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भी कहा था
,”निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।

अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन, पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन ।।

पर न तो अंग्रेजी रुकी और न ही भारतीय भाषाओं का मान मर्दन रुका. क्या आप जानते हैं कि 1961 की जनगणना में 1652 मातृभाषाओं की सूची बनी थी. जो 1971 में घटकर 109 रह गई. 1971 की जनगणना में जिन भाषाओं को बोलने वाले दस हजार से कम लोग थे, सरकार ने उन्हें गिनना भी मुनासिब नहीं समझा और ऐसी सभी भाषा या बोलियों को ‘अन्य’ की एक श्रेणी में डाल दिया. फिर एक के बाद एक भाषा या बोलियां खत्म होती रहीं, लेकिन किसे परवाह है? आज की पीढ़ी हिंदी को इंग्लिश में, इंग्लिश को अन्य भाषाओँ में मिलाती है. क्या आपको नहीं लगता कि जंगल बचाओ आन्दोलन, शेर बचाओ आन्दोलन की तरह भारत वर्ष में भाषा बचाओ आन्दोलन की सख्त आवश्यकता है. यदि प्रयास नहीं किये गए तो भारत की भाषाएँ विनष्ट हो जायेंगी. पर यहाँ सुनने को कौन बैठा है? हमारी पीढ़ी में कितने लोगों को अपनी मातृभाषा में एक से सौ तक की गिनती आती है? पर अंग्रेजी पोएम अवश्य आती होंगी!
इस व्यथा ने अंतरात्मा को झझकोर दिया है और समझ नहीं आ रहा है कि क्या बोलूं. इतना कर सकता हूँ कि कम से कम मेरे जीवन में हिंदी और भारतीय भाषाएँ हमेशा सर्वोपरि रहेंगी.

Uniform Civil Code

UNIFORM CIVIL CODE India always has been a country with a lot of diversities. Right from the Vedic period there has been so much diversity in India that no uniform law was applicable through out the land. Each family, each tribe, each village had their own DHARMA. No uniformity anywhere except probably the fact that land was known as VRIHAD BHARATA. The position did not changed; infect worsened when Muslims conquered India about 1600 years ago. First there was Turkish reign and there after the Mughals came. As both Hindu and Muslim systems are very old lot of schools exist in them. If Hindu law had Mitakshara and Dayabhaga etc. Muslim law had Shia and Sunni schools. These schools are further divided into different sub-schools. So condition naturally worsened during the Muslim reign although great rulers like Akbar honestly tried to maintain uniformity in law but of no use.When British arrived in India in late 17th century they just bewildered after seeing diverse laws prevailing at that time in India. There were different personal laws; inheritance etc. were essentially governed according to different sub-schools. Even there was no uniformity in criminal law and different people were punished differently for the same offence committed by them. During their rule they tried to replace this diversity with uniformity in law resulting in enactments like I.P.C. (1861), evidence (1872) etc. Muslim rules of evidence were replaced by English rules and the court system of England was adopted through out the territory uniformly. But when they tried to use Roman law and Common law principles in personal law the interpretation increased the existing confusion. So they decided not to interfere in personal law. Hindus were governed by their own law and after 1937 when Shariat Act was passed Muslims got statutory recognition of the rule that personal law will be governed according to religion it belonged.After independence in 1947, with India having visionary leaders like Nehru Ji, Mahatma Gandhi, Sardar Patel, Maulana Azad, and Ambedkar etc. it was hoped that uniformity will come to Indian law and each Indian will be governed according to one sect of law applicable through out India. The hope remained alive when Art.44 was inserted into the constitution of India directing government of India to make uniform civil code as soon as possible. But after facing horrible time of partition fear and insecurity in the mind of Indian Muslim was so prevalent that it was felt that it was clear interference in their religious matter. Not only Muslims opposed it but Hindus were also against the enactment of uniform civil code. These things were in the minds of the constitutional assembly at the time of making the constitution. However by the support of persons like Sh. K. M. Munshi Art.44 was entered in.However, it was strongly felt by persons favouring U.C.C. that it was impossible to enact U.C.C. with out the interference of Hon’ble Supreme Court of India. But the problem was that Apex court was of the view that Court cannot give guideline for the enforcement of Directive Principles of State policy. The position changed only by the decision of Minerva Mill’s case when Bhagwati J. said that court can give guidelines to state for the implementation of Directive principles.The matter for the first time came before the Apex Court for the first time in Begum Shah Banu’s case in 1985; in the case making S.125 of Cr.P.C. regarding maintenance of divorced wife; applicable to Muslim husbands and the court held that a Muslim husband is bound to maintain his wife even beyond the period of idda (a compulsory period to be observed by wife after divorce which is generally of 3 months, in this period she can not marry again). The decision was fiercely opposed by Muslim leaders all over India who were claiming that a Muslim husband is liable to maintain his wife only till the period of idda and not after (a glaring piece of gender inequality!). Gender inequality is not only prohibited in art.14,15,21 of constitution of India but also by art.22 of universal declaration of human rights, art.3,25 of international covenant on economic and social rights,1966, art.23 of international covenant on civil and political rights,1966 and art.2(f) of The declaration on elimination of all discriminations against women,1979. India is signatory to all of the above treaties and art.50 of constitution of India make it obligatory for government of India to follow these treaties. But the effect of this landmark judgment was nullified by then Rajiv Gandhi government by enacting Muslim women’s act in 1986.Gender inequality is not under Muslim law but it is also the problem of uncodified Hindu law also. However, most of the inequalities in Hindu law were ended by codification of Hindu law on marriage, succession, adoption and maintenance etc. in the decade of 1950’s. But still inequalities prevail as Hindu woman cannot take in adoption of a child herself while she is married, she can not choose her matrimonial home in most of the circumstances and her only duty being to submit herself to the authority of her husband and to remain under his roof. Still we call India as democratic republic! Inequalities prevailing in Muslim community like polygamy and pronouncement of divorce by triple talak etc. are also worth mentioning. It was once observed by the Supreme Court of U.S. that bigamy is a custom against public morals and it should be discouraged in all forms even if it was a matter of personal belief. The matter came into consideration before Hon’ble Supreme Court of India in 1995 in the landmark case of Sarla Mudgil. The question before the court was of Hindu males changing religion just to avoid punishment of Bigamy in Hindu Law. The Hon’ble Court highly discouraged this practice and ordered then Narsimha Rao govt. to start work on Uniform Civil Code. However Hon’ble Kuldip Singh J. said these observations of Court are just obiter dicta and hence not binding on the government. More sadly in 2000 in the case of Lily Thomas v. Union of India, Hon’ble court said it never issued any mandatory directions for the enactment of Uniform Civil Code.But the debate was once again started by Hon’ble court in its decision dated 23/7/2003 when court said that it was sad that even after 56 years of independence no steps were taken for the enactment of U.C.C. it can not be understood that when malpractices like bigamy and triple talak have been totally disapproved in countries like Pakistan, Iran, Morocco and Turkey etc. why India is still holding these. It is commonly debated that these are essential evils to protect secularism in India. One writer has gone to the extent by saying that bigamy exists in Muslim law to avoid adultery; so that the physical needs of Muslim male are satisfied without breaking the law. Horrible argument! If this is so then why polyandry (practice of a woman having more than one husbanded) is not there; or we may take the view that Muslim women have no right to satisfy their physical needs!Secularism is about being indifferent to religious matters of citizens and not about protecting religious malpractices. pluralism is on such height that now Sikhs are also favouring and demanding their own personal law; although this demand is made by very few and not the voice of whole of the community. Think of the day when each community will be having their own personal law. This was never intended by our great thinkers who believe in Vasudev Kutumbkam. So there are thousands of reasons favouring Uniform civil code but this dream will come true it can be easily doubted due to ugly politics prevalent in India Debate has been started and torch has been lighted by the judiciary. Now its time to start working on it before it gets too late. We hope a lot from judiciary now a day due to their active role in nation development. Let’s hope till then that every one will get at least uniform justice in the light of our great constitution. They are doing it from time since independence but hope increases with every good work done!